Wednesday, 21 August 2019

जन स्वास्थ्य हरियाणा मांग घोषणा पत्र 
मौजूदा स्वास्थ्य परीस्थिति, जो कि पूर्णरुप से खारीज करने लायक है, को पलट सकें तथा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियां तथा स्वास्थ्य सेवाएं लागू करते हुए सबके लिए स्वास्थ्य का सपना साकार कर सकें, उसके लिए जन  स्वास्थ्य अभियान हरयाणा  ने एक घोषणा पत्र जारी  किया 2014 में  जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं
   
1- स्वास्थ्य के सामाजिक निर्णायकों पर ध्यान हो- इसके अन्र्तगत स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देना , लोक वितरण प्रणाली को सार्वभौमिक बनाना होगा जिसके तहत स्थानीय खाद्य पदार्थों को बढ़ावा दिया जाए। राष्ट्रीय शिशु स्वास्थ्य एवं पोषण नीति बनाई जाए जिसके अंतर्गत आई सी डी एस का सार्वभौमिकीकरण हो व तीन साल तक के बच्चों को पूर्ण रुप से शामिल करने हेतू सेवाओं तथा कार्यदल में विस्तार हो। समस्त गावों व मोहल्लों में शुद्ध एवं सुरक्षित पेयजल की सार्वभौमिक उपलब्धता हो तथा हर गांव व मोहल्ले में स्वच्छ शोचालयों तक सार्वभौमिक पहुंच हो।
2- स्वास्थ्य सम्बन्धित लैंगिक पहलूओं को सम्बोधित किया जाए -इसके अंर्तगत समस्त महिलाओं तथा समलैंगिक नागरिकों को समेकित , आसानी से उपलब्ध उच्चगुणवतापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच व इसकी उपलब्धता की गाारण्टी दी जाए जो कि केवल मातृत्व सवास्थ्य सेवाओं तक ही सीमित न हो। उन समस्त कानून ,नीतियों तथा आाचरणों को समाप्त किया जाए जो कि महिलाओं के प्रजनन, यौनिक तथा जनतांन्त्रिक अधिकारों का हनन करता है। जो भी विभिन्न प्रजनन प्रोद्योगिकियां जो कि महिलाओं के लिए हानिकारक हो सकती हैं उन्हें नियंत्रित किया जाए । लिंग आाधारित उत्पीड़न को एक लोक स्वास्थ्य समस्या माना जाए तथा इसके तहत शारीरिक एवम मानसिक रुप से पीड़ितों को तमाम आवश्यक स्वास्थ्य जांच, दस्तावेजिकरण, रेफरल का अधिकार दिया जाए तथा समन्वित नैतिक चिकित्सीय कानूनी प्रक्रियाओं के लिए भी उन्हें अधिकृत बनाया जाए । स्वास्थ्य सेवाओं को किषोर किषोरियों के लिए मित्ऱतापूर्ण बनाया जाए तथा इस तबके को भी समेकित, उच्चगुणवता पूर्ण , आासनी से पहुंचने लायक स्वास्थ्य सेवाएं सुनिष्चित हो जो कि उनके विषेश प्रजनन तथा यौनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करती हों।
3- समस्त जाति आधारित भेदभाव तुरंत समाप्त किया जाए- जाति आधारित भेदभावों को, जो कि बुरे स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण सामाजिक कारक है , पूर्णरुप से समाप्त करने हेतू त्वरित एवं प्रभावी कदम उठाये जाएं। मानव द्वारा मैला ढोने वाले समस्त मैनुअल कार्य पूर्ण रुप से प्रतिबन्धित हों। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में इस भेदभाव से पीड़ित तबकों को प्राथमिकता दी जाए । इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं का पुर्नगठन किया जाए।
4- स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार को संवैधानिक बनाया जाए- देश में स्वास्थ्य के अधिकार का कानून लागू किया जाए जो कि समेकित, उच्चगुणवतापूर्ण, आसानी से उपलब्ध सेवाओं को सुनिष्चित करता हो तथा प्राथमिक, द्वितीय एवं तृतीय स्तरीय सेवायें आवष्यकतानुसार सबको उपलब्ध करता हो। सेवा प्रदाता को सेवाओं को उपलब्ध नहीं कराने या मना करने पर ;चाहे गुणवता,पहुंच या खर्च से जुड़े हुए कारणों से भी हो, उसे कानूनी अपराध घोषित किया जाए।
5- स्वास्थ्य के उपर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाया जाए-सकल घरेलू उत्पाद के कम से कम 3-6 प्रतिशत को स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित किया जाए जो कि 2014 की स्थििति में प्रति व्यक्ति 3000 रुपये बनता है।
इस व्यय में कम से कम एक तिहाई केन्द्रिीय सरकार से राज्यों को उपलब्ध हो। हरियाणा सरकार का प्रति व्यक्ति खर्च 1786 है। एक मध्य सीमा के तहत स्वास्थ्य के उपर किये जाने वाले समस्त सार्वजनिक व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 5% तक बढ़ाया जाए।
6- स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं गुणवता सुनिश्चित की जाए-समस्त स्वास्थ्य सुविधाओं में सेवाओं की गुणवता सुनिश्चित की जाए जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी , सुरक्षित , गैर शोषणीय बनाये तथा लोगों को सम्मानपूर्वक सेवायें उपलब्ध हों। मरीजों के अधिकारों का आदर हो एवं मरीजों की आराम तथा संतुष्टि पर ध्यान दिया जाता हो। गुणवता का मानक केवल भौतिक या चिकित्सकीय संरचना पर आधारित न हो जो कि प्रायः बड़े कार्पोरेट अस्पतालों या मैडीकल टूरिज्म को बढ़ावा देते हैं तथा कम खर्च में सही एवं प्रभावी सेवाओं के प्रदाय को बढ़ावा नहीं देता है। समस्त लोक सवास्थ्य संस्थान अपने स्तर पर गारन्टी की गई सभी स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदान करने हेतू बाध्य हों । समस्त लोक स्वास्थ्य सुविधाओं को किसी भी प्रकार के उपभोग्ता शुल्क से मुक्त किया जाए तथा सेवाएं शासन द्वारा संचालित सुविधाओं के माध्यम से उपलब्ध कराया जाए न कि निजी सार्वजनिक सहयोग व्यवस्था से।
7- स्वास्थ्य सेवाओं का सक्रीय एवं निष्क्रिय निजीकरण बंद हो- सक्रीय निजीकरण के तरीके ; जैसे सार्वजनिक संसाधन या पूंजी को निजी संस्थानों को वाणिज्यिक हस्तानन्तरण करना , पूर्ण रुप से बंद करने हेतू आवश्यक कदम उठाया जाए। निष्क्रिय रुप से हो रहे निजीकरण को रोकने के लिए लोक सुविधाओं में निवेश बढ़ाया जाए। सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों से प्रदत सेवाएं केवल प्रजनन स्वास्थ्य,टीकाकरण एवं अन्य चुनिन्दा बीमारियों के नियन्त्रण पर सीमित न होकर समेकित स्वास्थ्य सेवाओं पर आधारित हो।
8- स्वास्थ्य कार्यदल का बेहतर प्रशिक्षण होः स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत सभी कर्मचारियों की बेहतरीन शिक्षा एवं प्रशिक्षण के लिए सार्वजनिक निवेश को बढ़ाया जाए। सरकार द्वारा चलायी जा रही सभी शिक्षण संस्थान द्वारा उन जरुरत मंद इलाकों से चिकित्सकों, नर्सों तथा स्वास्थ्य कर्मचारियों को आवश्यक संख्या में चयनित कर शिक्षा व प्रशिक्षण दिया जा रहा है यह सुनिश्चित किया जाए। प्रशिक्षण नीति में बदलाव लाया जाए जिससे कि स्वास्थ्य कार्यदल द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने हेतू समस्त जरुरी दक्षताएं दी जा सकें। चिकित्सा तथा संबन्धित क्षेत्र के उच्च शिक्षा व्यवस्था के वाणिज्यिकरण बंद हों तथा निजी शिक्षण संस्थाओं के व्यवस्थित नियन्त्रण हेतू प्रभावी एवं पारदर्शी तन्त्र लागू किया जाए।भारतीय चिकित्सा परिषद,भारतीय नर्सिंग परिषद जैसी संस्थाओं विनियामक संस्थाओं को गहन समीक्षा के पश्चात पुनर्गठित किया जाए जिससे कि वर्तमान भ्रष्ट एवं अनैतिक व्यवस्था को समाप्त किया जा सके।
9- बेहतर शासित पर्याप्त लोक स्वास्थ्य कार्यदल होः लोक स्वास्थ्य प्रणाली में समस्त सेवाओं के लिए आवश्यक सभी पद एवं स्थान प्रर्याप्त रुप से सृजित किया जाए एवं इन पदों को समय समय पर भरा जाये। संविदा में नियुक्त कर्मचारियों को नियमित किया जाए तथा आशाओं , बहुउद्येशीय कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोक स्वास्थ्य तऩ्त्र के कर्मचारियों का प्रयाप्त रुप से क्षमतानिर्माण किया जाए एवं उन्हें अपने कार्य के लिए सही मानदेय किया जाए व उपयुक्त काय्र करने का माहौल प्रदान किया जाए। कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा पर ध्यान दिया जाएतािा इस हेतू महिला कर्मचारियों के लिए विशेष व्यवस्था बनाई जाए। उपलब्ध शोध से यह पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्र में डाक्टरों की कमी पेषेवर समस्याओं से ज्यादा प्रशासनिक कमजोरी तथा राजनैतिक पराजय के चलते है, जिसके सुधारने के लिए कार्य किया जाए । हर स्तर के लिए ऐसे लोक स्वास्थ्य कैडर का गठन हो जिसमें प्रयाप्त संख्या में चिकित्सक, नर्सें तथा स्वास्थ्य कर्मियों का दल सम्मिलित हो जिसका जिसको प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में, लोक स्वास्थ्य के सम्बन्ध में एवं एक दल के रुप में बेहतर कार्य करने में प्रशिक्षण प्राप्त हो।
10- सभी आवष्यक दवाओं का एवं जांच सुविधाओं की मुफत एवं गुणवतापूर्ण उपलब्धता सुनिष्चित होः जिस प्रकार तामिलनाडू, केरल एवं राजस्थान राज्य में किया गया है वैसा स्वायत , पारदर्शी एवं आवश्यकता आाधारित दवा एवं अन्य सामग्रियों के खरीदी एवं वितरण प्रणाली गठित एवं लागू हो। लंबित बीमारियो के सभी मरीजों के लिए सभी आवष्यक दवाओं का पूरी अवधि के लिए उपलब्धता सुनिश्चित हो एवं दवा वितरण केन्द्रों को मरीजों के आसान पहुंच के मद्येनजर गठित किया जाये। समस्त स्वास्थ्य सुविधाओं में जेनेरिक दवाओं का प्रिस्क्रिप्सन एवं उपयोग को अनिवार्य करार दिया जाये।
11 - सामुदायिक सहभागिता, सहभागी योजना निर्माण एवं समुदाय आधारित निगरानी को बढ़ावा दिया जायेः स्वास्थ्य सेवायें जनता के प्रति जवाबदेह हों। इसके लिए समुदाय आधारित निगरानी एवं योजना निर्माण प्रक्रिया को समस्त लोक स्वास्थ्य कार्यक्रमों एवं सेवाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जायेजिससे कि सेवा प्रदान में उतरदायित्व एवं पारदर्शिता बढे। शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को सुचारु रुप से चलाने के लिए संस्थागत व्यवस्थायें बनाई जायें जिसके लिए पर्याप्त धन राशि के साथ साथ आवश्यक प्रबंधन स्वायतता भी प्राप्त हो।
12- लोक स्वास्थ्य प्रणाली को भ्र्ष्टाचार मुक्त किया जायेः नियुक्ति, पदोन्नति, स्थानान्तरण, खरीदी तथा अधोरचना विकास के लिए पारदर्शी नीतियां बनाई जायें तथा लागू की जाएं जिस प्रकार तामिलनाडू राज्य ने खरीदी के लिए तािा कर्नाटक राज्य ने स्थानान्तरण के लिए नीतियां बनाइ्र हैं। शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को सुचारु रुप से चलाने के लिए संस्थागत व्यवस्थायें बनाई जायें जिसके लिए प्रयाप्त धनराशि के साथ साथ आवश्यक स्वायत्तता प्राप्त भी हो।
13- निजी अस्पतालों द्वारा किये जाने वाले शोषण को समाप्त किया जायेः राष्ट्रीय क्लिनिकल एस्टेब्लिष्मैंट एक्ट के अंर्तगत मरीजों के अधिकार हर संस्थाओं में सुरक्षित हों । विभिन्न सेवाओं के दाम नियंत्रित हों। प्रिस्क्रिप्षन, जांच तथा रेफरल के पीछे चलने वाली घूसखोरी को बंद किया जाए, एवं इसके लिए शासन द्वारा पर्यवेक्षित लेकिन स्वतंत्र शिकायत निवारण व्यवस्था लागू की जाये। मानक निर्माण का प्रकार ऐसा हो जिसमें कारपोरेट हित का बढ़ावा न हो सके। इन तमाम व्यवस्थाओं पर यह भी विशेष ध्यान हो कि नैतिक एवं गैर वाणिज्यिक सेवा प्रदान करने वाले निजी प्रदाताओं को संम्पूर्ण परि रक्षा मिल रहा है।
14- समस्त सार्वजनिक बीमा योजनाओं को समय सीमा के अंतर्गत लोक सेवा व्यवस्था में विलीन किया जायेः आर एस बी वाई जैसे तथा अन्य राज्य संचालित बीमाएं कर-आधारित सार्वजनिक वितीय व्यव्स्था से पोषित लोक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में समय सीमा के अंर्तगत विलीन हो । इन बीमा योजनाओं के अंर्तगत प्राप्त सभी सेवायें लोक स्वास्थ्य प्रणाली में भी सम्मिलित हों एवं इसके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों। संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लोक स्वास्थ्य प्रणाली में पूर्ण रुप से शामिल किया जाये जिससे कि उनके लिए समेकित स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो।
हरयाणा मुख्यमंत्री मुफ्त इलाज ‘योजना’, जननी सुरक्षा योजना आदि सभी स्वास्थ्य योजनाओं को ठीक प्रकार से लागू किया जाए। इसके लिए जिला स्तर पर सामाजिक संस्थाओं व जन संगठनों के कार्यकर्ताओं की एक माॅनिटरिंग कमेटी बनाई जाए जिसकी सिफारिशों पर सम्बंधित विभाग उचित कार्यवाही तुरन्त करे। हरयाणा से गुजरने वाले हाइवे पर एक्सीडैंट होने पर 48 घण्टे तक सभी को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं देने की योजना उचित ढंग से लागू की जाए।
15- स्वास्थ्य नीतियों के विकास में तथा प्राथमिकतायें तय करने में बहुपक्षीय अंर्तराष्ट्रीय वितीय संस्थाओं का तकनीकी सहयोग पूर्ण रुप से समाप्त होः विश्व बैंक , यू.एस.एड., गेट्स फाउन्डेशन , कंसलटेंसी संस्थाएं जैसे डियोलाइट,मैकेन्सी आदि का राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकतांए एवं वितीय या सेवा प्रदाय रणनीतियों के निर्धारण में भूमिका को पूर्ण रुप से समाप्त किया जाये। शोध व ज्ञान संसाधन का विकास एवं वितरण के लिए एक विषेश अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्रणाली गठित किया जाये , खासकर अन्य विकासशील देशों के साथ। डब्लू.एच. ओ. ,यूनिसेफ तथा अन्य संयुक्त राष्ट्रीय संस्थाओं के उपर तकनीकी निर्भरता एवं उनकी वितिय सहायता की आवश्यकता से मुक्त किया जाने हेतू शासकीय स्तर पर दबाव बनें। इस प्रकार की संस्थाओं
की ओर से आने वाले परामर्श तथा विशेषज्ञता को भी समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाये क्योंकि यह संस्थाएं भी कारपोरेट एवं निजी संस्थानों के हित से प्रभावित हैं ।
16 - राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर स्वास्थ्य पर शोध एवं विकास के लिए क्षमता निर्माण होः लोक स्वास्थ्य बजट का कम से कम 5% स्वास्थ्य पर शोध के लिए आवंटित हो जिसमें स्वास्थ्य तन्त्रों पर शोध भी शामिल हो। सवास्थ्य के क्षेत्र में तथा स्वास्थ्य तन्त्रों पर शोध हेतू नवीन संस्थागत ढांचे शासन द्वारा गठित हो तथा मौजूदा संस्थाओं को पर्याप्त शासकीय वितिय सहायता दिया जाये।
17- आवश्यक एवं सुरक्षित दवाईयों तथा उपकरणों की सही उपलब्धता सुनिष्चित होः सभी दवाईयों का मूल्य आधारित दाम नियन्त्रण हो , दवा एवं उपकरण सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रावधान हो। जेनेरिक दवाईयों के वितरण के लिए पर्याप्त संविधायें प्रणाली हों व चिकित्सकों द्वारा जेनेरिक दवाईयों के प्रिस्क्रिप्षन हेतू अनिवार्यता हो। इंडियन पेटैंट एक्ट के अंर्तगत लोक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए की गई व्यवस्थाओं का दवाईयों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उपयोग हो तथा ज्यादातर दवाईयों एवं उपकरणों के देषी निर्माण को बढावा मिले।
18- जैव चिकिस्तकीय शोध तथा क्लिनिकल ट्रायलों की सशक्त विनियामक व्यवस्था होः क्लिनिकल ट्रायलों के नैतिक संचालन हेतू स्पष्ट रुप रेखा तैयार एवं लागू हो जिससे समस्त हितग्राहियों के सशक्त विनमय के लिए व्यवस्थायें बंधित हो चाहे वे वितीय प्रदाता हो , शोध संस्थाएं हों या नैतिक समितियां हों। सी.डी.एस.सी.ओ. तथा आई.सी. एम. आर. द्वारा समस्त क्लिनिकल ट्रायलों का तथा ट्रायल स्थानों की सशक्त निगरानी की जाये तथा ट्रायल संसाधनों के आंवटन के दौरान वहां पर आवश्यक सभी आपातकालीन स्थिति के निपटारे हेतू व्यवस्थायें सुनिश्चित हों । क्लिनिकल ट्रायलों में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को प्र्याप्त क्षतिपूर्ण राशि उपलब्ध कराने हेतू एवं उनको हो सकने वाले समस्त बुरे प्रभाव निपटारे के लिए पर्याप्त व्यवस्था के साथ निर्देश विकसित और लागू हों। क्लिनिकल ट्रायल प्रतिभागियों के लिए उनके अधिकार पत्र विकसित किया जाय जिसकी कानूनी रुप में भी वैधता हो।
19- सभी मानसिक रुप से पीड़ित मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं एवं रक्षा सुनिश्चित की जायेंः जिला स्तरीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंर्तगत शामिल किया जाये। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति पर अमल हो तथा मानसिक स्वास्थ्य कानून पास किया जाये।
20- कीटनाशक दवाओं के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल के चलते हरियाणा के हर क्षेत्र, मानवीय, पशु व खेती में इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मानवीय स्तर पर इन कीटनाशकों की मात्रा पता लगाने के टैस्टों की सुविधा इस प्रदेश के इकलौते पीजीआईएमएस में भी नहीं है। कई तरह की बीमारियां इसके चलते बढ़ रही हैं या पैदा हो रही हैं। यह सुविधा तत्काल मुहैया करवाई जाए।
21- सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर - एक सर्जन, एक फिजिसियन, एक शिशु रोग विशेषज्ञ व एक महिला रोग विशेषज्ञ के प्रावधान के मानक केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा तय किये गए हैं। इसके साथ यदि मरीज बेहोशी का विशेषज्ञ नहीं है तो सर्जन और गायनकाॅलोजिस्ट तो अपंग हो जाते हैं। इसलिए इन पांचों विशेषज्ञों की नियुक्तियां प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों मे की जाए।
22. प्रदेश के जिलों में गुड़गांव, रोहतक, हिसार, भिवानी,फरीदाबाद और सोनीपत में विशेष आर्थिक पैकेज के तहत 1500 करोड़ रुपये की परियोजनांए शुरू की गइ्र हैं जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढांचे को विकसित करने के लिए इन जिलों के अस्पतालों को अपगे्रड करके सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल बनाये जा रहे हैं। बहुत ही हाईटेक उपकरण पिछले सालों में खरीदे गए जो बहुत कम जगह और कमतर स्तर पर इस्तेमाल किये जा रहे हैं। यहां पर उपयुक्त स्टाफ की कमी को पूरा करते हुए इसके लिए सम्बंधित विशेषज्ञों, डाॅक्टरों, नर्सों व पैरामैडिकल स्टाफ को उपयुक्त ट्रेनिंग देने की भी आवश्यकता है। निशुल्क सर्जीकल पैकेज योजना के तहत 2009 से बी. पी. एल परिवारों को दी जा रही निशुल्क सर्जरी की सेवा को लागू करने में आ रही सभी दिक्कतों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाये जायें। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व अधिसूचित झोंपड़ पट्टियों एवं बस्तियों के निवासियों के सभी आपरेशन मुफत करने की योजना को सही ढंग से लागू किया जाए । इंदिरा बाल स्वास्थ्य योजना 26 जनवरी 2010 से लागू की गई। जिसके तहत अठारह वर्ष तक की आयु के बचचों के स्वास्थ्य कार्ड बना कर सरकारी अस्पतालों में उनके स्वास्थ्य की निशुल्क जांच व ईलाज किया जाता है। बहुत से लोगों को इन सब योजनाओं से वाकिफ ही नहीं लगते ओर इनके क्रियान्वयन की दिक्कतों को भी दुरुस्त करने के कदम पहले सुझाये गये माध्यमों के द्वारा उठाये जायें। प्रदेश में 2005 तक एम. बी.बी.एस.की कुल सीटें 350 थी जो वर्ष 2013 में 850 हो गई। मगर इन विद्यार्थियों की गुणवता पूर्ण मैडीकल शिक्षा के लिए जरुरी फैकल्टी की काफी कमी है हरेक मैडीकल कालेज में और इन्फ्रास्ट्रक्चर की बहुत कमी है जिसे पूरा करना बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत दाल रोटी योजना को सही सही लागू किया जाए।
23- कुपोषण ;नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे- तीन के अनुसार, हरियाणा में बढ़ा है। दूर करने के लिए कारगर कदम उठाये जायें। इसी प्रकार गर्भवती महिलाओं में नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे तीन के अनुसार नैषनल फैमिली हैल्थ सर्वे दो के मुकाबले 10 प्रतिशत खून की कमी बढ़ी है। इसके साथ-साथ लड़कियों में किये गये सरकारी सर्वे में भी खून की कमी का प्रतिशत काफी पाया गया है। उचित कदम उठाये जाने की जरूरत है।
24-पी एन डी टी एक्ट के तहत उचित कार्यवाही की जाएं।
प्रस्तुतकर्ता डा रणबीर सिंह दहिया 
डॉ रणबीर सिंह दहिया 

Monday, 12 August 2019

पीपुल्स हेल्थ मेनिफेस्टो, 2019





जन स्वास्थ्य अभियान
अल्मा अता सम्मेलन की 40 वीं वर्षगांठ को याद करते हुए जो घोषित किया
‘स्वास्थ्य के लिए सभी’, जन स्वास्थ्य अभियान (श्रै।) स्वास्थ्य के अधिकार पर जोरदार प्रभाव डालता है
भारत के सभी लोगों की देखभाल। हम जनविरोधी कदमों के बारे में अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हैं
स्वास्थ्य क्षेत्र में वर्तमान सरकार द्वारा लिया जा रहा है। हम विभिन्न नकारात्मक का पुरजोर विरोध करते हैं
नीतिगत रुझान जैसेरू
ऽ स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक बनाने के लिए एक संवैधानिक संशोधन को स्थानांतरित करने में विफलता
भारतीय संविधान में अधिकार
ऽ हालिया राष्ट्रीय स्वास्थ्य बजट को वास्तविक रूप से कम किया जा रहा है,
ऽ सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और विभिन्न प्रतिगामी चरणों के उन्नयन के विषय में
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन;
ऽ पदह प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ’(च्डश्र।ल्) या राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण का शुभारंभ
वह योजना जो बड़े पैमाने पर होने के बावजूद बदनाम पे बीमा मॉडल ’पर आधारित है
ऐसी बीमा आधारित योजनाओं की प्रभावशीलता के खिलाफ साक्ष्य प्रमुख हैं
सेवा वितरण में निजी क्षेत्र की भागीदारी;
ऽ जिला अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के लिए कदम;
ऽ चिकित्सा शिक्षा का अधिक निगमितकरण अधिक कैपिटेशन आधारित गुंजाइश देता है
छात्र नामांकन।
ऽ निजी चिकित्सा क्षेत्र के प्रभावी विनियमन को सुनिश्चित करने के लिए मना करना, अनुमति देना
यह क्षेत्र विशेष रूप से कॉर्पाेरेट द्वारा रोगियों की लागत पर बड़े पैमाने पर मुनाफाखोरी जारी रखने के लिए है
अस्पतालों;
ऽ उत्पादन की लागत के आधार पर दवाओं की कीमतों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने की अनिच्छा।
सैकड़ों तर्कहीन और हानिकारक फिक्स्ड डोज ड्रग कॉम्बिनेशन की मार्केटिंग की अनुमति
(थ्क्ब्े)।
ऽ फार्मास्युटिकल द्वारा अनैतिक विपणन प्रथाओं को समाप्त करने के लिए एक कानूनी कोड नहीं लाना
उद्योग;
ऽ संबंधित आबादी के व्यापक वर्गों के चल रहे बहिष्करण और हाशिए पर
गुणवत्ता स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच
ऽ इस संदर्भ में, हम निम्नलिखित नीति कार्यों का प्रस्ताव करते हैं, विशेष रूप से संदर्भ में
3
विभिन्न आगामी राज्य विधानसभा चुनाव और संसदीय चुनाव, प्रतिबद्ध होने के लिए
सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा। यह इस उम्मीद के साथ है कि पक्ष
जो सत्ता में आते हैं उन्हें इन नीतिगत उपायों को लागू करना चाहिए, और जो कि
विपक्ष में सेवा सभी में इन प्रस्तावों और मांगों को उठाना जारी रखना चाहिए
निर्वाचित निकायों के भीतर और बाहर उपलब्ध फ़ोरम। जेएसए समवर्ती रूप से जुटाएगा
और चारों ओर एक आम सहमति बनाने के लिए लोगों के विभिन्न वर्गों के बीच अभियान
तत्काल कार्यवाही हम प्रस्तावित करते हैं।
ऽ 1. उचित के अधिनियमन के माध्यम से स्वास्थ्यप्रद अधिकार का अधिकार लें
केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर विधान। ऐसे विधान सुनिश्चित करने चाहिए
पूरी गुणवत्ता सहित अच्छी गुणवत्ता और व्यापक स्वास्थ्य देखभाल तक सार्वभौमिक पहुंच
संपूर्ण जनसंख्या के लिए प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक सेवाओं की श्रेणी। यह होना ही चाहिए
एक सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून के साथ होना चाहिए जो लोगों की पहुँच सुनिश्चित करता है
स्वास्थ्य निर्धारकों और स्वास्थ्य हानि प्रभावों से सुरक्षा की सीमा। इन
स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवा को मौलिक बनाने की प्रक्रिया में योगदान देना चाहिए
भारतीय संविधान में अधिकार।
ऽ 2, मुख्य रूप से के माध्यम से वित्त पर, स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय में काफी वृद्धि करें
सामान्य कराधान, सकल घरेलू उत्पाद का 3.5ः (यह सालाना लगभग 4,000 रुपये प्रति व्यक्ति होगा)
वर्तमान दरों में, जैसा कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति -2017 द्वारा सिफारिश की गई है) संक्षेप में
मध्यम अवधि में सकल घरेलू उत्पाद का 5ः और सकल घरेलू उत्पाद का 5ः, खर्च का कम से कम 60ः होने के साथ
केंद्र द्वारा वहन और राज्यों द्वारा 40ः।
ऽ आगे यह सुनिश्चित करें कि स्वास्थ्य पर जेब खर्च से बाहर, जो वर्तमान में अनुचित है
उच्च, तेजी से कम हो जाता है और कुल स्वास्थ्य देखभाल खर्च का एक-चौथाई से भी कम हो जाता है।
केंद्र राज्यों में राजकोषीय शक्तियों के केंद्रीकरण के कारण गंभीर हैं
वित्तीय बाधाओं और इसे बहुत अधिक विकेंद्रीकरण द्वारा संबोधित किया जाना चाहिए
केंद्र और राज्यों के बीच राजकोषीय संबंध। केंद्र को योगदान करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए
अतिरिक्त मानव संसाधनों के लिए भुगतान करने के लिए पर्याप्त है। उदाहरण के लिए, इसके विपरीत
हेल्थ और वेलनेस के लिए 1200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आवंटन नहीं किया गया है
केंद्र और इस राशि को राष्ट्रीय स्वास्थ्य के लिए बजट से काटा जाएगा
मिशन (एनएचएम), और राज्यों में अतिरिक्त बहिष्कार के लिए अतिरिक्त वित्तीय भार होगा।
यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 को स्थानांतरित करने की प्रतिबद्धता को धोखा देगा
अत्यधिक चयनात्मक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल से जिसे स्वास्थ्य के हिस्से के रूप में लगाया गया था
क्षेत्र में सुधार
नब्बे के दशक में एक व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की ओर।
ऽ ऽ गुणवत्ता और उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत और मजबूत बनाना
प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तर के लिए उपयुक्त स्वास्थ्य देखभाल, पूरी तरह से मुक्त
उपयोगकर्ता शुल्क और प्रदान करते हैं, आवश्यक दवाओं और निदान की पूरी श्रृंखला के लिए सार्वभौमिक पहुंच
एक मेल खाती मानव संसाधन नीति के साथ सार्वजनिक सुविधा में और बहुत बेहतर है
शासन और प्रबंधन। इस तरह की मजबूती के लिए पूरकता की आवश्यकता हो सकती है
निजी प्रदाताओं को चुनिंदा सेवाओं के लिए रेफरल, अक्सर विशेषज्ञ जहां ये नहीं हैं  कब्जा कर लिया गया
इस तरह की मजबूती के लिए पूरकता की आवश्यकता हो सकती है
निजी प्रदाताओं को चुनिंदा सेवाओं के लिए रेफरल, अक्सर विशेषज्ञ जहां ये नहीं हैं
घर में व्यवस्था करना संभव है। निजी एजेंसियों द्वारा अनुपूरक भी हो सकते हैं
4
कुछ सहायक देने के लिए सार्वजनिक सेवाओं की क्षमता का विस्तार करने की आवश्यकता है
सहायक सेवाएं। दिशा चुनिंदा निजी स्वास्थ्य देखभाल का उपयोग करेगी
सार्वजनिक प्रणालियों को मजबूत करने के लिए संसाधन, प्रस्तावित के दृष्टिकोण के विपरीत
अंधाधुंध तरीके से आयुष्मान भारत कार्यक्रम के तहत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (च्डश्र।ल्)
निजी स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं को मजबूत करने के लिए सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग करना।
ऽ ऽ निगरानी और विश्लेषण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता को बढ़ाया जाना चाहिए
सामाजिक निर्धारकों के नए तत्वों को रोकने और कम करने की सिफारिश करने के लिए
उपाय। अंतर-क्षेत्रीय समन्वय की परिकल्पना की जानी चाहिए ताकि सरकार विभागों
स्वास्थ्य के इन सामाजिक निर्धारकों को बेहतर बनाने के लिए विभिन्न स्तरों पर एक साथ कार्य करें।
5. ऽ सुनिश्चित करें कि सरकारी डॉक्टरों द्वारा जनता के हिस्से के रूप में कोई निजी अभ्यास नहीं किया जाता है
स्वास्थ्य सेवाएं।
ऽ 6.प्उचतवअम, मौलिक रूप से लोकतांत्रिककरण करते हैं और मात्रा के संदर्भ में दोनों का विस्तार करते हैं
और गुणवत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली यह एक अग्रणी और विनियमन खेलने के लिए सक्षम करने के लिए
राष्ट्रीय स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में भूमिका। अच्छा है और सक्रिय रूप से एक मुख्य रूप से बढ़ावा देने के
यूनिवर्सल हेल्थ केयर के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली आधारित रूपरेखा (ेलेजमउ कवरेज ’या नहीं)
श्आश्वासनश्)। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख विस्तार और सुदृढ़ीकरण हो सकता है
अंतरिम तंत्र के रूप में विनियमित निजी प्रदाताओं के कुछ अनुबंधों के साथ संयुक्त,
प्रावधान में वर्तमान अंतराल को कवर करने के लिए। जबकि ऐसा करना लक्ष्य होगा
सार्वजनिक अनंतिम की सीमा और पहुंच को अधिकतम करें
’ 1.।दकवद की योजना तव प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ”या“ राष्ट्रीय स्वास्थ्य ”के लिए है
संरक्षण योजना “आयुष्मान भारत के हिस्से के रूप में यह बदनाम पर आधारित है
’बीमा मॉडल’। रुपये का अनुमानित वार्षिक परिव्यय। 12,000-50,000 करोड़, के अनुसार
विभिन्न अनुमानों को जनता के विस्तार में निवेश द्वारा बेहतर उपयोग किया जाएगा
स्थायी सार्वजनिक संपत्ति की सुविधाएं और निर्माण। सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित अब्सोर्ब
स्वास्थ्य बीमा योजनाओं (त्ैठल् और विभिन्न राज्य स्वास्थ्य बीमा योजनाओं) में
एक विस्तारित और मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली।
8. 8. आशा, आंगनवाड़ी और सहायकों सहित सभी संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों को नियमित करें
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के वितरण में शामिल हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें सुरक्षा प्राप्त हो
श्रम कानूनों की पूरी श्रृंखला से। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के सभी स्तर के कर्मचारी होंगे
पर्याप्त कौशल प्रशिक्षण, उचित मजदूरी और नियुक्ति और के सभी प्रावधानों के साथ प्रदान किया गया
सामाजिक सुरक्षा और सभ्य कामकाजी परिस्थितियाँ।

ऽ 9। व्यावसायिक स्वास्थ्य पर एक व्यापक नीति तैयार करना और उसे लागू करना और
सुरक्षा। व्यावसायिक स्वास्थ्य को चिकित्सा पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। जवाबदेही सुनिश्चित करें
और उल्लंघन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई। निगमों द्वारा सभी परियोजनाएँ
संभावित रूप से स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है सबसे पहले एक स्वास्थ्य प्रभाव आकलन में किया जाना चाहिए
पारदर्शी, भागीदारी और तकनीकी रूप से ध्वनि, जिसके आधार पर वे प्राप्त करते हैं
एक श्स्वास्थ्य मंजूरीश्
रु 10. स्वास्थ्य की संपूर्ण सीमा की शिक्षा और प्रशिक्षण में सार्वजनिक निवेश बढ़ाएँ
सरकार द्वारा संचालित महाविद्यालयों में क्षमता निर्माण सुनिश्चित करने के लिए कार्मिक। एक अच्छी तरह से स्थापित करें
स्थायी की पर्याप्त संख्या बनाकर मतदमक और पर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यबल
पोस्ट नहीं। सभी मौजूदा निजी के नियमन के लिए कठोर तंत्र रखें
संस्थान, जैसे मेडिकल और नर्सिंग कॉलेज, पारदर्शी तरीके से और जगह पर
नए निजी मेडिकल कॉलेजों की स्थापना या चार्जिंग पर स्थगन
कैपी टेशन फीस। ओवरहाल मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (डब्प्) और नर्सिंग काउंसिल
भ्रष्टाचार और अनैतिक प्रथाओं को खत्म करने के लिए भारत की लोकतांत्रिक रेखाओं के साथ। अनुमति दें
योग्यता को मिलाने वाले उम्मीदवारों की भर्ती के लिए विशिष्ट नियम और प्रक्रियाएं
और चयन में पारदर्शिता और मुश्किल में काम करने के लिए उपयुक्त उम्मीदवार ढूंढता है
क्षेत्रों।
ऽ 11. भारत सरकार, सभी राज्य सरकारों की सक्रिय भागीदारी के साथ, चाहिए
बिना किसी देरी के सभी आवश्यक और जीवन रक्षक दवाओं तक पहुंच की गारंटी
देश भर में सभी सार्वजनिक सुविधाओं में निदान। इस का दायरा और कवरेज
योजना तमिलनाडु, दिल्ली और राजस्थान में चल रही योजनाओं से कम नहीं होनी चाहिए,
जो आवश्यक दवाओं और चिकित्सा की पूरी श्रृंखला तक पहुंच सुनिश्चित करेगा
स्वास्थ्य सुविधाओं के सभी स्तरों पर बिना किसी शुल्क के जांच। सभी की उपलब्धता सुनिश्चित करें
सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में उपयुक्त, सुरक्षित और लागत प्रभावी टीके। पुनर्जीवित मौजूदा
सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ और सार्वजनिक क्षेत्र की नई दवाओं और वैक्सीन उत्पादन की स्थापना
देश में आत्मनिर्भर दवा उत्पादन के लिए इकाइयाँ। पर्याप्त धन मुहैया कराएं
सभी सार्वजनिक क्षेत्र के चिकित्सा अनुसंधान संस्थानों को। दवा अनुसंधान को प्रोत्साहित करें
ओपन सोर्स ड्रग डिस्कवरी मॉडल के माध्यम से।
ऽ 12. सरकार को एक वैज्ञानिक समर्थक जन औषधि नीति अपनानी चाहिए। की ओर
यह अंत, यह होना चाहिए
ऽ मूल्य के तहत सभी आवश्यक दवाओं और उनके एनालॉग्स के साथ-साथ चिकित्सा उपकरणों को भी लाओ
विनिर्माण लागत के आधार पर मूल्य निर्धारण की एक प्रणाली के माध्यम से नियंत्रण।
ऽ सभी तर्कहीन दवाओं और तर्कहीन फिक्स्ड खुराक दवा संयोजनों पर प्रतिबंध लगाएं
ऽ कानूनी रूप से यूनिफ़ॉर्म कोड को अपनाकर अनैतिक विपणन को प्रभावी रूप से विनियमित और समाप्त करना
फार्मास्यूटिकल्स मार्केटिंग प्रथाओं के लिए।
ऽ दवाओं, टीकों, डायग्नोस्टिक्स और चिकित्सा को कवर करने वाली एक तर्कसंगत दवा नीति को अपनाना
उपकरण और उपकरण।
ऽ पर्याप्त संख्या में जेनेरिक दवा के आउटलेट खोलने को बढ़ावा देना। सरकार
जेनेरिक दवा नीति तैयार करनी चाहिए जो निर्माताओं के लिए अनिवार्य हो
मुख्य लेबलिंग के रूप में जेनेरिक नाम (ब्रांड के बजाय) को प्रमुखता से प्रदर्शित करें
सभी उत्पादों, और डॉक्टरों के लिए सभी नुस्खे में सामान्य नाम का उपयोग करते हुए, सुनिश्चित करते हुए
जेनेरिक दवाओं की आसान उपलब्धता
ऽ दवाओं तक पहुंच को बढ़ावा देने के लिए भारतीय पेटेंट अधिनियम में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों का उपयोग करें,
पेटेंट के दुरुपयोग और अनिवार्य लाइसेंस के खिलाफ सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए
पेटेंट दवाओं के स्थानीय निर्माता के लिए होना चाहिए। नवप्रवर्तन इको-सिस्टम का निर्माण करें
सक्रिय रूप से दवा और नैदानिक नवाचार को बढ़ावा देना सुनिश्चित करने के लिए कि निदान
और विशेष रूप से अनाथ के लिए हमारी बदलती स्वास्थ्य आवश्यकताओं को संबोधित करने के लिए आवश्यक चिकित्सा
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रोगों।
ऽ सार्वजनिक दवा उद्योगों और वैक्सीन निर्माण इकाइयों को मजबूत किया जाना चाहिए,
निजीकरण होने के बजाय।
रु 1. सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में पारदर्शी नीतियों के माध्यम से भ्रष्टाचार को कम करना
नियुक्तियों, पदोन्नति, स्थानान्तरण, वस्तुओं और सेवाओं की खरीद और बुनियादी ढाँचा
एक पारदर्शिता अधिनियम, और संस्थान की मजबूत शिकायत निवारण के माध्यम से विकास
सिस्टम, जो कि कुछ स्वायत्तता के साथ पर्याप्त रूप से वित्तपोषित और प्रबंधित होते हैं
कार्यक्रमों और नीतियों के कार्यान्वयन में शामिल प्रणालियों से। अलग से स्थापित करें
केंद्र और राज्यों में खाद्य और औषधि न्यायालय। डॉक्टरों के निजी अभ्यास पर प्रतिबंध
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में नियोजित कड़ाई से लागू किया जाएगा
 5. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की समुदाय आधारित योजना और निगरानी में विविधता लाएं
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सभी स्तरों पर।
समय के साथ, एक लोकतांत्रिक, समुदाय संचालित स्वास्थ्य प्रणाली और एक की ओर बढ़ें
स्वास्थ्य देखभाल की रूपरेखा जो विभिन्न सामुदायिक आवश्यकताओं और धारणाओं को ध्यान में रखती है।
समुदाय आधारित निगरानी, शिकायत निवारण की भागीदारी प्रणाली
और यह सुनिश्चित करने के लिए योजना बनाई जाएगी कि हर क्षेत्र के लोग सक्षम होंगे
जवाबदेही तंत्र के साथ उचित स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करने के लिए,
शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई चाहते हैं, और बेहतर कामकाज के लिए मजबूत आवाज है
उनके क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं।
’ 5.म्Ûचंदक और म्ैप् प्रणाली को मजबूत। एक व्यापक प्रणाली का समावेश सुनिश्चित करें
असंगठित और संगठित क्षेत्रों में श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य देखभाल सुरक्षा,
कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) अधिनियम के विस्तार और कायाकल्प के साथ जुड़ा हुआ है,
1948. असंगठित क्षेत्र और कृषि क्षेत्र में श्रमिकों को विशेष रूप से शामिल करें,
जो वर्तमान में किसी भी प्रकार के सामाजिक संरक्षण तंत्र से आच्छादित नहीं हैं।
ऽ 16. निजी चिकित्सा क्षेत्र को प्रभावी ढंग से विनियमित करना - राष्ट्रीय नैदानिक प्रतिष्ठान को संशोधित करना
रोगी के अधिकारों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अधिनियम -2010; दरों का नियमन
और विभिन्न सेवाओं की गुणवत्ता; नुस्खे, डायग्नोस्टिक्स के लिए किकबैक का उन्मूलन
और रेफरल; और मरीजों के लिए शिकायत निवारण तंत्र। सभी राज्यों को चाहिए
राष्ट्रीय अधिनियम या एक राज्य विशिष्ट अधिनियम को अपनाना, जिसमें सभी सुविधाएँ सम्मिलित हों
राष्ट्रीय अधिनियम। सार्वजनिक रूप से प्रबंधित प्रवेश प्रणाली और नियमित रेफरल की स्थापना करें
सरकारी अस्पतालों और धर्मार्थ ट्रस्ट अस्पतालों के बीच, प्रभावी ढंग से बेड का उपयोग करने के लिए
ट्रस्ट और निजी अस्पतालों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के रोगियों के लिए
उपकरणों की खरीद में अत्यधिक रियायती दरों और कर रियायतों पर भूमि दी गई है।
ऽ 17. विभिन्न प्रकार के। पीपीपी ’जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को कमजोर करते हैं, उन्हें समाप्त किया जाना चाहिए।
इसके बजाय, जहां सार्वजनिक प्रावधान में अंतराल को भरने के लिए आवश्यक है, सेवाओं को संदर्भित किया जा सकता है
निजी प्रदाता इस तरह से सहमत होते हैं कि वे बड़ी जनता की सेवा करते हैं
स्वास्थ्य लक्ष्य
ऽ 18.ैनचचवतज चिकित्सा बहुवचन कि लोगों को गैर एलोपैथिक का उपयोग करने के लिए एक विकल्प है
सुरक्षित घर-आधारित बर्थिंग प्रथाओं सहित उपचार की प्रणाली। पर्याप्त एन 7
शोध को गैर-एलोपैथिक से संबंधित अनुसंधान और प्रलेखन को दिया जाना चाहिए
सिस्टम।
ऽ 19. यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष उपाय अपनाएं कि कमजोर आबादी और साथ के लोग
विशेष आवश्यकताओं को व्यापक, सुलभ, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच प्राप्त है -
सामाजिक स्थिति (जैसे महिलाएं, दलित, आदिवासी) के कारण भेद्यता होने पर,
विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह, शरणार्थी और प्रवासी आबादी, कतार और
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों), संघर्ष क्षेत्रों में लोग; स्वास्थ्य की स्थिति के कारण (जैसे एचआईवी स्थिति),
अधिभोग (जैसे मैनुअल स्कैवेंजर्स, चीर बीनने वाले), अलग-अलग एबल्ड व्यक्ति, बच्चे
और बुजुर्ग व्यक्ति, या किसी अन्य प्रकार की भेद्यता के कारण। जाति के सभी रूपों और
धर्म-आधारित और स्वास्थ्य देखभाल में भेदभाव के अन्य रूपों को समाप्त किया जाएगा
विभिन्न सक्रिय उपायों के माध्यम से।
ऽ सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में लिंग आधारित हिंसा को मान्यता देना और पहुँच सुनिश्चित करना
शीघ्र बचाव और पुनर्प्राप्ति देखभाल, आवश्यक और निरंतर के रूप में व्यापक चिकित्सा देखभाल
इससे प्रभावित लोगों के लिए समर्थन। ळठट को संबोधित करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएंगे
सभी श्रेणियों के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा अनुभव किया गया। तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए उपायों को अपनाएँ
महिलाओं, किशोरों के लिए समान, सतत गुणवत्ता वाले स्वास्थ्य देखभाल के पूरे स्पेक्ट्रम
बच्चों, कतार, सभी पृष्ठभूमि के ट्रांस-व्यक्तियों और हिंसा की सभी स्थितियों में।
ऽ 20. सभी गर्भवती और प्रसवोत्तर माताओं के लिए मातृत्व लाभ
संविदा कर्मी, दैनिक वेतन भोगी, असंगठित क्षेत्र के सभी श्रमिक और
कृषि क्षेत्र। सभी में छोटे बच्चों के साथ माताओं के लिए क्रेच और रेस्ट रूम प्रदान करें
काम के स्थान।
जाति और समुदाय के सभी रूपों को समाप्त करने के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाएं।
धर्म आधारित भेदभाव किसी भी भेदभाव या गोत्र के आधार पर या
जातीयता, स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र में और उससे आगे। को खत्म करने के लिए तत्काल कदम उठाएं
मैनुअल मैला ढोने की जघन्य प्रथा।
ऽ 22. मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों वाले व्यक्तियों के लिए व्यापक उपचार और देखभाल
संशोधित जिले के सुदृढ़ कार्यान्वयन और एकीकरण के माध्यम से
राष्ट्रीय मानसिक के ढांचे के भीतर एनएचएम के साथ मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम
स्वास्थ्य बीमा।
ऽ 23. बहुपक्षीय और द्विपक्षीय वित्तपोषण एजेंसियों द्वारा हस्तक्षेप को कम करना और
कॉर्पाेरेट कंसल्टेंसी संगठन (जैसे विश्व बैंक, यूएसएआईडी और बिल एंड मेलिंडा)
गेट्स फाउंडेशन, डेलॉइट और मैकिन्से आदि) सभी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति से
सूत्रीकरण और रणनीति विकास। सुनिश्चित करें कि भारतीय अनुसंधान संस्थानों के पास है
फंडिंग के वैकल्पिक राष्ट्रीय स्रोत और उन पर निर्भर बनने की जरूरत नहीं है।
ऽ 24. नैदानिक परीक्षणों के अनुमोदन और आचरण के कड़े विनियमन को सुनिश्चित करना,
निष्पक्ष रूप से सुनिश्चित करने के साथ, पीड़ित प्रतिभागियों के लिए समय पर मुआवजा
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के साथ प्रतिकूल घटनाओं से
परीक्षण स्थलों पर नैदानिक परीक्षणों के संचालन की निगरानी करना। उचित, समय पर मुआवजा सुनिश्चित करें
परीक्षण प्रतिभागियों के लिए जो प्रतिकूल घटनाओं से पीड़ित हैं। एक न्यायसंगत चार्टर विकसित करें
नैदानिक परीक्षण प्रतिभागियों के अधिकारों का।
8
ऽ 25.च्तवउवजम उपयुक्त सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य प्रणाली अनुसंधानरू महत्वपूर्ण रूप से
सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य के लिए विभागों और केंद्रों की उन्नयन और निर्माण क्षमता
सिस्टम अनुसंधान। इस तरह के अध्ययनों के निष्कर्षों के लिए अग्रणी कार्रवाई का मार्गदर्शन करने में सक्षम होना चाहिए
सामाजिक निर्धारकों और स्वास्थ्य प्रणालियों की एक बेहतर समझ और अभिनव के लिए नेतृत्व
सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों और सरकारी कार्रवाई के कामकाज में सुधार के तरीके।
इस तरह के अनुसंधान के वित्तपोषण और कार्यान्वयन को सख्त और सतर्क आकलन से गुजरना पड़ता है
एक ऐसी स्थिति जिसमें सरकारी अधिकारी का निर्णय उसकी व्यक्तिगत रूचि से प्रभावित हो।
ऽ 26 पारंपरिक और नए मान्यता प्राप्त / दोनों से निपटने के लिए योजनाबद्ध तरीके से
स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों में उभरती हुई विकृतिरू यह सुधार करके किया जाना चाहिए
खाद्य सुरक्षा और पोषण, स्वच्छता के साथ-साथ नए विकसित किए गए अवरोधकों को संबोधित करना
पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, तनावपूर्ण जैसे सामाजिक निर्धारकों में
काम की परिस्थितियों, समझौता सड़क सुरक्षा और कमजोर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली,
नशीला पदार्थ जैसे तंबाकू, शराब आदि और हिंसा जिसमें लिंग-आधारित भी शामिल है
हिंसा। इन क्षेत्रों पर मौजूदा कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन और आवश्यक
लोगों के अधिकार की रक्षा के लिए कुछ कृत्यों में संशोधन
ऽ 27.न्दपअमतेंसप्रम और आईसीडीएस कार्यक्रम का विस्तार करके अंडर -3 बच्चों को प्रभावी ढंग से कवर करने के लिए
और समुदाय के स्वामित्व वाले ब्ड।ड को सार्वभौमिक बनाना (कुपोषण के समुदाय आधारित प्रबंधन)
स्वास्थ्य और भलाई के लिए महत्वपूर्ण के रूप में कार्यक्रमों और डेकेयर सेवाएं
महिलाओं और बच्चों दोनों के साथ-साथ कुपोषण में हस्तक्षेप। ”
ऽ 28. स्वास्थ्य सेवाओं या किसी भी उपयोग के लिए आधार लिंक अनिवार्य करने की आवश्यकता
स्वास्थ्य संबंधी सार्वजनिक सेवाएं या योजनाएं और लाभ।
ऽ 29. व्यापक रक्षा और लोकतंत्र के विस्तार के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभावी कार्रवाई
और सभी स्तरों पर धर्मनिरपेक्षता। स्वास्थ्य नीति और मौजूदा प्रणालियों की समीक्षा करें
सुनिश्चित करें कि ये किसी भी प्रकार के प्रमुख कट्टरवाद, भेदभाव को रोकें
अल्पसंख्यकों के खिलाफ, संघर्ष स्थितियों में देखभाल से इनकार, और कलंक या इनकार
श्दूसरोंश् या श्बाहरी लोगोंश् के रूप में लेबल किए गए व्यक्तियों की देखभाल सुनिश्चित करें कि सभी स्तरों पर स्वास्थ्य प्रणाली
अधिकतम रूप से समावेशी और न्यायसंगत हैं, और प्रचार करने के लिए दृढ़ता से परियोजना संदेश देते हैं
लोकतांत्रिक समावेश, धर्मनिरपेक्षता, मानवता और शांति का एक लोकाचार। जनता पर कार्रवाई
स्वास्थ्य को सभी स्तरों पर लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के विस्तार के साथ एकीकृत किया जाएगा।
इस क्षेत्र में शांति और एकजुटता को बढ़ावा देते हुए।
ऽ हम सभी राजनीतिक दलों और इच्छुक उम्मीदवारों को सबसे अधिक देने की अपील करते हैं
अपने एजेंडे में लोगों के स्वास्थ्य के लिए राजनीतिक प्राथमिकता। के 40 वें वर्ष में
एक राष्ट्र के रूप में हम सभी के लिए श्स्वास्थ्य के लिए अल्मा अता घोषणाश् को अपनाना
अंतर-क्षेत्रीय कार्रवाई और सामुदायिक सशक्तिकरण की अवधारणाओं को पुनर्जीवित करना चाहिए
स्वास्थ्य के लिए केंद्रीय होने के नाते।
9
जन स्वाध्याय अभयदान
राष्ट्रीय सचिवालय
महिलाओं और स्वास्थ्य के लिए सम-संसाधन समूह
बी -45, दूसरी मंजिल, मुख्य शिवालिक रोड,
मालवीय नगर छम्ॅ क्म्स्भ्प् -110017

जन स्वास्थ्य घोषणा पत्र के मुख्य सूचक


1. स्वास्थ्य के अधिकार को देश के हर व्यक्ति के लिए न्यायोचित अधिकार बनाया जाए , केंद्र और राज्य स्तर पर
उपयुक्त कानून सुनिश्चित करके ।
2. एक सार्वभौमिक स्वास्थ्य प्रणाली (यूनिवर्सल हेल्थ केयर) की स्थापना हो जो ना केवल स्वास्थ्य सेवाओं को व्यापित
करे बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को सभी स्तरों पर विस्तृत और सशक्त किया जाए । अंतरिम तंत्र के रूप में निजी
प्रदाताओं को कुछ जिम्मेदारियां दी जाएं ताकि स्वास्थ्य रक्षा में वर्तमान कमियों को भरा जा सके । यह सार्वभौमिक
स्वास्थ्य प्रणाली (यूनिवर्सल हेल्थ केयर ) लोगों को पूर्ण रूप से निशुल्क और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करेगी,
बिना किसी निजी जेब खर्च के के।
3. स्वास्थ्य प्रणाली के लिए आवश्यक बजट आवंटन, मानव संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर सुनिश्चित किया जाए रू
सामान्य कराधान के जरिए वित्त पोषण से स्वास्थ्य पर सरकारी व्यय में भारी वृद्धि की जाए , जो तुरंत जीडीपी के
3.5ः के बराबर हो। (यह वर्तमान दरों पर पर वार्षिक रूप से प्रति व्यक्ति ₹4000 हो, जैसा कि 2017 की राष्ट्रीय
स्वास्थ्य नीति में सिफारिश की गई है ) और कुछ वर्षों में में में जीडीपी के 5ः के बराबर हो। और यह स्वास्थ्य के कुल
व्यय का का एक चौथाई से भी कम किया जाए।
4.. हर व्यक्ति के लिए यह अधिकार सुनिश्चित किया जाए कि वह सभी आवश्यक औषधियों एवम जांच सेवाओं को
निशुल्क किसी भी सरकारी अस्पतालों से प्राप्त कर पाए। इसकी व्यापकता दूसरे राज्यों जैसे तमिल नाडू , दिल्ली एवम
राजस्थान में चल रही योजनाओं समान होंगी, जिससे लोगों को पूर्ण रूप से निशुल्क आवश्यक औषधियां एवं सरकारी
स्वास्थ्य सेवाओं के सभी स्तरों पर मिलें।
5. आयुष्मान भारत के तहत -रु39; प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना -रु39; या -रु39;राष्ट्रीय स्वास्थ्य रक्षा मिशन -रु39; की योजना को त्याग
दिया जाए , जो बदनाम बीमा मॉडल पर आधारित है। इसके बजाय वर्तमान सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को एक
विस्तारित और मजबूत सार्व जनिक प्रणाली में समाहित किया जाए।
6. स्वास्थ्य सेवाओं का परिचालन इस प्रकार होना चाहिए कि कुछ चुनिंदा सेवाओं के लिए ही निजी स्वास्थ्य प्रदय
कर्ताओं का उपयोग किया जाए ताकि सार्वजनिक प्रणाली को मजबूत किया जाए । परंतु इसकी दिशा प्रस्तावित
आयुष्मान भारत कार्यक्रम की रणनीति जैसी नहीं होगी, जिसमें सार्व जणिक संसाधनों को अंधाधुंध तरीके से निजी
स्वास्थ्य क्षेत्र को सौंपा जा रहा है ।
7. जन स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के सभी रूपों को रोका जाएगा और विभिन्न प्रकार के सरकारी निजी -
साझेदारियों ( पब्लिक प्राइवेट पार्टनरसिप )- जो सार्वजनिक प्रणाली को कमजोर कर रही है, उसे खारिज किया
जाएगा। जो संसाधन निजी संस्थाओं को मजबूत करने के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं , उन्हें सार्वजनिक सेवाओं को बढ़ाने
और स्थाई रूप से सार्वजनिक पूंजी का निर्माण करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।
-- सार्वजनिक सेवाओं को कमजोर बनाने वाली सरकारी -निजी भागीदारी यों को समाप्त किया जाए । ऐसी योजनाओं
में खर्च होने वाले पैसों को सरकारी स्वास्थ्य तंत्र के विस्तार और स्थाई सार्वजनिक सं पती के सृजन में निवेश किया
जाए, जिससे इन पैसों का बेहतर उपयोग होगा।
8. निजी मेडिकल क्षेत्र और कारपोरेट अस्पताल का नियंत्रण और राष्ट्रीय नैदानिक प्रतिष्ठान अधिनियम ( किलिनिकल

एसटाबिलिस्मेंट एक्ट ) के द्वारा किया जाए , ताकि मरीजों के अधिकारों का अनुपालन हो सके , विभिन्न सेवाओं की
दरों एवं उनकी गुणवत्ता के विनियमन हों , डाक्टरों द्वारा निदानन और रेफरल में घूसखोरी को रोकने और मरीजों की
शिकायतों का निपटारा सुनिश्चित किया जाए । सभी राज्यों द्वारा राष्ट्रीय अधिनियम या राज्य विशेष अधिनियम को
अपनाया जाए।
9. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के समुदाय आधारित नियोजन - एवं निगरानी रू
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही और अनुकूलता को सुनिश्चित करने के लिए सभी स्तरों पर सार्वजनिक
स्वास्थ्य सेवाओं के समुदाय आधारित नियोजन -एवं निगरानी को सार्वभौमिक बनाया जाए , जिससे एक लोकतंत्रिकृत
, समुदाय संचालित स्वास्थ्य प्रणाली और एक स्वास्थ्य देखभाल की रूपरेखा की तरफ कदम बढ़ाया जाए।
10. सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए पारदर्शिता अधिनियम के जरिए नियुक्ति, पदोन्नति ,
स्थानांतरण , वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास किए जाएं ।
11. सभी कर्मचारियों को जो ठेके (कांट्रेक्ट ) पर कार्यरत हैं जैसे कि आशा , आंगनवाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिका सहित
सभी कर्मचारियों को नियमित किया जाए और सुनिश्चित किया जाए कि उन्हें श्रम कानूनों से संरक्षण प्राप्त हो । सरकार
द्वारा संचालित कालेजों में क्षमता निर्माण के लिए सभी तरह के स्वास्थ्यकर्मियों की शिक्षा और प्रशिक्षण में सार्वजनिक
निवेश की वृद्धि सुनिश्चित की जाए । पर्याप्त संख्या में स्थाई पदों का सृजन कर सुप्रशासित और पर्याप्त जन स्वास्थ्य
कर्मियों का बल स्थापित किया जाए। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के सभी स्तरों के स्टाफ को पर्याप्त कौशल प्रशिक्षण ,
समुचित वेतन और स्थान नियोजन देने की व्यवस्था की जाए एवं कार्यस्थल में समुचित परिस्थितियां उपलब्ध हों।
12. सरकार को वैज्ञानिक रूप से जन हितैषी औषधीय नीति अपनानी होगी जिसमें औषधियों , टीकों, निदानों और
मेडिकल उपकरण शामिल होंगे , इसमें निर्माण लागत पर आधारित मूल्य निर्धारण प्रणाली के जरिए सभी आवश्यक
औषधियों और उनके अनुरूप पों ( एनोलोग्स) के साथ मेडिकल उपकरणों को मूल्य नियंत्रण के अन्तर्गत लाया जाएगा।
सभी युक्तिसंगत हीन औषधियों और युक्तिसंगत हीन नियत खुराक औषधि सम्मिश्रर्णों ( फिक्स्ड डोज ड्रग कॉम्बिनेशन )
पर प्रतिबन्ध लगाना , अनैतिक मार्केटिंग को असरदार ढ़ंग से विनियमित और उन्मूलन करना जिसके लिए औषधीय
मार्केटिंग के तौर तरीकों के बारे में समान कानू नी आचार संहिता (युनिफोर्म कोड़ फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग
प्रैक्टिसेस) को अपनाया जाएगा ।सरकार को एक जेनेरिक औषधि नीति तैयार करनी चाहिए और जेनेरिक औषधियों की
आसान उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए डाक्टरी नुस्खे में जेनेरिक नाम लिखने को अनिवार्य बनाना होगा, औषधियों तक
पहुंच को बढ़ावा देने के लिए भारतीय पेटेंट अधिनियम में सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बन्धी उपायों को स्थान देना। पेटेंट के
दुरूपयोग के खिलाफ सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए और आवश्यक औषधियों के निर्माण के लिए स्थानीय निर्माताओं
को अनिवार्य लाइसेंस दिए जाएं ।
13. कमजोर वर्गों और विशेष जरूरतों वाले समूहों के लिए स्वास्थ्य तक पहुंच में विशेष उपाय किए जाएं रू
इन वर्गों की कमजोरी का कारण सामाजिक स्थिति ( जैसे महिलाएं, दलित, आदिवासी) , स्वास्थ्य स्थिति (जैसे एच आई
वी से पीड़ित), पेशा( शारीरिक रूप से मैला ढोने वाले), सक्षमता, उम्र या कोई अन्य हो सकता है । सभी महिलाओं ,
बेघरों , सड़कों पर भटकने वाले बच्चों , विशेषकर कमजोर आदिवासी समूहों, शरणार्थियों , प्रवासी लोगों तथा ट्रांसजेंडर
व्यक्तियों को स्वास्थ्य सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति की गारंटी दी जाए । जाति और समुदाय /धर्म -आधारित
भेदभाव के सभी रूपों का उन्मूलन किया जाए। स्वास्थ्य सेवाओं या स्वास्थ्य से सम्बन्धित सार्वजनिक किसी भी सेवा या
योजना तक पहुंच के लिए आधार लिंक की अनिवार्यता को समाप्त किया जाए ।
14. जेंडर आधारित हिंसा को एक जन स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दा माना जाए और आवश्यकता पड़ने पर शीघ्र बचाव एवं
स्वास्थ्य देखभाल, व्यापक मेडिकल देखभाल और पीड़ितों को लगातार सहायता सुनिश्चित की जाए ।

15. सभी गर्भवती और धात्री माताओं के लिए मातृत्व भत्ता सार्वभौमिक बनाया जाएगा।
16. आई. सी. डी. एस. कार्यक्रम को सार्वभौमिक बनाया जाए और इसमें तीन साल से कम उम्र के बच्चों को खास तौर से
असरदार ढ़ंग से शामिल किया जाए , जिसमें कुपोषण का समुदाय आधारित प्रबन्धन और दिन में देखभाल करने की
सेवाएं हों।
17. व्यवसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा पर व्यापक नीति निर्माण और अमल हो एवं असंगठित एवं कृषि क्षेत्रों में कार्यरत
कर्मियों के लिए कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम (ई. एस.आई . ),1948 को विस्तारित और सशक्त किया जाए ।
18. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में संशोधित जिला कार्यक्रम और समुचित कार्यान्वयन के जरिए मानसिक स्वास्थ्य के मसलों
से सम्बन्धित व्यक्तियों के व्यापक इलाज और देखभाल को सुनिश्चित किया जाए ।
19. मेडिकल बहुलता को समर्थन हो ताकि लोगों के पास गैर एलोपैथिक चिकित्सा का विकल्प उपलब्ध रहे , जिसमें घर
प्रसूति सम्बन्धी सुरक्षित तरीका भी शामिल है । गैर एलोपैथिक प्रणालियों से सम्बन्धित अनुसंधान और दस्तावेजीकरण
को भारी बढ़ावा दिया जाए ।
20. बहुपक्षीय और द्विपक्षीय वितपोषण एजेंसियों तथा कारपोरेट कंसलटेंसी संगठनों
( जैसे-विश्व बैंक, यू. एस. ए.आई . डी.,गेट्स फाउंडेशन , डिलोइट और मैकिंजी आदि) का सभी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति
निर्माण और रणनीति विकास में हस्तक्षेप समाप्त किया जाए ।
21. नैदानिक परीक्षणों के अनुमोदन और आयोजन के लिए कड़े विनियमन पर अमल किया जाए , जिसमें निष्पक्ष और
परीक्षण के उन प्रतिभागियों को समय पर प्रतिपूर्ति सुनिश्चित की जाए जो प्रतिकूल प्रभावों से पीड़ित होते हैं एवं
परीक्षण स्थलों पर नैदानिक परीक्षणों के आयोजन पर सी. डी. एस.सी.ओ.(ब्क्ैब्व्) कड़ी निगरानी रखे ।
22. सभी के लिए स्वास्थ्य का अधिकार की पूर्ति की ओर बढ़ने के लिए स्वास्थ्य के सामाजिक कारकों को व्यवस्थित ढंग
से संबोधित करना जिसमें खाद्य सुरक्षा , पोषण एवं स्वच्छता के साथ पर्यावरणीय प्रदूषण , तनावपूर्ण कार्य
परिस्थितियों , सड़क सुरक्षा की अपेक्षा , तम्बाकू, अल्कोहल आदि जैसे व्यसंकारी पदार्थों और जेंडर आधारित हिंसा
सहित अन्य प्रकार की हिंसा पर ध्यान दिया जाए। जन स्वास्थ्य के कार्यों का एकीकरण सभी स्तरों पर लोकतांत्रिक
समावेशन , धर्मनिरपेक्षता , मानवता एवं क्षेत्रीय स्तर पर शांति के साथ किया जाए।
जन स्वास्थ्य अभियान, जन स्वास्थ्य आंदोलन का भारतीय इकाई है, जो व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सुरक्षा एवं स्वास्थ्य
के सामाजिक निर्धारकों पर कार्य करते हुए स्वास्थ्य और न्याय संगत विकास को सर्वाेच्च प्राथमिकता ओं के रूप में
स्थापित करने के लिए एक विश्वव्यापी आंदोलन है और इसमें 20 से अधिक नेटवर्क और 1000 संगठन और बड़ी संख्या में
व्यक्ति भी शामिल हैं
जन स्वास्थ्य अभियान की ओर से
अभय शुक्ला
सरोजिनी नदिंपल्ली
सुलक्षणा नंदी

कुपोषण

बाल कुपोषण के भयावह आँकड़े व सरकारों की अपराधी उदासीनता
आने वाली एक पूरी पीढ़ी को अपंग व बीमार बनाती व्यवस्था
डॉ. पावेल पराशर

बीती 13 जनवरी को झारखण्ड की रघुबर सरकार ने मिड डे मील के तहत बच्चों को मिलने वाले अण्डों में कटौती की घोषणा करते हुए इसे हफ़्ते में तीन से दो करने का फै़सला ले लिया। सरकार ने इसका कारण बताया है कि हर दिन बच्चों को अण्डा खिलाना सरकार के लिए “महँगा” सौदा पड़ रहा है। ताज्जुब की बात है कि राज्य की खनिज सम्पदाओं, जंगलों, पहाड़ों को अपने कॉर्पाेरेट मित्रों के हाथों औने-पौने दाम पर बेचना सरकार को कभी “महँगा” नहीं पड़ा। ग़ौरतलब है कि झारखण्ड देश के सबसे कुपोषित राज्यों में से एक है और खनिज व प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस राज्य के 62ः बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। राज्य के कुल कुपोषित बच्चों में से 47ः बच्चों में ‘स्टण्टिंग’ यानी उम्र के अनुपात में औसत से कम लम्बाई पायी गयी है जो कि कुपोषण की वजह से शरीर पर पड़ने वाले अपरिवर्तनीय प्रभावों में से एक है। पूरे देश के कुपोषण के आँकड़ों पर नज़र डालें तो न्छप्ब्म्थ् के अनुसार भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के 39ः बच्चे स्टण्टिंग के शिकार हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आने वाली एक पूरी पीढ़ी, कुपोषण के दुष्प्रभावों की वजह से ठिगनी रह जाने को अभिशप्त है। ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट, 2018 (जीएनआर) के अनुसार विश्व में कुपोषण की वजह से ठिगने रह जाने वाले बच्चों में से 47ः सिर्फ़ तीन देशों में हैं, भारत, पाकिस्तान व नाइजीरिया। विश्व भूख सूचकांक 2018 के अनुसार विश्व के 119 अविकसित व विकासशील देशों की सूची में भारत 103वें स्थान पर विराजमान है। हमारे देश में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की होने वाली अकाल मृत्यु के 50ः मामलों के लिए कुपोषण ज़िम्मेदार है। भारत में हर दिन 3000 बच्चे कुपोषण के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कारणों की वजह से दम तोड़ देते हैं।

बाल कुपोषण के कारण, लक्षण व दुष्परिणाम रू

बाल कुपोषण तब होता है जब बच्चे के शरीर में प्रोटीन, कार्बाेहाइड्रेट, वसा, विटामिन व खनिजों सहित पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिलते। इसके कारणों में मुख्यतः प्रोटीन व कैलोरी की कमी सबसे बड़ी व दीर्घकालिक भूमिका निभाती है। प्रोटीन व कैलोरी की कमी की वजह से होने वाला कुपोषण, “प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण” कहलाता है। कैलोरी व प्रोटीन की कमी का सम्बन्ध भोजन की मात्रा और गुणवत्ता से तो है ही, साथ ही साफ़-सफ़ाई व बच्चे के पालन-पोषण के वातावरण से भी है। इसके अलावा बच्चे की माँ के शरीर में गर्भावस्था के दौरान मौजूद ख़ून की कमी और कुपोषण का इतिहास, भविष्य में बच्चे में कुपोषण की सम्भावना को कई गुणा बढ़ा देता है। जन्म के बाद के छह महीने तक अनन्य स्तनपान न मिलना भी बाल कुपोषण का एक महत्वपूर्ण कारण है। कुपोषण के कुछ आम लक्षणों में शामिल हैं, वसा की कमी, दम फूलना, अवसाद, सर्जरी के बाद जटिलताओं का ख़तरा, घाव देर से भरना, ‘हाइपोथर्मिया’ यानी असामान्य रूप से शरीर का निम्न तापमान, बीमारी ठीक होने में लम्बा वक़्त लगना, थकान, उदासीनता व इसके अलावा कुपोषण के अधिक गम्भीर मामलों में पतली, सूखी, पीली त्वचा, चेहरे से वसा खोने की वजह से गालों का खोखला हो जाना, आँखों का धँस जाना आदि। लम्बे समय तक कैलोरी की कमी की वजह से दिल, जिगर व श्वास की विफलता जैसे गम्भीर परिणाम भी हो सकते हैं। गम्भीर रूप से कुपोषित बच्चों का शारीरिक विकास आम बच्चों की तुलना में धीमा व अपूर्ण होता है। उनमें शारीरिक व मानसिक विकलांगताओं का भी ख़तरा रहता है। हालाँकि जो बच्चे ठीक हो जाते हैं, उनमें भी लम्बे समय तक कुपोषण के प्रभाव दिखते हैं जैसे कि पाचन तन्त्र और मानसिक कार्यों में दिक़्क़त। बच्चों में जन्म से लेकर दो वर्ष की आयु तक उनके कुपोषण से ग्रस्त होने व उस कुपोषण के दीर्घकालिक होने की सम्भावना अधिक रहती है।

सरकारी कुप्रबन्धन, भ्रष्टाचार व बजटदृकटौती काशिकार होती योजनाएँरू

भारत सरकार ने 1995 में बच्चों की प्रोटीन व कैलोरी की ज़रूरतों की आंशिक आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए “मिड डे मील” योजना की शुरुआत की थी। मिड डे मील योजना का लक्ष्य बच्चों के लिए ज़रूरी कैलोरी के एक तिहाई हिस्से व ज़रूरी प्रोटीन के 50ः हिस्से की आपूर्ति सुनिश्चित करना था। हालाँकि यह योजना अपने जन्म के समय से ही कुप्रबन्धन, भ्रष्टाचार व लगातार होती फ़ण्ड व बजट कटौती की वजह से अधिकतर राज्यों में अपने निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति में असफल रही, पर फिर भी इस योजना की शुरुआत के बाद कई क्षेत्रों में बाल कुपोषण के आँकड़ों में प्रत्यक्ष सुधार देखे गये। झारखण्ड सहित कुछ राज्यों में प्रोटीन की आपूर्ति के लिए चावल, दलहन के साथ अण्डे को सम्मिलित किया गया। अण्डे में मौजूद एल्ब्यूमिन प्रोटीन, “प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण” से पीड़ित बच्चों के लिए गुणात्मक रूप से प्रोटीन का सर्वाेत्तम स्रोत है और मिड डे मील में यदि ईमानदारी से हर बच्चे को रोज़ाना एक अण्डा सुनिश्चित किया जाये तो कुपोषण के इन भयानक आँकड़ों में कई गुना तक सुधार लाया जा सकता है। लेकिन खनिज व प्राकृतिक सम्पदाओं से भरपूर झारखण्ड राज्य की सरकार के लिए राज्य की सम्पदाओं को चवन्नी के भाव कॉर्पाेरेट घरानों को बेचना कभी भी “महँगा” सौदा महसूस नहीं हुआ, पर कुपोषित बच्चों को अण्डों से मिलने वाला पोषण उसे महँगा सौदा लगने लगा। 7ः की दर से “विकास” का दावा ठोंकती रघुबर सरकार के पास अपने इस “विकास” का एक छोटा सा हिस्सा इस राज्य में विकराल मुँहबाए खड़े कुपोषण रूपी राक्षस से लड़ाई हेतु भी ख़र्चने को नहीं है। ग़ौरतलब है कि संस्कृति व धर्म पर ठेकेदारी का दावा ठोंकने वाली भारतीय जनता पार्टी ने जिन-जिन प्रदेशों में अपनी सरकार बनायी, वहाँ-वहाँ उसने “धार्मिक भावनाओं” हवाला देते हुए अण्डे को बच्चों की थाली से छीन लिया, चाहे वह हिमाचल हो या महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तराखण्ड, यूपी या मणिपुर।

जहाँ एक तरफ़ कुपोषण के भयानक आँकड़े भारत को दुनिया के सबसे पिछड़े व कुपोषित देशों की क़तार में खड़ा करते हैं, वहीं मिड डे मील, आईसीडीएस, आँगनवाड़ी जैसी योजनाओं से आर्थिक सहायता खींचकर इन्हें भी ख़त्म करने की साज़िशें ज़ोर पर हैं। दूसरी तरफ़ पूँजीपतियों के हज़ारों करोड़ के क़र्ज़े माफ़ करते हुए उसकी भरपाई मेहनतकश जनता के हिस्से के कल्याणकारी कार्यक्रमों में कटौती के द्वारा की जा रही है। “भात भात” कहते हुए मर गयी बालिका सन्तोषी को सख़्त हिदायत है कि जितना मिल रहा है, उतने में ही “सन्तोष” करो और अपनी हड्डियों का पाउडर बनाकर इस पूँजीवादी व्यवस्था के मुनाफ़े के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी पिसते रहो।

मिड डे मील वर्कर्स

देशव्यापी प्रदर्शन
उचित मानदेय के लिए मिड डे मील वर्कर्स का देशव्यापी प्रदर्शन
आपको बता दें कि मिड डे मील वर्कर्स जो सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए दोपहर का भोजन बनाती हैं उन्हें केंद्र सरकार 2009 से केवल 1000 रुपये मानदेय देती है। वह भी साल में 10 महीने।
8 फरवरी 2019
पूर्ण बजट से भी ज़्यादा भव्यता के साथ 2019-20 का अंतरिम बजट भी मोदी सरकार ने पेश कर दिया लेकिन मिड डे मील वर्कर्स को फिर भी कुछ नहीं मिला। इसी से नाराज़ होकर मिड डे मील वर्कर्स ने केंद्र सरकार के खिलाफ शुक्रवार को देश भर में विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और सभा की गई।
आपको बता दें कि मिड डे मील वर्कर्स जो सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए दोपहर का भोजन बनाती हैं उन्हें केंद्र सरकार 2009 से केवल 1000 रुपये मानदेय देती है। वह भी साल में 10 महीने। छुट्टी के महीनों का मानदेय भी काट लिया जाता है। इन कर्मचारियों को उम्मीद थी कि भाजपा सरकार अपने अंतिम बजट में उनके मानदेय में कुछ बढ़ोतरी करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी के विरोध में केंद्रीय श्रमिक संगठनों सीटू, एटक, ऐक्टू, एआईयूटीयूसी आदि से जुड़े मिड डे मील फेडरेशनों के आह्वान पर देश में विरोध कार्यक्रम किए गए।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने कहा कि मिड डे मील वर्कर्स लंबे समय से न्यूनतम वेतन, मानदेय में बढ़ोतरी, सामाजिक सुरक्षा गारंटी व मिड डे मील योजना को मजबूत बनाने की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं लेकिन भाजपा सरकार मिड डे मील वर्कर्स को लगातार नज़रअंदाज़ करती रही है।
वक्ताओं ने कहा कि बजट के नाम पर सरकार ने स्कीम वर्कर्स के साथ मजाक किया है। इस बार के बजट में उनके लिए कोई जगह नहीं है। जबकि देश भर में रसोईया कर्मियों का आंदोलन चल रहा है कि उनको सरकारी कर्मचारी का दर्जा मिले तथा 18 हज़ार न्यूनतम वेतन मिले। पर मोदी सरकार ने इस बजट में केवल खोखले जुमलों की बरसात की है।
ये सरकार मिड डे मील वर्कर्स के तहत 26 लाख रसोइयां जो 12 लाख स्कूलों में करोड़ों स्कूली बच्चों को दिन का खाना बनाकर उपलब्ध कराते हैं उनकी मांगों को लगातार नजरअंदाज करती रही है।
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नवंबर 2018 के केंद्रीय श्रमिक संगठनों से जुड़े मिड डे मील कर्मियों के यूनियनों के प्रदर्शन के दौरान आश्वासन दिया था कि इन कर्मचारियों का मानदेय बढ़ाना सरकार के एजेंडे पर है लेकिन सरकार ने अपने आखिरी बजट मे भी उनकी मांगों को नजरअंदाज करने का ही काम किया है । यहाँ तक पूर्व मे भी सिंतबर, 2018 मे प्रधानमंत्री द्वारा घोषणाओं मे भी जहाँ आशा-आंगनवाड़ी के मानदेय को बहुत थोड़ा सा ही बढ़ाया गया है पर वहाँ पर भी मिड डे मील वर्कर्स को नजरअंदाज किया गया था।
मिड डे मील वर्कर्स के तहत 98ः रसोइया कर्मचारी महिलाएं हैं और अधिकतर समाज के पिछड़े समाज से आती हैं इसलिए उनकी मांगों पर कार्रवाई सामाजिक न्याय और महिलाओं के अधिकारों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
इस मौके पर प्रदर्शनकारियों की ओर से एक मांग पत्र भी जारी किया गया जिसके अनुसार कई मांगें हैं रू-
1. मिड डे मील वर्कर्स का वेतन तुरंत बढ़ाया जाए।
2.सभी मिड डे मील वर्कर्स को चौथे दर्जे का सरकारी कर्मचारी घोषित किया जाए।
3.      नियमित किए जाने तक सभी वर्कर्स को 12 के 12 महीने न्यूनतम वेतन 18000 रुपये दिया जाए।
4.      45वें श्रम सम्मेलन की सिफारिशोंः ग्रेच्युएटी, पैंशन, प्रोविडेंट फंड, मेडिकल सुविधा सहित तमाम सामाजिक सुरक्षा लाभ, सभी मिड डे मील वर्कर्स को प्रदान किए जाएं।
5.      वर्तमान में कार्यरत किसी भी मिड डे मील वर्कर को काम से न हटाया जाए, हटाई गई वर्कर्स को काम पर बहाल किया जाए व प्रत्येक स्कूल में कम से कम दो वर्करों की नियुक्ति हो।
6.      12वीं कक्षा तक के बच्चों को खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में लाया जाए व इसी अनुसार मिड डे मील योजना का सभी स्कूलो में विस्तार करो।
7.      सभी स्कूलो में किचन शैड, स्टोर, पीने के साफ पानी आदि जरूरी संसाधन उपलब्ध करवाए जाएं। मिड डे मील योजना में कुकिंग गैस की व्यवस्था हो।
8.      सभी मिड डे मील वर्कर्स को सुरक्षा व स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाए। मिड डे मील वर्कर्स को जनश्री बीमा योजना के दायरे में लाया जाए।
9.      वर्कर्स को मृत्यु होने की स्थिति में 5 लाख व घायल होने की अवस्था में 1 लाख रूपये प्रदान किए जाएं।
10.    मिड डे मील वर्करों को वेतन सहित 180 दिन का प्रसूती लाभ दिया जाए।
11.    सभी वर्कर्स को नियुक्ति पत्र व पहचान पत्र जारी किए जाएं। योजना के लिए देशभर में समान सेवा शर्तें तय की जाएं।
12.    मिड डे मील योजना के किसी भी रूप में निजीकरण पर रोक लगे। इस्कान, नंदी फांडेशन आदि गैर सरकारी संगठनों व वेदांता जैसे कॉरपोरेट्स को योजना को देने पर तुरंत रोक लगे।
13.    स्कूलों में बच्चों को ताजा बना भोजन उपलब्ध करवाया जाए। योजना में केन्द्रीय रसोईघर की व्यवस्था पर रोक लगे। राशन व भोजन पकाने के लिए जरूरी आर्थिक संसाधन प्रदान किए जाएं।
14.    मिड डे मील वर्कर्स की समस्याओं के निपटारे के लिए आईसीडीएस की तर्ज पर राज्य व जिला स्तर पर कष्ट निवारण समितियों का गठन किया जाए।
15.    मिड डे मील वर्कर्स को वर्ष में दो ड्रेस व धुलाई भत्ता प्रदान किया जाए।
16.    मिड डे मील योजना के लिए पर्याप्त बजट का आवंटन किया जाए।
 

प्रोस्टेट वृद्धि --उपचार के विकल्प


जिस तरह आयु के साथ बालों में सफेदी आने लगती है और सिर पर गंजापन, उसी तरह आयु बढ़ने पर पुरुषों में प्रोस्टेट
ग्रंथि का बढ़ जाना भी एक आम आम बात है । चिकित्सक इसे बिनाइन प्रॉस्टेटिक हाइपरप्लेसिया (बीपीएच) अथवा
बिनाइन प्रॉस्टेटिक हाइपरट्रॉफी कहकर सीधे तौर पर यह समझाना चाहते हैं इस प्रकार की स्थिति कैंसर नहीं होती ।
हां इतना अवश्य है कि आपके असावधान रहने और ध्यान न देने पर यही स्थिति मूत्र के प्रवाह को अवरुद्ध कर सकती है
और मूत्राशय एवम गुर्दों की परेशानी पैदा हो सकती है।
प्रोस्टेट ग्रंथि के बढ़ जाने पर कुछ एक उपचार काफी कारगर हैं । व्यक्ति के , सही उपचार का निर्णय लेने में
चिकित्सक उसके रोग लक्षणों , प्रोस्टेट ग्रंथि के आकार , रोगी की अन्य स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों तथा उसकी अपनी
अभिरुचि को भी ध्यान में रखता है। आजकल उपचार की शुरुआत जीवन शैली के परिवर्तन तथा औषधियों से की जाती
है । कुछ लोगों को अवश्य सर्जरी करवाने की जरूरत पड़ती है वे ऐसे लोग होते हैं जिन्हें उपचार से लाभ नहीं मिल पाता

उपचार प्रक्रिया की शुरुआत परीक्षणों एवं निदानों से होती है । जिनका उद्देश्य समस्या के परिणाम का आकलन और
सही निदान तय करना होता है।
परीक्षण एवं निदान रू-
प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने के लक्षण पहले व्यक्ति के स्वयं ध्यान में आते हैं जिसके बाद वह चिकित्सक के पास जाता है ।इस प्रकार
की आशंका होने पर किसी सर्जन बल्कि किसी मूत्र रोग विशेषज्ञ (यूरोलॉजिस्ट) से परामर्श करना बेहतर है जो मूत्र पथ
की समस्याओं एवम की पुरुष प्रजनन प्रणाली की जानकारी रखता हो। चिकित्सक वास्तविक समस्या का पता लगाने
हेतु कुछ एक परीक्षण करवाता है। इस प्रकार के परीक्षण हर व्यक्ति के लिए भिन्न हो सकते हैं किंतु कुछ सामान्य परीक्षण
इस प्रकार हैं ।
’’ रोग लक्षणों के संबंध में विस्तृत सवाल रू-
चिकित्सक आपके रोग लक्षणों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करना चाहेगा, साथ ही यह भी कि आप कौन सी औषधियां ले
रहे हैं , यह भी कि क्या आपने इस बीच अल्ट्रासाउंड तो नहीं करवाया है । वह आपसे प्रश्नों की एक सूची भी भरवाना
चाहेगा । उदाहरण के लिए अमेरिकन यूरोलॉजिकल एसोसिएशन (एयूए) की -रु39;सिम्टम इंडैक्स फॉर बिनाइन प्रोस्टेटिक
हाइपरप्लेसिया-रु39; ’’डिजिटल रेक्टल परीक्षण
आम तौर पर यही पहला परीक्षण होता है । चिकित्सक हाथ में चिकित्सकीय दस्ताना पहनकर, मलद्वार में अपनी उंगली
को प्रवेश कराता है और उसके बगल में प्रोस्टेट ग्रंथि को महसूस करता है । उक्त परीक्षण से चिकित्सकों को ग्रन्थि के
आकार और स्थिति का मोटा अंदाजा हो जाता है ।
’’ प्रॉस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन (पीएसए) रुधिर परीक्षण रू-
प्रोस्टेट कैंसर की आशंका को निर्मूल करने के लिए चिकित्सक पीएसए रुधिर परीक्षण करवाने की सलाह देते हैं । पीएसए
प्रोस्टेट कोशिकाओं द्वारा बनाया गया एक प्रोटीन है जो प्रोस्टेट कैंसर के लोगों के रक्त में बड़ी हुई मात्रा में पाया जाता है

ऐसे परीक्षण को डिजिटल रेक्टल परीक्षण के साथ संयुक्त रूप से करने पर 50 वर्ष या ऊपर के पुरुषों के प्रोस्टेट कैंसर की
पहचान में मदद मिलती है। साथ ही प्रोस्टेट कैंसर का उपचार करवाने के बाद की स्थिति की जांच भी संभव हो पाती है
। इतना अवश्य है कि पीएसए के स्तर की व्याख्या, बढ़ी हुई प्रॉस्टेट और कलयुग का अंत आने के परीक्षण के बारे में बहुत

कुछ जानना अभी शेष है । साथ ही पीएसए के बढ़े हुए स्तर की स्थिति जान लेने के बाद की सर्वाेत्तम उपचार प्रक्रिया पर
भी शोध अभी बाकी है । हाल ही में करवाए गए रेक्टल डिजिटल परीक्षण,रेक्टल अल्ट्रासाउंड परीक्षण , सर्जरी अथवा
संक्रामक (प्रोसटेटाइटिस-रु39;)की स्थिति में भी बीएसए स्तर का बढ़ना संभव है।
’’ ट्रांसरेक्टल अल्ट्रासाउंड रू- अल्ट्रासाउंड परीक्षण करवाने पर प्रोस्टेट ग्रंथि का मापन संभव है और साथ ही इससे
व्यक्ति की प्रोस्टेट ग्रंथि की रचना का भी पता लग जाता है । उक्त प्रक्रिया के अंतर्गत एक खोजी उपकरण सिगार के
आकार का और माप का एक अल्ट्रासाउंड उपकरण व्यक्ति के मलद्वार में प्रवेश कराया जाता है और अल्ट्रासाउंड तरंगें
प्रोस्टेट ग्रन्थि पर आघात कर उसका बिम्ब प्रस्तुत कर देती हैं ।
’’ पोस्ट वॉयड रेजिडयुएल वॉल्यूम परीक्षण रू-
उक्त परीक्षण द्वारा मूत्र विसर्जन प्रक्रिया की क्षमता को जांचा जाता है । प्रायः इसमें व्यक्ति के मूत्र विसर्जन के तुरंत
पश्चात मूत्राशय में रुके मूत्र की भी अल्ट्रासाउंड जांच की जाती है।
’’ प्रॉस्टेट बायोप्सी रू-
रेक्टल अल्ट्रासाउंड के निर्देश पर चिकित्सकों प्रॉस्टेट कैंसर की हल्की आशंका होने पर भी करवाने की सलाह दी जाती है
। उक्त प्रक्रिया के अंतर्गत एक खोजी उपकरण मलद्वार में डाला जाता है जो प्रोस्टेट ग्रंथि पर अल्ट्रासाउंड तरंगे छोड़ता है।
अल्ट्रासाउंड तरंगों की प्रतिध्वनि से डिस्प्ले स्क्रीन पर प्रोस्टेट ग्रंथि का प्रतिबिंब बन जाता है । स्क्रीन पर अपसामान्य
क्षेत्र के कैंसरग्रस्त होने की पुष्टि करने के लिए चिकित्सक खोजी उपकरण तथा अल्ट्रासाउंड प्रतिबिम्बों की सहायता से
बायोप्सी करने वाली सुई को संदिग्ध क्षेत्र तक पहुंचाने में सक्षम हो पाता है । सुई प्रोस्टेट ऊतकों के कुछ अंशों को बाहर
निकाल लेती है ताकि उनका पैथोलोजिकल (विकृति जन्य) परीक्षण , माईक्रोस्कोप के द्वारा किया जा सके ।
’’मूत्र प्रवाह परीक्षणरू-
उक्त परीक्षण द्वारा मूत्र प्रवाह की क्षमता एवम मात्रा की जांच की जाती है । व्यक्ति को मूत्र विसर्जन के लिए कहा जाता
है । मूत्र विसर्जन हेतु एक विशेष मशीन से जुड़े पात्र का प्रयोग किया जाता है जिससे मूत्र प्रवाह की गति की जांच हो
और पाती पाती है । मूत्र प्रवाह में अवरोध इस बात का सूचक है कि संभवत प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ी हुई है । इस परीक्षण से
यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि व्यक्ति की स्थिति में सुधार आ रहा है या विकृति बढ़ रही है।
’’ सिस्टोस्कॉपी
इस परीक्षण के अंतर्गत चिकित्सक मूत्रमार्ग के मुख से एक छोटी सी नलिका को शिश्न के भीतर पहुंचाता है । इस प्रक्रिया
से पूर्व एक द्रव द्वारा शिश्न के भीतरी भाग को सुन कर दिया जाता है जिससे किसी प्रकार का संवेदन नहीं होता । भीतर
डाली जाने वाली नलिका एक प्रकाशमय लचीला टेलीस्कोप होता है जिसे -रु39;सिस्टोस्कोप -रु39;कहा जाता है साथ ही, उसमें
लेंस लगा होता है और प्रकाश की व्यवस्था रहती है ताकि चिकित्सक मूत्रमार्ग के भीतरी तथा मूत्राशय की भलीभांति
जांच कर सके। इस परीक्षण से चिकित्सक प्रोस्टेट ग्रंथि ग्रंथि के आकार का अनुमान लगा पाता है और किसी प्रकार की
रुकावट होने पर उसका भी पता लगा सकता है।
राहत कैसे पाएं रू--
जीवन शैली के कतिपय परिवर्तनों परिवर्तनों के कतिपय परिवर्तनों परिवर्तनों द्वारा सामंथा प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि के
लक्षणों पर नियंत्रण पाया जा सकता है तथा स्थिति को और अधिक बिगड़ने से भी बचाया जा सकता है निमन तरीके
आजमा कर देखें रू--
’’ सायं काल पेय पदार्थ सीमित मात्रा में लें ।

सोने से पहले 1 या 2 घंटे तक किसी प्रकार का पेय पदार्थ न लें ताकि आप को रात्रि में बार बार मूत्र विसर्जन के लिए ना
उठाना पड़े ।
’’ अधिक मात्रा में कैफीनयुक्त पेय अथवा मदिरा सेवन से बचें इनसे भी होती है सेक्स होता है और रोग लक्षण में
विकार आता है।
’’ यदि मूत्र औषधियाँ ले रहे हो तो चिकित्सकों से सूचित करेंरू-
सामान्यता ऐसे रोगियों को जो उच्च रक्तचाप ,ह्वदयाघात तथा जिगर संबंधी व्याधि से ग्रस्त हों उन्हें मूत्रल औषधियाँ ।
यदि आप भी उनमें से एक हैं तो प्रयास करें कि उनकी मात्रा कुछ कम हो या फिर वे केवल सुबह के समय ली जा सकें
अथवा मंद प्रभाव वाली औषधि का विकल्प चुना जाए , या फिर दवा लेने के समय में बदलाव किया जा सके। ऐसा
करने पर मूत्र संबंधी दिक्कतें कम होंगी। इतना जरूर करें कि बिना चिकित्सक की राय के मूत्रल औषधि बंद न की जाए ।
’’ डीकन्जेस्टेंट अथवा एंटीहिस्टामिणों का प्रयोग सीमित रखें
ऐंटीहिस्टामिन अक्सर एलर्जी, सामान्य सर्दी जुकाम, खांसी, खुजली तथा कुछेक त्वचा संबंधी रोगों में लेने की सलाह दी
जाती है । इस प्रकार की औषधियों से मूत्र मार्ग की उन पेशियों में कसावट उत्पन्न होती है जो मूत्र प्रवाह को नियंत्रित
करती हैं, जिसके कारण मूत्र विसर्जन में दिक्कत उत्पन्न हो जाती है ।
’’ हाजत महसूस होने पर तुरंत जाएंरू- जैसे ही ऐसा लगे , तुरंत मूत्र विसर्जन करें । काफी देर तक मूत्र रोके रहने से
मूत्राशय की पेशियां फैल जाती हैं और उसे नुकसान हो सकता है ।
’’शौचालय जाने की समय सारणी नियंत्रित करें रू-
नियमित समय पर मूत्र विसर्जन के लिए जाएं ताकि मूत्राशय को प्रशिक्षित किया जा सके
’’सक्रिय रहें रू-
निष्क्रियता के कारण हो मूत्र अवरुद्ध हो जाता है । थोड़ा सा व्यायाम करने लेने से प्रोस्टेट ग्रन्थि से होने वाली समस्याएं
कम होने लगती हैं ।
’’ यह नुस्खा आजमा कर देखें रू-
मूत्र विसर्जन करें-- फिर थोड़ी देर बाद दुबारा जाएं। इस तरीके को डबल वायरिंग कहा जाता कहा जाता वायरिंग कहा
जाता को -रु39;डबल वायडिंग -रु39;कहा जाता है । इस प्रक्रिया से मूत्राशय अच्छी तरह से खाली हो पाएगा और मूत्र विसर्जन के
बाद शेष रह जाने वाली मात्रा कम होगी।
’’ स्वयं को गर्म रखें
ठंड से शरीर में मूत्र अधिक नहीं रुकता इसलिए आपको बार-बार मूत्र विसर्जन की जरूरत महसूस होने लगती है।
’’ उपचार के विकल्प रू-
जिन लोगों में प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि रोग लक्षण व्यक्त होते हैं उन्हें आमतौर पर किसी न किसी समय उपचार की
जरूरत पड़ती है । हालांकि कुछ एक एक शोधार्थियों ने प्रारंभिक अवस्था में ही प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि के उपचार पर
प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं । उनके शोध निष्कर्षों के अनुसार किसी प्रकार का प्रारंभिक उपचार अआवश्यक है क्योंकि ऐसे
रोगियों में से एक तिहाई के रोग लक्षण ,मंद गति के रोग में स्वयं ही समय के साथ दूर हो जाते हैं । तात्कालिक उपचार

के बजाय उन शोध निष्कर्षों में नियमित शारीरिक परीक्षण को महत्वपूर्ण माना गया है । उसी स्थिति उपचार को
जरूरी समझा गया है जब स्थिति रोगी के स्वास्थ्य की दृष्टि से घातक बन जाए या काफी असुविधाजनक हो जाए ।
’’औषधि उपचार रू-
प्रोस्टेट ग्रंथि की सामान्य वृद्धि के उपचार के लिए सामान्यतः ओषधि सुझाई जाती जाती हैं । ऐसी राह देने वाली
औषधियां हैं रू-
।. अल्फा ब्लॉकर्स
इस प्रकार की औषधियां लेने से मूत्राशय ग्रीवा की पेशियां एवम प्रोस्टेट ग्रन्थि के अपने पेशी तन्तु शिथिल हो जाते हैं
और मूत्र विसर्जन सरल हो जाता है । इस प्रकार की औषधियां हैं रू--
टेराजोसिन,
डॉक्साजोसिन
टेम्सुलोसिन
अल्फुजोसिन तथा
साइलोडोसिन
अल्फा ब्लॉकर्स तुरन्त असर करती हैं । 1 या 2 दिन के भीतर ही मूत्र परवाह बढ़ना संभव है। और मूत्र विसर्जन की
बारंबारता में भी कमी आ जाती है । इनसे एक स्थिति उत्पन्न होती है-- वीर्य शिश्नसे के सिरे से बाहर होने के बजाय
वापस मूत्राशय में में चला जाता है । जो किसी भी रूप से हानिकारक नहीं है।
ठ. अल्फा रिडक्टेज इनहिबिटर्स
इस प्रकार की औषधियां प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि करने वाले हार्माेन संबंधी बदलाव पर रोक लगाती हैं । इनमें
फिनास्टेरॉयड तथा ड्यूटासटेराइड सम्मिलित हैं जो सामान्यतः अत्यधिक बढ़ी हुई प्रॉस्टेट ग्रंथि के लिए अत्यंत
लाभकारी होती है। सुधार दिखाई देने में कई हफ्ते या कई महीने लग सकते हैं । उक्त औषधियां लेने के दौरान यौन
संबंधी अनुषंगी प्रभाव दिखाई दे सकते हैं जिनमें नपुसंकता (इरेक्टाइल डिस्फंक्शन), यौनेच्छा में कमी अथवा प्रतिगामी
स्खलन गांव सम्मिलित हैं ।
ब्.
मिला-जुला औषधि उपचार रू-
अल्फा ब्लॉकर तथा 5 अल्फा रिडक्टेज अलग अलग लेने के बजाय एक साथ लेने से उपचार अधिक प्रभावी हो जाता है ।
हाल ही में यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल इंस्टीट्यूट आफ डायबिटीज एंड किडनी डिजीज (छप्क्क्ज्ञ) तथा मेडिकल थेरैपी
ऑफ प्रोस्टेटिक सिम्पटम्स (डज्व्च्ै) परीक्षणों में यह पाया गया कि फिनासटेरायड तथा डॉक्साजोसिन दवाओं का एक
साथ लेना , पृथक रूप से लेने की बजाय अधिक राहत देता है और बीपीएच वृद्धि को रोकता है दो औषधियों का यह
विधान पृथक रूप में सीमाओं का एक साथ लेना का एक साथ लेना रूप से लेने की बजाय अधिक रहा देता है और
बीपीएस वीर जी जी को रोकता है दोषियों का यह विधान प्रत्यक्ष रूप में डॉक्साजोसिन की 39ः तक और

फिनासटेरायड की 34ः तक की कमी ला पाने की तुलना में बीपीएच वृद्धि को 67ः तक कम कर पाने में सक्षम सिद्ध
हुआ है ।

ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता और पोषण समिति

ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता और पोषण समिति

 राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन समुदाय को स्थानीय स्तर पर, स्वास्थ्य से संबंधित और इसके संबंधित मुद्दों पर नेतृत्व करने की परिकल्पना करता है। यह तभी संभव होगा जब समुदाय स्वास्थ्य के मामलों में नेतृत्व करने के लिए पर्याप्त रूप से सशक्त हो। स्पष्ट रूप से, इसमें स्वास्थ्य प्रणाली के प्रबंधन में पंचायती राज संस्थाओं की भागीदारी की आवश्यकता है। यह संभव हो सकता है यदि ग्राम पंचायत सदस्य और समुदाय के प्रतिनिधि जैसे महिला समूह और ैब् / ैज् / व्ठब् / अल्पसंख्यक समुदाय आदि की अध्यक्षता में प्रत्येक गाँव में एक समिति का गठन किया जाए, इसलिए प्रत्येक गाँव, गाँव के विकास के लिए स्वास्थ्य स्वच्छता और पोषण समिति का गठन ग्राम स्तर की गतिविधियों के लिए असमान अनुदान प्रदान करके किया गया है।

ए। वीएचएसएनसीटीएच वीएचएसएनसी की भूमिका गांव के समग्र स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार होगी। यह समुदाय और स्वास्थ्य और पोषण देखभाल प्रदाताओं की समस्याओं को ध्यान में रखेगा और इसे हल करने के लिए तंत्र का सुझाव देगा।
2. यह स्वास्थ्य कार्यक्रमों की अनिवार्यताओं के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करेगा, जो निगरानी में उनकी भागीदारी को सक्षम करने के लिए हकदार लोगों के ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करेगा।
3. यह ग्राम समुदाय द्वारा पहचानी गई गाँव की स्थिति और प्राथमिकताओं के आकलन के आधार पर एक गाँव स्वास्थ्य योजना पर चर्चा और विकास करेगा।
4. ग्राम स्तरीय स्वास्थ्य और पोषण गतिविधियों से संबंधित प्रमुख मुद्दों और समस्याओं का विश्लेषण करें, पीएचसी के चिकित्सा अधिकारी को इन पर प्रतिक्रिया दें। 5. समिति गाँव में संचालित सभी स्वास्थ्य गतिविधियों जैसे ग्राम स्वास्थ्य और पोषण दिवस, माताओं की बैठक आदि की निगरानी करेगी। 6. गाँव में घरेलू सर्वेक्षण करने की ज़िम्मेदारी ।छड के साथ टभ्ैछब् की होगी। 7. यह ग्राम स्वास्थ्य रजिस्टर और स्वास्थ्य सूचना बोर्ड को बनाए रखेगा जिसमें उप केंद्र / पीएचसी में अनिवार्य सेवाओं के बारे में जानकारी होगी।
8. यह सुनिश्चित करेगा कि एएनएम तय दिनों पर गांव का दौरा करें और उप केंद्र कार्यस्थल के अनुसार निर्धारित गतिविधि करें; गांव के स्वास्थ्य और पोषण अधिकारियों की देखरेख करें।
9. एएनएम अगले दो महीनों की योजना के साथ एक द्वि मासिक गांव रिपोर्ट समिति को प्रस्तुत करेगी। ग्राम स्वास्थ्य समिति द्वारा प्रारूप और सामग्री तय की जाएगी। ग्राम स्तरीय बैठक में एएनएम द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर चर्चा करें और उचित कार्रवाई करें।
10. यह उनके गाँव में होने वाली हर मातृ या नवजात मृत्यु पर चर्चा करेगा, इसका विश्लेषण करेगा और ऐसी मौतों को रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई का सुझाव देगा। इन मौतों को पंचायत में पंजीकृत करवाएं।
11. समिति गाँव में विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करने और बैठक के कार्यवृत्त का दस्तावेजीकरण करने के लिए नियमित मासिक बैठक आयोजित करेगी। समिति यह सुनिश्चित करेगी कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सा अधिकारी की उपस्थिति में नियमित अंतराल पर (छह महीने में एक बार) सार्वजनिक संवाद का आयोजन किया जाता है। समिति यह सुनिश्चित करेगी कि चर्चा किए गए सभी मुद्दों को दर्ज किया जाए और चर्चा किए गए मुद्दों पर कार्रवाई की जाए।
12. टभ्ैछब् समुदाय से ।ैभ्। के चयन और समर्थन के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, स्वास्थ्य संबंधी अन्य मुद्दों के अलावा टभ्ैछब् भी गाँव के विकास के लिए जिम्मेदार होगा।
13. वीएचएसएनसी उप केंद्र का भी ध्यान रखेगा।
14. वीएचएसएनसी सभी सरकारी योजनाओं के बारे में समुदाय को सूचित करने के लिए जिम्मेदार होगा।

ख। अनटाइड ग्रांट का यूटिलाइजेशन 1. असमान अनुदान स्थानीय स्तर पर सामुदायिक कार्रवाई के लिए एक संसाधन है।
2. समिति को वीएचएसएनसी की मासिक बैठक में संकल्प लेने के बाद फंड का उपयोग करना चाहिए।

3. समिति रुपये की कुल राशि को वापस नहीं ले सकती है। एक बार में 10,000 / -।
4. निधि का उपयोग ग्राम स्तर की गतिविधियों जैसे स्वच्छता और स्वच्छता अभियान, स्कूल स्वास्थ्य गतिविधियों, रोगी को स्वास्थ्य सुविधाओं, स्वास्थ्य जागरूकता गतिविधियों, हाउस होल्ड सर्वेक्षणों में स्थानांतरित करने के लिए आंगनवाड़ी केंद्र की सुविधाओं में सुधार के लिए किया जा सकता है और गाँव / समुदाय के लिए कोई अन्य विकासात्मक गतिविधियाँ।
5. बाढ़ या किसी महामारी जैसी आपात स्थिति के दौरान समिति राहत शिविरों के लिए फंड का उपयोग करेगी या पानी, ओआरएस, ब्लीचिंग पाउडर आदि की शुद्धि के लिए हैलोजन टैबलेट जैसी आपूर्ति करेगी।
6. समिति टभ्ैछब् के बैठक स्थान में साइनबोर्ड बनाने के लिए निधि का उपयोग कर सकती है।

ब्. धन का रखरखाव
1. समिति रुपये के वार्षिक अनुदान के लिए हकदार है। गाँव स्तर की गतिविधियों के लिए 10,000।
2. टभ्ैछब् प्राप्त धन और व्यय का एक रजिस्टर बनाए रखेगा।
3. समिति को विभिन्न स्वास्थ्य गतिविधियों के लिए ग्राम स्वास्थ्य कोष का प्रबंधन करना चाहिए।
4. समिति को खातों को बनाए रखना चाहिए और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को प्राप्त धन के लिए उपयोग प्रमाणपत्र और व्यय का विवरण प्रस्तुत करना चाहिए।
डी। रखरखाव का रजिस्टर
1. ग्राम स्वास्थ्य रजिस्टर
2. जन्म और मृत्यु रजिस्टर
3. सार्वजनिक संवाद रजिस्टर
4. रेफरल रजिस्टर
5. अनटाइड ग्रांट रजिस्टर

ग्राम स्वास्थ्य पोषण दिवस टभ्छक् को हर महीने में एक बार आयोजित किया जाता है (अधिमानतः बुधवार को, और उन गांवों के लिए जो उसी महीने के किसी अन्य दिन को छोड़ दिया गया है), गांव में ।ॅब् पर। टभ्छक् को समुदाय और स्वास्थ्य प्रणाली के बीच अंतर करने के लिए एक मंच के रूप में भी देखा जाना चाहिए। नियत दिन पर, ।ैभ्।, ।ॅॅ, और अन्य ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को निकटतम ।ॅब् में इकट्ठा करने के लिए जुटाएंगे। टभ्छक् पर, ग्रामीण स्वास्थ्य कर्मियों के साथ स्वतंत्र रूप से बातचीत कर सकते हैं और बुनियादी सेवाएँ और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। वे स्वास्थ्य देखभाल के निवारक और प्रचारक पहलुओं के बारे में भी जान सकते हैं, जो उन्हें उचित सुविधाओं पर स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। टभ्छक् के दिन निम्नलिखित मुद्दों पर चर्चा की जा सकती है।

मातृ स्वास्थ्य
ऽ गर्भधारण का प्रारंभिक पंजीकरण।
ऽ ध्यान केंद्रित ए.एन.सी.
ऽ गर्भावस्था के दौरान जटिलताओं के लक्षण वाली महिलाओं के लिए रेफरल और जिन्हें आपातकालीन देखभाल की आवश्यकता होती है।
ऽ स्वीकृत एमटीपी केंद्रों को सुरक्षित गर्भपात के लिए रेफरल।
ऽ पर परामर्शरू 1. लड़कियों की शिक्षा। 2. शादी की उम्र।
3. गर्भावस्था के दौरान देखभाल।
4. गर्भावस्था के दौरान खतरे के संकेत।
5. जन्म की तैयारी।
6. पोषण का महत्व।
7. संस्थागत प्रसव।
8. रेफरल परिवहन की पहचान।
9. रेफरल ट्रांसपोर्ट के लिए श्रैल् के तहत फंड की उपलब्धता।
10. प्रसवोत्तर देखभाल।
11. स्तनपान और पूरक आहार।
12. एक नवजात शिशु की देखभाल।
13. गर्भनिरोधक।
ऽ संभावित कारणों की पहचान करने और उनका विश्लेषण करने के लिए पिछले महीने के दौरान होने वाली मातृ मृत्यु पर समूह चर्चाओं का आयोजन करना।

स्वच्छता ऽ मच्छरों के लिए प्रजनन स्थलों से परहेज।
ऽ घरेलू उपयोग और कचरे के सुरक्षित निपटान के लिए सामुदायिक कार्रवाई का जुटान।

पोषण
ऽ पोषण संबंधी कमियों के कारण होने वाली बीमारियों की जानकारी और परामर्श देकर रोका जा सकता हैरू
1. स्वस्थ भोजन की आदतें।
2. हाइजीनिक और सही कुकिंग प्रैक्टिस।
3. एनीमिया के लिए जाँच, विशेष रूप से किशोर लड़कियों और गर्भवती महिलाओं में; जाँच, सलाह, और जिक्र।
4. शिशुओं और बच्चों का वजन।
5. लोहे के पूरक, विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्वों का महत्व
6. भोजन जो स्थानीय स्तर पर उगाया जा सके।
7. 6 महीने से 2 साल की उम्र के किशोर, गर्भवती महिलाओं और शिशुओं पर ध्यान दें।
शिकायत निवारण तंत्र
प्रत्येक ब्लॉक सीएचसी स्तर पर आशा हेल्प डेस्क बनाया गया है।
।ै प्े द्वारा उठाए गए मुद्दों के निवारण के लिए डव् प् / ब, स्भ्ट, च्भ्छ को प्रत्येक ब्लॉक / ब्भ्ब् में प्रभारी बनाया गया है
।ैभ्। हेल्पलाइन नं 82880141418288014141 को हेड क्वार्टर में स्थापित किया गया है, राज्य भर से शिकायत करने के लिए, सुबह 9रू00 बजे से शाम 5रू00 बजे के बीच।
।ैभ्।े शिकायत और निवारण की कार्यवाही का रिकॉर्ड प्रत्येक स्तर पर बनाए रखना शुरू कर दिया गया है।
आशा शिकायत डेस्क के नामों और फोन नंबरों को प्रत्येक आशा को अधिसूचित किया गया है।
प्रत्येक जिले में आशा शिकायत निवारण समितियों की प्रक्रिया शुरू की गई है।