Sunday, 10 June 2018

ई-कचरा

ई-कचरा पैदा करने वाले दुनिया के पांच शीर्ष देशों में भारत: रिपोर्ट

उच्चस्तरीय समिति

ज़हरीली धुंध के कारण नागरिकों को मरने के लिए नहीं छोड़ सकतीं केंद्र और राज्य सरकारें: एनएचआरसी

फ्लोराइड का जहर बच्‍चों में विकलांगता

फ्लोराइड का जहर बच्‍चों में विकलांगता

वेब/संगठन: 
 chauthiduniya com
Author: 
 संध्या पांडेय
ग्राम बाकोड़ी में हैंडपंप से निकले पानी की किसी ने जांच नहीं की और भोलेभाले ग़रीब अनपढ़ लोग सरकार पर भरोसा करके सरकारी हैंडपंप का पानी पीते रहे। अब दो वर्ष बाद गांव वालों को सरकारी हैंडपंप से निकलने वाले पानी के दुष्प्रभाव का पता चला।मध्य प्रदेश। केंद्रीय उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री कमलनाथ के संसदीय चुनाव क्षेत्र छिंदवाड़ा ज़िले में जुन्नारदेव विधानसभा क्षेत्र के ग्राम बाकोड़ी में सरकारी लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने पांच साल पहले गांव वालों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए कई हैंडपंप लगवाए थे, लेकिन इनसे फ्लोराइड युक्त पानी निकलने लगा। तब भी सरकारी अ़फसरों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के सूत्र बताते हैं कि नियम है कि धरती से जब पानी निकाला जाता है, तब उसकी जांच की जाती है और देखा जाता है कि पानी पीने योग्य है या नहीं। वहीं शायद ग्राम बाकोड़ी में हैंडपंप से निकले पानी की किसी ने जांच नहीं की और भोलेभाले ग़रीब अनपढ़ लोग सरकार पर भरोसा करके सरकारी हैंडपंप का पानी पीते रहे। अब दो वर्ष बाद गांव वालों को सरकारी हैंडपंप से निकलने वाले पानी के दुष्प्रभाव का पता चला, क्योंकि गांव में कई बच्चे और किशोर विकलांगता के शिकार हो चुके थे। दो वर्षों से लगातार इस पानी का उपयोग करने वालों के शरीर पर पानी का घातक प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है। बच्चों के दांत ख़राब हो गए हैं और कई शारीरिक रूप से विकलांग हो गए। इन बच्चों के शरीर में एक तरह की ख़तरनाक बीमारी फैल गई, जिसकी वज़ह से गांव में आधे से अधिक बच्चों के हाथ-पैर में सूजन और टेढ़ापन आ गया है।

2 वर्ष बाद लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों ने आनन-फानन में वहां के हैंडपंप को बंद करवा दिया। ग्रामीण सुकटो ने बताया कि बच्चे जन्म के समय स्वस्थ थे, मगर फ्लोराईड युक्त पानी के उपयोग से इन बच्चों में यह बीमारी उत्पन्न होने लगी है। कुछ समय पहले स्वास्थ्य विभाग द्वारा गांव में शिविर लगाया गया था। केवल खानापूर्ति के लिए कुछ दवाईयां बच्चों को दी गई। बच्चों को इलाज के लिए ज़िला चिकित्सालय में भी बुलाया गया, लेकिन रास्ता सही न होने की वज़ह से शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों के पालक, ज़िला चिकित्सालय नहीं पहुंच सके। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आज़ादी के 65 वर्ष पूर्ण होने के बावजूद ग्रामीण मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।

7000 से ज़्यादा स्थानों पर पानी दूषित


मध्य प्रदेश में कुल सात हज़ार से ज़्यादा बस्तियों में पानी पीने योग्य नहीं है। कहीं पेयजल में फ्लोराइड है, तो कहीं नाइट्रेट की मात्रा ज़्यादा, तो कहीं-कहीं पानी ज़रूरत से ज़्यादा खारा है। कई ज़िलों में पेयजल स्त्रोतों में लौह तत्व और सीसा (लेड) भी घुलमिल गया है। इस कारण पानी पीने योग्य नहीं बचा है। सरकारी सूत्रों के अनुसार राज्य में कुल 1 लाख 27 हज़ार बस्तियों में से 26 ज़िलों की सात हज़ार 64 बसाहाटों के 11569 जल स्त्रोतों में फ्लोराइट की मात्रा ज़रूरत से ज़्यादा है। ऐसे घातक जल स्त्रोत मंडला, डिंडौरी, झाबुआ, शिवपुरी, सिवनी, छिंदवाड़ा, उज्जैन, भिंड, मंदसौर और नीमच में हैं। इन ज़िलों में जल स्त्रोतों में फ्लोराइड 5.56 प्रतिशत तक घुलमिल गया है। जबकि 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक फ्लोराइड शरीर के लिए घातक होता है। राज्य में 391 बस्तियों के 663 जलस्त्रोतों में नाइट्रेट ज़्यादा है। नाइट्रेट की मात्रा बढ़ने की वज़ह से भूमिगत चट्टानों, खेतों में रासायनिक उर्वरकों के बहाव और प्रदूषण आदि हैं। इससे बच्चों में कमज़ोरी और खून में नीलेपन की बीमारी होती है।

राज्य में कई स्थानों पर जल स्त्रोतों में सीसा (लेड) भी घातक मात्रा में है। इसके अलावा लौह तत्व भी सिवनी, रायसेन, राजगढ़, रतलाम, नीमच, छिंदवाड़ा, बालाघाट, उमरिया और सिवनी में 747 जल स्त्रोतों में ज़रूरत से ज़्यादा मात्रा में पाया गया है। राज्य के लगभग 600 गांव में भूमिगत जल स्त्रोतों में खारेपन की मात्रा ज़्यादा है। बताया जाता है कि केंद्र सरकार के राष्ट्रीय ग्रामीण मिशन कार्यक्रम के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जल आपूर्ति कार्यक्रम के अंतर्गत दूषित और घातक प्रभावित जलस्त्रोतों को बंद कर पानी के लिए वैकल्पिक प्रबंध करने हेतु भारत सरकार ने मध्य प्रदेश को लगभग 100 करोड़ रुपयों की सहायता दी है, लेकिन पता नहीं राज्य सरकार ने इस धनराशि का कहां और किस प्रकार उपयोग किया है।

45 हज़ार हैंडपंप सूख चुके हैं


गरमी के मौसम में पेयजल संकट फिर गरमाने लगा है। इस बीच प्रदेश के 10 फीसदी हैंडपंप सूखे पड़े हैं। प्रदेश में कुल 4,37,884 हैंडपंप हैं, इसमें से पीएचई और अन्य विभागों के चालू हैंडपंपों की संख्या 4,15,590 है। इसमें से 22,294 हैंडपंप ऐसे हैं जो बंद पड़े हैं। जल स्तर कम होने के कारण 13,093 हैंडपंप बंद हैं, 8,132 हैंडपंप ऐसे हैं, जिन्हें सुधारना अब संभव नहीं है। गुणवत्ता के कारण बंद कर दिए गए हैंडपंपों की संख्या 1,069 है।

पर्यावरण के दोहन की कीमत

पर्यावरण के दोहन की कीमत

Author: 
 रामचंद्र गुहा
Source: 
 अमर उजाला, 03 जून, 2018

भारत के पास आज आर्थिक विकास और पर्यावरणीय सन्तुलन को जोड़ने वाली नीतियाँ बनाने की क्षमता है। हमारे अनुसन्धान संस्थानों के पास ऐसे शानदार वैज्ञानिक हैं जोकि हमारी सरकारों (केन्द्र और राज्यों की) को औद्योगिक, कृषि, वन, जल, ऊर्जा, आवासीय और परिवहन सम्बन्धी नीतियाँ बनाने में मदद कर सकते हैं, जोकि हमारे दीर्घकालीन भविष्य को नुकसान पहुँचाए बिना हमारी वृद्धि को बढ़ा सकते हैं।
महात्मा गाँधी ने 1928 में ही उत्पादन और खपत के पश्चिमी तरीकों के कारण वैश्विक स्तर पर असन्तुलन की चेतावनी दी थी। उन्होंने टिप्पणी की, “ईश्वर नहीं चाहता कि भारत कभी पश्चिम की तरह औद्योगीकरण को अपनाये” और इसके साथ कहा, “एक छोटे से द्वीप साम्राज्य (इंग्लैंड) के आर्थिक साम्राज्यवाद ने आज दुनिया को जंजीरों से जकड़ रखा है। यदि तीस करोड़ के देश ने ऐसा आर्थिक शोषण किया, तो पूरी दुनिया टिड्डियों की तरह बेकार हो जाएगी।”

इस बयान का अहम हिस्सा है, पश्चिम की तरह। गाँधी जानते थे कि आजाद होने पर भारत को गरीबी को खत्म करने और अपने नागरिकों के सम्मानजनक जीवनयापन के लिये आर्थिक रूप से विकास करना ही होगा। लेकिन चूँकि उसके यहाँ पश्चिम की तुलना में आबादी का घनत्व अधिक है तथा नियंत्रण और शोषण करने के लिये उसके पास उपनिवेश नहीं हैं, भारत को अपने प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के प्रति कहीं अधिक जिम्मेदारी दिखानी होगी, उसे पर्यावरण को कम-से-कम नुकसान पहुँचाना होगा, जिस पर कि हर तरह का जीवन विशेष रूप से मानव जीवन निर्भर है।

पर्यावरण पर गाँधी के विचारों को उनके अपने समय में समाजशास्त्री राधाकमल मुखर्जी और अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पा जैसे दूरदृष्टा विचारकों ने आगे बढ़ाया। हालांकि स्वतंत्र भारत की सरकारों ने उन्हें पूरी तरह से भुला दिया और अहंकार के साथ भारतीय सच्चाइयों से इतर संसाधन और ऊर्जा के सघन दोहन वाली नीतियों को अपनाया। इसने भारी मानव पीड़ा को जन्म दिया, जोकि संसाधनों पर कॉर्पोरेट के कब्जा कर लेने के कारण ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की बेदखली या फिर प्रदूषण फैलाने वाली परियोजनाओं से हुए नुकसान के रूप में सामने आईं।

प्रकृति और मानवीय जीवन की इस बर्बादी के विरोध में चिपको और नर्मदा बचाओ जैसे लोकप्रिय आन्दोलन खड़े हुए और मछुआरों का आन्दोलन सामने आया। ‘गरीबों के इस पर्यावरवाद’ के कारण ही देर से ही सही 1980 में पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना हुई और पारिस्थितिकी को निहित स्वार्थी तत्वों से हो रहे नुकसान को रोकने के लिये अनेक कानून बनाये गये।

हालांकि 1980 के दशक में पर्यावरण के मामले में जो उपलब्धियाँ हासिल की गई थीं, उन्हें हाल के दशकों में केन्द्र में रही यूपीए और एनडीए, दोनों सरकारों के साथ ही राज्य सरकारों ने गँवा दिया। कुछ इस गलत धारणा के कारण कि भारत जब तक अमीर नहीं हो जाता वह स्वच्छता को वहन नहीं कर सकता और कुछ राजनीतिक दलों के निजी कॉर्पोरेट के शरणागत होने के कारण, जिन्हें समाज के व्यापक हित के बजाय अपने तात्कालिक मुनाफे की फिक्र होती है। पर्यावरण की बर्बादी के इस ताजा युग ने नुकसान को बढ़ाया है, जैसा कि हमारे प्रदूषित शहरों, हमारी मर रही नदियों, हमारे सिकुड़ते जल-स्तर, हमारी प्रदूषित मिट्टी आदि से साफ है।

जॉन मेनार्ड कीन्स की लोकप्रिय टिप्पणी थी, “ऐसे व्यावहारिक व्यक्ति जो खुद को किसी भी बौद्धिक प्रभाव से मुक्त मानते हैं, आमतौर पर किन्हीं मृत या निष्क्रिय अर्थशास्त्री के गुलाम हैं।” यह बात आज भारत के सारे राजनेताओं के बारे में सही है। वे 1950 के दशक के अर्थशास्त्रियों के गुलाम हैं, जोकि यह मानते थे कि गरीब देशों को पर्यावरण के क्षरण को लेकर अमीर देशों की तुलना में कम चिन्तित होना चाहिए।

दूसरी ओर 21वीं सदी के अर्थशास्त्रियों ने निर्णायक रूप से दिखाया कि भारत जैसे देश को अमेरिका की तुलना में पर्यावरण के लिहाज से कहीं अधिक जवाबदेह होना चाहिए। इसके तीन कारण हैं- क्योंकि हमारी आबादी का घनत्व काफी अधिक है, क्योंकि उष्ण कटिबन्धीय पारिस्थितिकी तंत्र समशीतोष्ण की तुलना में कम लचीला है और इसलिये क्योंकि प्रदूषण, जंगलों की कटाई, मिट्टी के क्षरण आदि की अनुपातहीन कीमत गरीबों को चुकानी पड़ती है।

भारत में हमारे शासन नासमझी तो दिखाते ही हैं, वे विद्वेष भी रखते हैं और अपने पसन्दीदा और कॉर्पोरेट मित्रों के लालच के आगे आम आदमी के हितों को त्यागने के लिये तैयार रहते हैं। पुराने पड़ चुके अर्थशास्त्रियों और प्रेस के कॉर्पोरेट समर्थकों से दिगभ्रमित भारतीय मीडिया यह मानने लगा कि पर्यावरण सन्तुलन ऐसी विलासिता है, जिसे हम वहन नहीं कर सकते।

लेकिन हाल के वर्षों में इस पर सवाल उठे हैं, क्योंकि पर्यावरण के दोहन से हो रहा नुकसान स्पष्ट रूप से हमारे सामने है और इससे पीड़ित लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। अकादमिक अध्ययनों ने दिखाया है कि भारतीय शहरों में प्रदूषण की दर दुनिया में सर्वाधिक है। इस बीच, गरीबों का पर्यावरणवाद फिर से उभरता दिख रहा है, आदिवासियों (और अन्य समूहों) को खुली खदानों से बेदखल किया जा रहा है और औद्योगिक प्रदूषण के कारण किसानों का जीवन-यापन खतरे में है।

हाल ही में तूतीकोरिन में हुए प्रदर्शन के पीछे पर्यावरण के दोहन से पीड़ित कामकाजी वर्ग था। इसका अन्त जिस त्रासदी से हुआ उससे तो पर्यावरण के प्रति जागरुकता की शुरुआत होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा लगता है कि हमारे नीति नियंता और उन्हें संचालित करने वाले सबक सीखने को तैयार नहीं हैं।

इस मुद्दे पर जहाँ वाकई कुछ अच्छी मैदानी रिपोर्टिंग की गई, लेकिन जमीनी हकीकत से अनभिज्ञ सम्पादकीय लेखक चाहते थे कि स्टरलाइट और उसके अपराधों को बख्श दिया जाये। ऐसे समर्थकों ने दावे किये (अपर्याप्त साक्ष्यों के साथ) कि प्रदर्शन हिंसक था और विदेश से प्रेरित था, जबकि बड़े कॉर्पोरेट पर पर्यावरणीय जिम्मेदारी (अपर्याप्त साक्ष्यों के साथ) सौंपना आर्थिक बर्बादी लाएगा।

भारत के पास आज आर्थिक विकास और पर्यावरणीय सन्तुलन को जोड़ने वाली नीतियाँ बनाने की क्षमता है। हमारे अनुसन्धान संस्थानों के पास ऐसे शानदार वैज्ञानिक हैं जोकि हमारी सरकारों (केन्द्र और राज्यों की) को औद्योगिक, कृषि, वन, जल, ऊर्जा, आवासीय और परिवहन सम्बन्धी नीतियाँ बनाने में मदद कर सकते हैं, जोकि हमारे दीर्घकालीन भविष्य को नुकसान पहुँचाए बिना हमारी वृद्धि को बढ़ाएँ।

यह दुखद है कि हमारे पास ऐसे राजनीतिज्ञ नहीं है, जो इन विशेषज्ञों को सुनना चाहें। तूतीकोरिन में राज्य द्वारा की गई नागरिकों की हत्या, एक पारदर्शी और जवाबदेह लोकतंत्र में चेतावनी होनी चाहिए। लेकिन मुझे भय है कि हमारी दोषपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था में इसे जल्द ही भुला दिया जाएगा, खासकर इसलिये क्योंकि आम चुनाव नजदीक हैं और राजनीतिक दलों को अपने खजाने भरने हैं।

(रामचंद्र गुहा कई किताबों के लेखक हैं, जिनमें एनवायरनमेंटलिज्म : ए ग्लोबल हिस्ट्री भी शामिल है।)

प्लास्टिक है खतरनाक, रहिए सावधान

प्लास्टिक है खतरनाक, रहिए सावधान

पानीपत का पानी

पानीपत का पानी

नवभारत टाइम्स / नई दिल्ली : क्या आप सोच सकते हैं कि कोई शहर अपने नाले का पानी छोड़े और दिल्ली जैसे शहर में पीने के पानी की सप्लाई रोकनी पड़े। ताजा वाकया यह है कि पानीपत के रंगाई, चमड़ा आदि के उद्योंगो द्वारा रासायनिक प्रदूषित पानी उनके अपने नालों में भारी मात्रा जमा था, वह अचानक यमुना में छोड़ दिया गया। दिल्ली के ज्यादातर नलों में यमुना के पानी को ट्रीट करके सप्लाई किया जाता है। वजीराबाद और चंद्रावल में जल शोधक संयंत्र लगाए गए हैं, लेकिन इसकी वजह से यमुना के पानी में अमोनिया की मात्रा इतना ज्यादा हो गई कि उसे निथारा जाना असंभव हो गया और दिल्ली के एक तिहाई शहर की सप्लाई तीन दिन के लिए बंद रही।

यमुना में बढ़े आमोनिया के प्रदूषण के कारण 27 दिसम्बर सुबह भी करीब एक तिहाई दिल्ली में नलों की टोंटियां सूखी रहीं। शाम में पांच फीसदी तक सप्लाई शुरू हो पाई। उधर, हरियाणा की फैक्ट्रियों का प्रदूषण बार-बार यमुना में बहाए जाने के खिलाफ दिल्ली जल बोर्ड सेंट्रल पलूशन कंट्रोल बोर्ड और हरियाणा के पलूशन कंट्रोल बोर्ड से कड़ी कार्रवाई के लिए शिकायत करेगा।

सोनीपत और पानीपत की फैक्ट्रियों का प्रदूषक कचरा यमुना में बहाए जाने से दिल्ली के वजीराबाद बैराज में अमोनिया की मात्रा बढ़ कर 1.5 पीपीएम तक पहुंच गई, जबकि पीने के पानी में अमोनिया बिल्कुल नहीं होना चाहिए। अमोनिया की इतनी मात्रा बढ़ने के कारण 120 एमजीडी के वजीराबाद और 95 एमजीडी क्षमता के चंद्रावल वॉटर ट्रीटमेंट प्लांटों को पूरी तरह बंद करना पड़ा। बराज का गेट उठाकर अमोनिया युक्त सारा पानी निकाला गया। इसके बाद ही शुक्रवार सुबह से पानी का प्रॉडक्शन शुरू किया गया।

प्लांट पूरी तरह ठप होने के कारण उत्तरी दिल्ली, पुरानी दिल्ली, एनडीएमसी, दिल्ली कैंट व साउथ वेस्ट दिल्ली के इलाकों में पानी की सप्लाई करने वाले भूमिगत जलाशयों में रिजर्व रहने वाला पानी तक खत्म हो गया। लिहाजा शुक्रवार की सुबह प्लांट शुरू होने के बाद पहले भूमिगत जलाशयों में पानी भरा गया। उसके बाद शाम से पानी सप्लाई शुरू की गई। पूरा उत्पादन होने के बावजूद 27 दिसम्बर की शाम सिर्फ 50 फीसदी एरिया में ही पानी की सप्लाई की जा सकी। जल बोर्ड के अधिकारियों के मुताबिक, 28 दिसम्बर सुबह तक सप्लाई पूरी तरह नॉर्मल हो जाएगी।

जल बोर्ड के अधिकारियों के मुताबिक पिछले साल नवंबर में भी ऐसे हालात पैदा हुए थे। इससे पहले भी कई बार अमोनिया बढ़ने के कारण प्लांटों को बंद करना पड़ा था। जल बोर्ड बार-बार की इन घटनाओं को रोकने के लिए सोमवार को सेंट्रल पलूशन कंट्रोल बोर्ड और हरियाणा पलूशन कंट्रोल बोर्ड को फैक्ट्रियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पत्र लिखेगा। जानकारी के मुताबिक, फैक्ट्रियों का प्रदूषण फैलाने वाला कचरा ड्रेन नंबर-8 में जाता है, लेकिन ड्रेन में काफी मात्रा में सिल्ट जमा होने के कारण यह गंदगी यमुना में बहा दी गई। ड्रेन की सिल्ट निकाल दी गई है। अब फैक्ट्रियों का कचरा ड्रेन में डाला जाना शुरू हो गया है।

साभार - नवभारत टाइम्स 

पर्यावरण : स्वास्थ्य का एक प्रमुख निर्धारक

भारत के 20 राज्यों के लगभग 6 करोड़ लोग फ्लोराइड सन्दूषण के कारण दन्त फ्लोरोसिस, कंकाली फ्लोरोसिस जैसी गम्भीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं। घुटनों के लड़ने और उनके मुड़ने के कारण विकलांगता के साथ-साथ आर्थिक कठिनाई जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती है। पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा की अधिकता से अस्थि विकास के लिये जरूरी कैल्शियम का अवशोषण बन्द हो जाता है और इसी कारण अस्थि में विरूपता उत्पन्न हो जाती है।
प्रायः रोग की उत्पत्ति पर्यावरण, रोगजनक कारक और होस्ट (परपोषी) से जुड़े कारकों की पारस्परिक क्रियाओं के परिणामस्वरूप होती है। पर्यावरण को व्यक्ति के परिवेश के भौतिक, रासायनिक और जैविक कारकों के साथ-साथ सभी सम्बद्ध व्यवहारों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। पर्यावरण में उपस्थिति इन कारकों के प्रभाव से मानव स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। चूँकि, इनमें से अधिकांश कारक मानव निर्मित हैं, अतः पर्यावरण को बचाना न केवल मानव हित में है बल्कि स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी यह एक उत्तम निवेश है।
इस आलेख में पर्यावरण से जुड़े सामान्य खतरे वाले कारकों का वर्णन है जो मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

पर्यावरण : स्वास्थ्य का एक प्रमुख निर्धारक


प्रत्येक वर्ष 1.3 करोड़ मौतें या दुनिया में होने वाली कुल लगभग एक चौथाई मौतें पर्यावरणी कारणों से होती हैं जिनमें मुख्यतया पानी, स्वच्छता एवं हाइजीन; घरेलू एवं बाह्य प्रदूषण; पेस्टीसाइड्स जैसे रसायनों का हानिकर प्रयोग और जलवायु परिवर्तन जैसी स्थितियाँ सम्मिलित हैं। ये सभी ऐसे खतरे हैं जिन्हें रोका जा सकता है अथवा उनसे बचा जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 80 प्रतिशत से अधिक रोगों में इनकी कुछ-न-कुछ भूमिका रही है। विशेषतया निर्धन परिवार के बच्चे इन रोगों के कारण रोगों और मौतों के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होते हैं। हालांकि, सरल और सस्ते उपाय उपलब्ध हैं जिन्हें यदि शुरुआत में ही और प्रभावी ढंग से लागू किया जाये तो इनमें से अधिकांश मौतें रोकी जा सकती हैं।

पर्यावरण में आये बदलाव के कारण भी गम्भीर स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। मार्च 2011 में जापान के फुकुशिमा डाइची में आये भूकम्प के बाद आई सुनामी मानव इतिहास में सबसे बड़ी परमाणु और पर्यावरणी आपदाओं में से एक है। वर्ष 2010 में पाकिस्तान में आई बाढ़ में 1500 से अधिक मौतें हुईं। वर्ष 2010-11 के दौरान भारत में लद्दाख के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न एवं ब्राजील के रियो-डि-जेनेरो नामक शहरों में आई अप्रत्याशित बाढ़ में भी भारी मौतें हुई थीं। भारत के विभिन्न भागों में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड से सन्दूषित भूजल से जुड़ी चिरकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ पर्यावरणी कारकों का उदाहरण हैं। भूमण्डलीकरण, तीव्र औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, अनियोजित एवं अनियंत्रित विकास, परिवहन में वृद्धि, कृषि में कीटनाशक दवाइयों पर अतिनिर्भरता और जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं पर तत्काल कार्यवाही नहीं की गई तो भविष्य में स्थिति और भी गम्भीर होने की सम्भावना है।

पर्यावरणी खतरों से उत्पन्न संचारी और असंचारी रोग


विश्व में स्वस्थ जीवन वर्षों की क्षति के सन्दर्भ में 24 प्रतिशत भार और कुल 23 प्रतिशत मौतों के पीछे पर्यावरणी कारकों का हाथ पाया गया है। जहाँ पर्यावरणी कारकों द्वारा विकासशील देशों में कुल 25 प्रतिशत मौतें होती हैं वहीं विकसित देशों में कुल 17 प्रतिशत मौतों के पीछे ऐसे कारकों का हाथ पाया गया है। इससे बच्चे सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। पन्द्रह वर्ष से कम आयु के बच्चों में होने वाली लगभग 24 प्रतिशत मौतें अतिसारीय रोगों, मलेरिया और श्वसनी रोगों के कारण होती हैं जो सभी पर्यावरण से सम्बद्ध हैं।

अधिकांश रोगों के पीछे विशिष्ट खतरे वाले कारकों का हाथ होता है (सारणी)। इनमें असुरक्षित पेयजल एवं स्वच्छता, रसोई में प्रयुक्त ईंधन से उत्पन्न धुएँ से प्रभावित होने, बाहरी वायु प्रदूषण, आर्सेनिक जैसे रसायनों से प्रभावित होने और जलवायु परिवर्तन जैसी स्थितियाँ सम्मिलित हैं। केवल भारत में लगभग 45 हजार मौतें असुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और अपर्याप्त सफाई के कारण होती हैं।

हालांकि, पेयजल की उपलब्धता से काफी प्रगति हुई है परन्तु एशिया के अधिकांश देशों में स्वच्छता की स्थिति ज्यों-की-त्यों बनी हुई है। वर्तमान में, 25 लाख लोग स्वच्छता सुविधाओं से वंचित हैं, भारत की लगभग 6.29 करोड़ आबादी को स्वच्छता सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। यूनिसेफ के अनुसार, भारत की लगभग 67 प्रतिशत ग्रामीण आबादी अभी भी खुले में शौच करती है। वर्ष 2010 के दौरान दक्षिण-पूर्व एशिया के बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका और भारत जैसे देशों में क्रमशः 44, 56, 8 और 66 प्रतिशत आबादी स्वच्छता सुविधा से वंचित पाई गई थी। इस स्थिति को देखते हुए सम्भवतः वर्ष 2015 तक जल और स्वच्छता के सम्बन्ध में सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य (एम डी जी)-7 की प्राप्ति नहीं की जा सकेगी।

अतिसारीय रोग के लगभग 94 प्रतिशत मामलों के पीछे असुरक्षित पेयजल और स्वच्छता का हाथ होता है। सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता सुविधाओं को प्राथमिकता प्रदान कर रोग भार कम किया जा सकता है जो व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय प्रगति में सहायक होगा। दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के देशों में भारत की तुलना में केवल नेपाल में ऐसी आबादी का अनुपात अधिक (60 प्रतिशत) है जिसे स्वच्छता सुविधाएँ उपलब्ध नहीं है।

घरेलू और बाहरी प्रदूषण से मानव स्वास्थ्य गम्भीर रूप से प्रभावित होता है। प्रत्येक वर्ष लोवर श्वसनी पथ संक्रमणों अथवा न्युमोनिया के लगभग 42 प्रतिशत मामलों के पीछे घरेलू और बाह्य प्रदूषण का हाथ होता है। घरों में लकड़ी जैसे ईंधन के जलाने से उत्पन्न प्रदूषण (सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर) से लम्बी अवधि तक प्रभावित होने पर विशेषतया बच्चों में न्युमोनिया, दमा, चिरकारी अवरोधी फुफ्फुस रोग (सी ओ पी डी) जैसे प्रमुख श्वसनी रोग उत्पन्न होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रत्येक वर्ष लगभग 8 लाख मौतें बाहरी वायु प्रदूषण के कारण होती हैं। उनमें 60 प्रतिशत मौतें एशिया में होती हैं जो मुख्यतया घरेलू ईंधन, डीजल चालित वाहनों, उद्योगों और सभी प्रकार के कचरे को जलाने जैसे कारकों के साथ-साथ धूम्रपान से उत्पन्न अरक्तताजन्य हृदय रोग, तीव्र श्वसनी संक्रमणों, दमा और फेफड़े के कैंसर की चपेट में आने के कारण होती हैं।

आर्थिक विकास के कारण हुए पर्यावरणी परिवर्तनों का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। एशिया और अफ्रीका में मलेरिया के लगभग 42 प्रतिशत मामले भूप्रयोग, निर्वनीकरण और जल संसाधन प्रबन्धन जैसे पर्यावरणी कारकों के कारण होते हैं। इसी प्रकार, धान की कृषि, सूकर पालन, रोगवाहकों का प्रजनन और असुरक्षित पेयजल के प्रयोग जैसी स्थितियाँ तीव्र मस्तिष्कशोथ सिण्ड्रोम के संचरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। केवल वर्ष 2011 में ही भारत में इसके 6800 मामले प्रकाश में आये और 820 मौतें हुईं, जिनमें अधिकांशतः 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे थे। यह स्थिति मुख्यतया उत्तर प्रदेश में देखी गई। चीन और इंडोनेशिया सहित अधिकांश देशों में डेंगू की महामारी और सिस्टोसोमिएसिस के संचरण में मुख्यतया पर्यावरणी कारक जिम्मेदार होते हैं।

विश्व भर में होने वाली मौतों के पीछे प्रमुख कारणों में कैंसर का द्वितीय स्थान है। कैंसर से होने वाली कुल दो तिहाई से अधिक मौतें विकासशील देशों में होती हैं। प्रतिवर्ष इसके 12.7 मिलियन मामलों में अनुमानतः 19 प्रतिशत मामलों के पीछे पर्यावरणी कारकों का हाथ होता है। फेफड़े के कैंसर में होने वाली कुल 71 प्रतिशत मौतों में धूम्रपान का हाथ पाया गया है। हेलिकोबैक्टर पाइलोरी के संक्रमण से होने वाला पेट का कैंसर द्वितीय अति सामान्य कैंसर है जो अपर्याप्त स्वच्छता और भीड़ युक्त आवास जैसी स्थितियों से सम्बद्ध है। हाल के दिनों में पंजाब के कृषि क्षेत्र में कैंसर की बढ़ती घटनाएँ प्रकाश में आई हैं जिसके पीछे पर्यावरणी कारकों की सम्बद्धता का संकेत मिलता है, जैसे कि पेस्टीसाइड्स का प्रयोग, जो पानी और मिट्टी दोनों में पाया गया है।

घरों के भीतर ठोस ईंधन जलाने से उत्पन्न धुएँ अथवा तम्बाकू के धूम्रपान से प्रभावित होने पर विशेषतया सर्दी के मौसम में दमा की शुरुआत हो जाती है। भारत के कई शहरों में इसके परिणामस्वरूप दमा की चपेट में आये बच्चों की संख्या काफी बढ़ी है। नई दिल्ली में सम्पन्न एक अध्ययन में दमा और चिरकारी अवरोधी फुफ्फुस रोग (COPD) के कारण अस्पताल के आपातकालीन विभाग में आने वाले व्यक्तियों की संख्या में क्रमशः 21 और 24 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई जो उच्च स्तर के घरेलू वायु प्रदूषण के कारण प्रभावित हुए थे। COPD के कारण होने वाली एक तिहाई से अधिक मौतें पर्यावरणी कारणों से जुड़ी होती हैं।

पर्यावरण से सम्बद्ध स्वास्थ्य समस्याएँ


आज भारत के 30 प्रतिशत शहरी और 90 प्रतिशत ग्रामीण घरों में पेयजल के रूप में गैर-शोधित अथवा भूजल का प्रयोग किया जाता है, जिनका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भूजल से प्राप्त पेयजल के फ्लोराइड और आर्सेनिक से सन्दूषित होने के कारण गम्भीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

भारत के 20 राज्यों के लगभग 6 करोड़ लोग फ्लोराइड सन्दूषण (1.5 मिग्रा/ली. से अधिक) के कारण दन्त फ्लोरोसिस, कंकाली फ्लोरोसिस जैसी गम्भीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं। घुटनों के लड़ने और उनके मुड़ने के कारण विकलांगता के साथ-साथ आर्थिक कठिनाई जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती है। पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा की अधिकता से अस्थि विकास के लिये जरूरी कैल्शियम का अवशोषण बन्द हो जाता है और इसी कारण अस्थि में विरूपता उत्पन्न हो जाती है। हालांकि, शोधित पेयजल के प्रयोग से इन स्थितियों से बचा जा सकता है।

भूजल में आर्सेनिक की उच्च उपस्थिति पश्चिम बंगाल में एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या के रूप में पाई गई है, जहाँ की लगभग 5 करोड़ आबादी इससे प्रभावित है। बांग्लादेश में आर्सेनिक समस्या को एक आपातकालीन स्वास्थ्य समस्या का दर्जा दिया गया है। जहाँ 64 जिलों के 59 जिलों और 463 उपजिलों के 249 उपजिलों में आर्सेनिक सन्दूषण की पहचान की गई है। बांग्लादेश के 60 से 80 लाख ट्यूबवेल्स में अनुमानतः एक चौथाई ट्यूबवेल्स में आर्सेनिक का स्तर राष्ट्रीय मानक 50 ppb अथवा 0.05 मिग्रा/ली. से अधिक पाया गया है। अनुमानतः 3 से 4 करोड़ लोग पेयजल में आर्सेनिक की उपस्थिति के कारण सम्भावित खतरे की श्रेणी में हैं। एक लम्बी अवधि तक कम मात्रा में भी आर्सेनिक से प्रभावित होने पर हाइपरकेरैटोसिस जैसे त्वचा रोगों और कैंसर के कारण मौत जैसी स्थितियाँ देखी गई हैं। अध्ययनों में पता चला है कि आर्सेनिक के प्रभाव में मधुमेह भी उत्पन्न हो सकता है। आर्सेनिक रहित पेयजल की व्यवस्था से ही इस जनस्वास्थ्य समस्या से बचा जा सकता है।

इसके अतिरिक्त, पर्यावरणी स्थितियाँ दक्षिण एशिया में बाढ़ और भूकम्प जैसी आपदाएँ उत्पन्न करती हैं जो कष्ट के साथ-साथ आर्थिक क्षति का कारण बनती हैं। जलवायु परिवर्तन से स्थिति और खराब होने की सम्भावना है और विकासशील देशों विशेषतया एशिया और अफ्रीका की निर्धन आबादी के स्वास्थ्य पर सम्भवतः गम्भीर प्रभाव पड़ेगा। इससे रोगवाहक जन्य और जलजन्य रोगों, लू लगने, दमा, हृदय वाहिकीय रोगों में वृद्धि होने के साथ-साथ अधिक बाढ़ और सूखा स्थितियों के कारण खाद्य सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो जाएगा। जहाँ ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकना एक व्यक्तिगत जिम्मेदारी है वहीं निगरानी और कार्य क्षमता को सुदृढ़ बनाते हुए तत्काल कार्यवाही आवश्यक है जिससे देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव से निपटने में सक्षम बनाया जा सके।

स्वास्थ्य पर पर्यावरण के प्रभाव का मूल्यांकन : नीति और कार्यक्रम विकास के लिये आवश्यक


मानव स्वास्थ्य पर पर्यावरणी कारकों के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक कारकों, मौजूदा प्रथाओं और रिवाजों, कार्यक्रमों एवं नीतियों की उपस्थिति तथा प्रभावित समुदायों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं उनके प्रयोग जैसी स्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है। राष्ट्रीय स्तर पर इस सूचना की कमी सहायता प्रदान करने में एक प्रमुख बाधा है। इस सूचना अन्तराल को मिटाने के लिये स्वास्थ्य पर पर्यावरण के प्रभाव के मूल्यांकन से नीतियों, कार्यक्रमों अथवा विकास सम्बन्धी गतिविधियों की पहचान करने में मदद मिल सकती है। इस तरह के मूल्यांकन से भवन निर्माण, परिवहन, गृह प्रबन्धन, ऊर्जा, उद्योग, शहरीकरण, जल, पोषण आदि जैसी गतिविधियों से सम्बन्धित स्वास्थ्य समस्याओं के लिये जिम्मेदार कारकों की भी पहचान की जा सकती है। इस प्रकार की सूचना विभिन्न परियोजनाओं के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को ज्ञात करने, नवीन योजनाओं के नियोजन एवं कार्यान्वयन के समय स्वास्थ्य को ध्यान में रखने और अन्ततः नवीन परियोजनाओं अथवा विकास सम्बन्धी गतिविधियों के दौरान स्थानीय आबादी के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने में भी सहायक हो सकती है।

स्वस्थ पर्यावरण के माध्यम से स्वास्थ्य का संरक्षण एवं रोग का निवारण


यह स्पष्ट है कि पर्यावरणी कारकों से निरन्तर भावी प्रभाव पड़ेंगे और वस्तुतः इस स्थिति के और खराब होने की सम्भावना है। पर्यावरणी कारकों से उत्पन्न स्वास्थ्य समस्याओं में कमी लाने तथा स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की चुनौतियों का सामना करने में सहायक कुछ नवीन नीतिगत प्रयास निम्न हैं:

(i) कार्यवाही हेतु एक प्रमाण-आधार विकसित करना : फिलहाल, देशों में पर्यावरण के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों, रोग संचरण के मार्गों और सम्भावित खतरे सहित आबादी पर जानकारी की कमी है। जल, वायु, आहार और जलवायु के सम्बन्ध में स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर अधिक विस्तृत एवं सुस्पष्ट आँकड़ों की आवश्यकता है जो उपयुक्त राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों के विकास और प्राथमिकता निर्धारण में सहायक हो सकते हैं। पर्यावरणी कारकों तथा आर्थिक विकास एवं लोगों के दैनिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने के लिये अधिक केन्द्रित अध्ययनों की आवश्यकता है। स्वास्थ्य और पर्यावरण पर एक राष्ट्रीय डाटाबेस के उपलब्ध होने से पर्यावरणी खतरे वाले कारकों से जुड़े विभिन्न रोगों की उपस्थिति और प्रवृत्ति के बीच सम्बन्ध स्थापित करने, अधिक खतरे की सम्भावना वाले क्षेत्रों की पहचान करने तथा पर्यावरणी एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी इंटरवेंशन कार्यक्रमों की अधिकतम आवश्यकता सहित आबादी की पहचान करने में सहायता मिलेगी।

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर सूचना एकत्र करने और उसके आदान-प्रदान करने की एक प्रक्रिया उपयोगी हो सकेगी। इस दिशा में भारत में कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं जो इस प्रकार हैं- सड़क निर्माण कार्य में प्लास्टिक का प्रयोग, मनाली में वाहनों के प्रवेश पर ‘ग्रीन-टैक्स’ की वसूली जिसका प्रयोग हिमाचल प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण में किया जाता है, उत्तराखण्ड में आबादी को गैस सिलेण्डर उपलब्ध कराना जिसमें ईंधन के रूप में जलावन लकड़ी की कटाई रुके और साथ ही वनीय संरक्षण हो सके, गुजरात में सौर-ऊर्जा (सोलर एनर्जी) का विस्तार, हरियाणा जैसे राज्यों में पूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम, कम लागत के शौच घरों के निर्माण में सुलभ का अनुभव, मध्य प्रदेश तथा देश के 7 अन्य राज्यों में गुटका और पान मसाला के प्रयोग पर प्रतिबन्ध, नेपाल में पारिस्थितिकीय अनुकूल शौच घरों का निर्माण आदि। इन सभी गतिविधियों से सम्बन्धित सूचना के आदान-प्रदान से और उसके कार्यान्वयन से देश का एक बड़ा हिस्सा पर्यावरणी खतरों से उत्पन्न होने वाली स्थितियों से बच सकता है।

(ii) राष्ट्रीय पर्यावरणी स्वास्थ्य नीति, योजना और मूलभूत ढाँचे को सुदृढ़ बनाना : स्वास्थ्य और पर्यावरण से सम्बन्धित समस्याएँ दूर करने के लिये एक राष्ट्रीय पर्यावरण और स्वास्थ्य कार्य योजना (नेशनल एनवायरनमेंट एंड हेल्थ एक्शन प्लान, NEHAP) के माध्यम से एक व्यापक एवं अन्तर्क्षेत्रीय प्रयास की आवश्यकता है। स्वास्थ्य पर पर्यावरण के प्रभाव के मूल्यांकन से प्राप्त आँकड़ों से पर्यावरण, स्वास्थ्य एवं अन्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों से बने एक कार्यकारी द्वारा प्राथमिकताओं की पहचान की जा सकती है जिसे बाद में स्वास्थ्य और पर्यावरण मंत्रालयों द्वारा अपनाया जा सकता है। यदि गम्भीरता के साथ यह योजना लागू की जाये तो पर्यावरण सम्बद्ध स्वास्थ्य समस्याओं को कम करने में लम्बी अवधि तथा प्रभावी हो सकती है। पर्यावरण और स्वास्थ्य पर एक राष्ट्रीय सलाहकार दल द्वारा समय-समय पर इस योजना के कार्यान्वयन पर निगरानी रखी जा सकती है।

राष्ट्रीय और स्थानीय सरकारों के मूल-भूत ढाँचे को सुदृढ़ करने की दिशा में गम्भीरता के साथ और तत्काल कार्यवाही की जानी चाहिए। जिनकी जिम्मेदारियों में सम्मिलित हैं- सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति, मलजल शोधन प्रणाली की व्यवस्था, मोटर वाहनों के लिये प्रदूषण-रहित ईंधन, स्वच्छ धूम्ररहित चूल्हे, बायोगैस और ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन आदि की व्यवस्था करना। यदि सामान्य आबादी द्वारा इस प्रकार की सेवाओं के लिये उपयुक्त संसाधनों की माँग की जाती है तो नीति-निर्माताओं के लिये एक प्राथमिकता होनी चाहिए।

(iii) सतत अन्तर्क्षेत्रीय समन्वयन और भागीदारी : पर्यावरण से जुड़े अधिकांश खतरे वाले कारक स्वास्थ्य क्षेत्र से परे होते हैं। इसलिये मानव स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने में पर्यावरण, कृषि, परिवहन, ऊर्जा, शहरी विकास, जल संसाधन एवं ग्रामीण विकास मंत्रालयों के साथ-साथ निजी क्षेत्रों द्वारा समन्वित कार्यवाही की जानी चाहिए। वर्तमान में अधिकांश देशों में इन क्षेत्रों के बीच प्रभावी समन्वयन की कमी है।

उच्चतम स्तर की सरकारी अध्यक्षता में विभिन्न प्रासंगिक सरकारी मंत्रालयों, गैर सरकारी संगठनों, निजी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित करते हुए एक उच्च स्तरीय राष्ट्रीय संचालन समिति की नियमित अन्तराल पर सम्पन्न बैठकों के परिणामस्वरूप NEHAP के कार्यान्वयन के लिये सभी क्षेत्रों को गतिशील बनाया जा सकता है।

(iv) सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ाना : पर्यावरण को बचाना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने तथा भावी पीढ़ियों के लिये मीठे जल के स्रोतों को सुरक्षित रखने, उत्तम स्वच्छता व्यवहार और व्यक्तिगत स्वच्छता अपनाने तथा पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाले कार्यों को निरुत्साहित करने के लिये जनसामान्य की सहायता प्राप्त करना आवश्यक है। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जनसामान्य में जागरुकता उत्पन्न करने में मीडिया और समुदाय-आधारित संगठनों की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

खुले में शौच करने, सड़कों पर प्लास्टिक की बोतलें, थैलियाँ फेंकने, सभी प्रकार के कचरे को जलाने जैसी आदतों को निरुत्साहित करने और हाथ धोने एवं व्यक्तिगत स्वच्छता, कागज के प्रयोग को घटाने, उनकी रिसाइक्लिंग करने, केवल पारिस्थितिक अनुकूल सामग्रियों को प्रयोग करने, सार्वजनिक परिवहन का प्रयोग करने, अधिक वृक्षों का रोपण करने जैसी स्थितियों को बढ़ावा देने और धूम्रपानकर्ता धुएँ के प्रभाव से बचने जैसी स्थितियों के लिये एक सामाजिक अभियान चलाने की आवश्यकता है।

(v) स्वास्थ्य और क्षमता निर्माण की भूमिका : स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में योगदान देने वाले अन्य क्षेत्रों को गतिशील बनाने में स्वास्थ्य पेशेवरों की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन भी स्वास्थ्य क्षेत्र द्वारा किया जा सकता है। साथ ही मानव स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने में अन्य क्षेत्रों को नीतियाँ विकसित करने में परामर्श दी जा सकती है। इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य पेशेवरों, सिविल सोसाइटी के सदस्यों और अन्य सहयोगियों को पर्यावरणी स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं और प्राथमिकताओं पर समय-समय पर नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष


भारत के विभिन्न भागों में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड से सन्दूषित भूजल से जुड़ी चिरकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ पर्यावरणी कारकों का उदाहरण हैं। भूमण्डलीकरण, तीव्र औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, अनियोजित एवं अनियंत्रित विकास, परिवहन में वृद्धि, कृषि में कीटनाशक दवाइयों पर अतिनिर्भरता और जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं पर तत्काल कार्यवाही नहीं की गई तो भविष्य में स्थिति और भी गम्भीर होने की सम्भावना है।स्वास्थ्य पर पर्यावरण का एक प्रमुख प्रभाव पड़ता है और पर्यावरणी स्वास्थ्य में निवेश करना एक उत्तम निवेश है। त्वरित शहरीकरण, औद्योगीकरण, भूमण्डलीकरण और आबादी में वृद्धि जैसी स्थितियाँ पर्यावरण पर और दबाव डालती हैं। यदि सभी क्षेत्रों द्वारा तत्काल कार्यवाही नहीं की गई तो समस्या और गम्भीर हो सकती है जिसका मानव स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। इसका प्रभाव निर्धन और अतिसंवेदनशील वर्गों पर अत्यधिक पड़ेगा। सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य (MDGs) के सभी आठ पहलुओं से पर्यावरण की निकट सम्बद्धता के बावजूद पर्यावरण और स्वास्थ्य के बीच पारस्परिक क्रिया के लिये प्राथमिकता निर्धारण के बिना सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना एक चुनौती होगी। इस ग्रह का भविष्य अब पूर्णतया इस पर निर्भर है कि हम क्या निर्णय लेते हैं और आज क्या कदम उठाते हैं।

आई सी एम आर और एकेडमी ऑफ फिनलैण्ड के बीच सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर


भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद (आई सी एम आर) मुख्यालय में दिनांक 2 नवम्बर, 2012 को परिषद और एकेडमी ऑफ फिनलैण्ड (ए एफ) के बीच चिरकारी असंचारी रोगों, मधुमेह और स्वास्थ्य सेवाओं में चुनौतियों के क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग के लिये एक सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए। यह सहयोग संयुक्त कार्यशालाओं के आयोजन और सहयोगी शोध परियोजनाओं के संचालन पर आधारित होगा। इस सहमति ज्ञापन पर एकेडमी ऑफ फिनलैण्ड के प्रतिनिधि के रूप में नई दिल्ली स्थित फिनलैण्ड दूतावास के काउंसलर (इकोनॉमिक्स, कॉमर्शियल तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी) श्री जुहा पाइक्को और आई सी एम आर की ओर से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के अन्तर्गत स्वास्थ्य अनुसन्धान विभाग के सचिव एवं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद के महानिदेशक डॉ. विश्व मोहन कटोच ने हस्ताक्षर किये। इस अवसर पर परिषद मुख्यालय के असंचारी रोग प्रभाग की प्रमुख डॉ बेला शाह, वरिष्ठ उपमहानिदेशक (प्रशासन) श्री अरुण बरोका, वैज्ञानिक ‘जी’ एवं समन्वयक डी एच आर डॉ. के. सत्यनारायण और अन्य अधिकारियों की उपस्थिति रही।

Source: 
 आई सी एम आर पत्रिका, नवम्बर, 2012