Saturday, 20 July 2019

नवउदारवाद के पच्चीस साल

नवउदारवाद के पच्चीस साल --अमीर मालामाल, पब्लिक बेहाल
नवउदारवादी दृष्टि -- बड़े पैमाने पर जनता रहे स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित
अमित सेनगुप्त
अब से पच्चीस साल पहले जब भारत में कोई बच्चा पैदा होता था, उसके बचे रहने की संभावनाएं पड़ौसी नेपाल तथा बांग्लादेश के मुकाबले में काफी ज्यादा हुआ करती थीं। पच्चीस साल बाद, 1991 से भारत में शुरू  हुए नवउदारवाद पर अमल तथा नवउदारवादी सुधारों के बाद, नेपाल और बांग्लादेश, दोनों में ही शिशु मृत्यु दर भारत से कम है यानी इन देशों में पैदा होने वाले बच्चे के बचे रहने की संभावनाएं, भारत में पैदा होने वाले बच्चे के मुकाबले ठीक-ठाक ज्यादा हैं। यह सूत्र रूप में इसका बयान कर देता है कि भारत में नवउदारवादी सुधारों ने क्या किया है और जनता के स्वास्थ्य पर उसका क्या असर पड़ा है। यह तब है जबकि भारत को नवउदारवादी सुधारों के प्रचार-उदाहरण के तौर पर पेश किया जाता है और आर्थिक वृद्घि दर के आंकड़ों के यह दर्शाने का दावा किया जाता है कि भारत सारी दुनिया की सबसे तेजी से तरक्की कर रही अर्थव्यवस्था बन गया है। वृद्धि  दर के दावे अपनी जगह, भारत की जनता के जीवन पर इसका शायद ही कोई असर पड़ा है और आज महत्वपूर्ण मानव विकास सूचकांकों के मामले में भारत, पड़ौसी नेपाल तथा बांग्लादेश जैसे अनेक सबसे कम विकसित देशों से भी पीछे चला गया है।
विश्व बैंक के नुस्खों पर टिके सुधार
          इन पच्चीस वर्षों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत में जो भी सुधार हुए हैं, विश्व बैंक जैसी एजेसिंयों द्वारा सुझाए गए कदमों के अनुसार ही हुए हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र के लिए इन एजेंसियों द्वारा पेश किए गए नुस्खों में निम्रलिखित कदम शामिल रहे हैं: सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्चों की हदबंदी करना; सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थाओं में लागत उगाही (उपयोक्ता शुल्क) करना; स्वास्थ्य रक्षा प्रणाली को अलग-अलग खानों में बांटना (गरीबों के लिए 'बेसिक- स्वास्थ्य सेवा और अमीरों के लिए निजी स्वास्थ्य सेवा); और, निजी क्षेत्र के लिए विभिन्न कामों की आउटसोर्सिंग करना। जैसाकि हम आगे देखेंगे, भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में 1991 से किए गए सुधार, बड़ी मुस्तैदी से इन नुस्खों का अनुसरण करते थे।
          यह दर्ज करने वाली बात है कि भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र की उपेक्षा की शुरूआत कोई 1991 से नहीं हुई थी। भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से कम फंड दिए जाने तथा आम तौर पर उपेक्षा की शिकार रही है। इस सिलसिले की शुरूआत 1950 के दशक में ही हो गयी थी। 1980 के  दशक के मध्य की एक छोटी सी अवधि को छोड़कर, जब सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्चे में बढ़ोतरी हुई थी (भले ही यह बढ़ोतरी थोड़ी ही थी), यह खर्चा बराबर सकल घरेलू उत्पाद के 1 फीसद के स्तर पर या उससे भी कम ही बना रहा है। इस सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को, जो पहले ही फंड की भारी कमी की मारी हुई थी, 1991 में नवउदारवादी सुधारों की शुरूआत के साथ बहुत भारी कटौतियों की मार झेलनी पड़ी। मिसाल के तौर पर 1992-93 के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य के क्षेत्र के लिए आवंटन में करीब 40 फीसद की कटौती कर दी गयी। इतना ही नहीं राज्यों के बजटों पर भी 'राजकोषीय अनुशासन" का मंत्र थोप दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि 1990 के दशक के आखिर तक आते-आते देश के विभिन्न राज्यों की सरकारों को इस क्षेत्र में कमखर्ची के कदम थोपने पड़े। इसने केद्रीय बजट में हो रही कटौतियों के असर को और कई गुना कर दिया क्योंकि स्वास्थ्य रक्षा पर होने वाले कुल सार्वजनिक खर्च का 70 फीसद से ज्यादा हिस्सा राज्य सरकारों से ही आ रहा था।
निजी स्वास्थ्य सुविधाएं : पैसा ज्यादा उपचार कम
          इस तरह, पहले ही बीमार सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को घुटनों पर ही गिरा दिया गया और निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए इस क्षेत्र में और ज्यादा घुसपैठ करने के लिए रास्ता तैयार कर दिया गया। भारत में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्चे के बहुत ही निचले स्तर पर रहने का नतीजा यह हुआ है कि इससे परिवारों पर बहुत भारी बोझ आ पड़ा है। 2004-05 तक आते-आते स्वास्थ्य पर प्रतिव्यक्ति सार्वजनिक खर्च 242 रु0 ही रह गया, जबकि निजी खर्चा इसका करीब चार गुना हो गया यानी प्रतिव्यक्ति 959 रु0। (ये आंकड़े राष्ट्रीय  स्वास्थ्य एकांउट्स से उपलब्ध, पृथक्कृत आंकड़ों पर आधारित हैं।) इसके नतीजे में खुद सरकार द्वारा परिभाषित गरीबी की रेखा के नीचे धकेल दिए गए लोगों की संख्या बहुत बढ़ गयी क्योंकि स्वास्थ्य के लिए अपनी जेब से (ओओपी) किए जा रहे खर्चे में भारी बढ़ोतरी हो रही थी। स्वास्थ्य पर जेब से खर्च के चलते गरीबी की रेखा के नीचे धकेले गए लोगों की संख्या जहां 1993-94 में करीब 2 करोड़ 60 लाख थी, 2004-05 तक यह संख्या बढ़कर 3 करोड़ 90 लाख हो गयी और 2012-13 तक आते-आते 7 से 9 करोड़ के बीच। इसमें भी ग्रामीण परिवारों को अपनी पारिवारिक आय का, शहरी परिवारों के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य रक्षा पर खर्च करना पड़ रहा था क्योंकि गांव के लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं तक और भी कम पहुंच हासिल थी।
          साक्ष्य यह भी दिखाते हैं कि मरीजों की बड़ी संख्या के उपचार ही नहीं कराने के पीछे मुख्य कारण, स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच न होना और स्वास्थ्य रक्षा पर खर्च करने के लिए पैसा नहीं होना ही है। 2004-05 में ग्रामीण इलाकों में 12 फीसद से ज्यादा लोगों ने बताया कि उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच ही नहीं होने के चलते उपचार नहीं कराया था, जबकि 25 फीसद ने उपचार न कराने के लिए आर्थिक तंगी को कारण बताया। याद रहे कि 1986-87 में पैसे की तंगी के कारण इलाज न कराने वालों का अनुपात 15 फीसद ही था।
          आज, बाहर रहकर उपचार कराने वालों में से करीब 20 फीसद और अस्पताल में भर्ती होकर इलाज कराने वालों में 40 फीसद से कम का इलाज, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में होता है। शेष मरीज निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के रहमो-करम पर है, जिनका उपचार अक्सर महंगा होता है और ऊटपटांग। यूपीए सरकार के राज में एक बहुत ही कमजोर क्लीनिकल एस्टब्लिशमेंट्स एक्ट पारित किया गया था, कि वह तमाम स्वास्थ्य रक्षा सुविधाओं के नियम की जिम्मेदारी संभालेगा। लेकिन, ज्यादातर राज्यों में तो अब तक इस इस ढीले-ढाले कानून के बहुत ही सीमित प्रावधानों को भी अधिसूचित ही नहीं किया गया है।
          आज भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था दुनिया की सबसे ज्यादा निजीकृत स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में से है और स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्चे दुनियाभर में सबसे निचले स्तर पर हैं। भारत में स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च में से सिर्फ 36 फीसद सार्वजनिक खर्चा होता है। विश्व बैंक के डॅाटा बेस के अनुसार, इस मामले में भारत दुनिया के 190 देशों में सबसे नीचे से 16वें नंबर पर है। सिएरा लोन, अफगानिस्ता, हैती और गिनी जैसे देश उसके आस-पास हैं। सकल घरेलू उत्पाद के हिस्से के तौर पर स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्चे के पहलू से तो भारत का रिकार्ड और भी खराब है। स्वास्थ्य रक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ 1.3 फीसद खर्च करने के चलते भारत दुनिया के तमाम देशों में नीचे से 12वें स्थान पर है, जहां उसके आस-पास हैं म्यांमार, हैती, दक्षिणी सूडान, तिमूर-लेस्टे तथा पाकिस्तान जैसे देश।
दवाएं सब के लिए या
दवाएं मुनाफे के लिए
          यह विडंबनापूर्ण है कि हालांकि भारत दुनिया का दवाओं का तीसरा सबसे बड़ा विनिर्माता है और दवाओं के अपने उत्पादन के करीब आधे का निर्यात कर रहा है, स्वास्थ्य पर औसत परिवार द्वारा अपनी जेब से किए जाने वाले खर्चे में सबसे बड़ा हिस्सा दवाओं के खर्च का ही होता है। भारत में ही दुनिया भर में ऐसे सबसे ज्यादा लोग रहते हैं (यह हिस्सा आबादी के 50 से 70 फीसद तक होने का अनुमान है), जो जरूरत पडऩे पर पूरी जरूरी दवाएं भी हासिल नहीं कर सकते हैं। इसके बावजूद, हमारे देश में दवाओं के कुल उपभोग में दवाओं की सार्वजनिक खरीद तथा वितरण से आने वाला हिस्सा बहुत थोड़ा है, कुल का करीब 10 फीसद।
          यूपीए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान राज्यों में दवाओं की इक_ïी खरीद की व्यवस्थाओं के लिए, केंद्रीय फंड में से सहायता की व्यवस्था करने पर चर्चा शुरू की थी। वास्तव में एक तमिलनाडु ही है जहां दवाओं की सार्वजनिक खरीद की व्यवस्था वाकई काम कर रही है। दवाओं की इक_ïी खरीद पर आधारित यह व्यवस्था वहां 1990 के दशक से चल रही है। इस तरह, सार्वजनिक क्षेत्र में दवाओं की कीमतों पर अंकुश लगाने और आवश्यक दवाओं के स्टॉक में अनुपलब्ध होने के प्रकरणों को खत्म करने कम से कम तमिलनाडु का अनुभव मौजूद था। इस राज्य में इस व्यवस्था के जरिए करीब-करीब 400 दवाओं तथा चिकित्सकीय उपकरणों का वितरण किया जाता है। बहहरहाल, केंद्रीय सहायता के जरिए इस मामले में तमिलनाडु के अनुभव को और आगे बढ़ाने का विचार अजन्मा ही खत्म हो गया। इसके बजाए यूपीए सरकार ने ऐसी योजनाएं अपनाने का जिम्मा राज्यों पर ही डाल दिया। वर्तमान एनडीए सरकार ने भी इस मामले से हाथ ही खींचे रखने की नीति अपनायी है। फिर भी अनेक राज्यों ने 'मुफ्त दवा योजनाÓ के नाम से ऐसी ही योजनाओं का अपनाना शुरू कर दिया है, जिनके तहत एक विशेष सूची में आने वाली आवश्यक दवाएं, सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में मुफ्त मुहैया करायी जा रही हैं।
          वास्तव में कांग्रेस की पिछली सरकार के राज में राजस्थान में, विभिन्न राज्यों में चल रही 'मुफ्त दवा योजनाओं ' में से सबसे सबसे मुकम्मल तथा सबसे कारगर, दवा वितरण योजना की शुरूआत की गयी थी। लेकिन, यह दिलचस्प तथ्य है कि जब उसकी जगह पर भाजपा की सरकार सत्ता में आयी, इस योजना को ठप्प करने की कोशिशें भी की गयीं। लेकिन, जनसमर्थन ने राजस्थान में इस मुफ्त दवा वितरण योजना को कायम रखा है।
दवाओं के मूल्य पर नियंत्रण
          बहरहाल, अगर ऐसी मुफ्त दवा योजनाओं को पर्याप्त रूप से भी राज्यों में लागू किया जा रहा हो (जाहिर है कि कम से कम अब तक दूर-दूर तक ऐसा होने के आसार नहीं हैं) तब भी ''मुफ्त दवा" योजनाओं की एक बड़ी सीमा यह रहेगी कि दवाओं का प्रचंड रूप से बड़ा हिस्सा तो फिर भी सीधे मरीजों द्वारा ही खरीदा जा रहा होगा। अगर हमारे देश में रोगियों का बड़ा हिस्सा दवाओं से वंचित रह जाता है, तो ऐसा दवाओं के उपलब्ध न होने के चलते उतना नहीं होता है, जितना कि दवाओं के दाम बहुत ज्यादा होने के चलते। इसीलिए, दवाओं के मूल्य के नियंत्रण का मुद्दा भारत में एक बड़ा मुद्दा है।
          पहला चौतरफा दवा मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) तो 1978 में ही जारी किया गया था, जिसके जरिए 343 दवाओं के दाम की अधिकतम सीमा तय कर दी गयी था। उसके बाद से, 1987 तथा 1994 में जारी दवा मूल्य नियंत्रण आदेशों ने, पहले वाले आदेश के प्रावधानों को कमजोर ही करने का काम किया। 1994 के डीपीसीओ में मूल्य नियंत्रण के दायरे में आने वाली दवाओं की संख्या घटाकर 74 कर दी। बाद में एक जनहित याचिका के जरिए, डीपीसीओ के प्रावधानों के लगातार कमजोर किए जाने को अदालत में चुनौती दी गयी और इस याचिका पर अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन यूपीए सरकार को निर्देश दिया था कि सभी आवश्यक दवाओं (संख्या लगभग 350) के लिए अधिकतम दाम तय करे।
          लेकिन, तत्कालीन यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का जैसे मखौल ही बनाते हुए, दवाओं के अधिकतम दाम तय करने के तरीके को ही पूरी तरह से बदल डाला। जहां पहले दवाओं के विनिर्माण की वास्तविक लागत को आधार बनाकर अधितकतम मूल्य तय किया जाता था, यूपीए सरकार ने 2012 में एक नया डीपीसीओ जारी किया, जिसमें सभी आवश्यक दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने की खाना-पूरी तो कर दी गयी, लेकिन अधिकतम मूल्य दवाओं के तत्कालीन बाजार भाव के हिसाब से तय करने की व्यवस्था शुरू कर दी। चूंकि दवाओं के मौजूदा बाजार भाव, दवा कंपनियों ने पहले ही बढ़ा दिए थे, 2012 के डीपीसीओ के लागू होने से दवाओं के दाम में कुल मिलाकर मुश्किल से 10 फीसद की कमी ही हो सकी। अगर दवाओं का अधिकतम मूल्य, उनकी वास्तविक उत्पादन लागत के आधार पर तय करने का पहले वाला फार्मूला ही लागू होता, तो इस डीपीसीओ से दवाओं के दाम में 30 से 40 फीसद की या उससे भी ज्यादा कमी हुई होती। विचित्र बात यह है कि अब वर्तमान एनडीए सरकार इस नये डीपीसीओ को लागू कराने का श्रेय लेना चाहती है और इस सचाई की ओर से पूरी तरह से आंखें ही बंद किए रखना चाहती है कि 2012 का डीपीसीओ वास्तव में एक धोखा था, जो यूपीए की पिछली सरकार ने दवा कंपनियों को बचाने के लिए किया था।
उदारीकरण के दौर में
          1995 में विश्व व्यापार संगठन समझौते पर दस्तखत करने के बाद, भारत को 1970 के पेटेंट कानून के अतर्गत लंबे अर्से से हासिल संरक्षण को 2005 में त्यागना पड़ा। इसका नतीजा यह हुआ कि इससे पहले तक जो हो रहा था उसके विपरीत, अब जेनरिक दवा कंपनियां के लिए नयी दवाओं के सस्ते जेनरिक रूप निर्मित करने के रास्ते बंद हो गए और बहुराष्ट्रीय  कंपनियों ने कई नई दवाएं ऐसे ऊंचे दामों पर बेचनी शुरू कर दीं, जिन दामों पर भारतीय मरीज इन दवाओं को खरीद ही नहीं सकते थे। उसके बाद से एक के बाद एक आयी सरकारें, देश के पेटेंट कानून में मौजूद अनिवार्य लाइसेंसिंग के प्रावधान का सहारा लेकर, जो सरकार को इसकी इजाजत देता है कि स्थानीय कपंनियों का पेटेंटशुदा दवाओं के निर्माण तथा बिक्री का लाइसेंस मुहैया कराए, इन नयी दवाओं को कहीं सस्ते दाम पर उपलब्ध कराने से इंकार करती आयी हैं। याद रहे कि सारी दुनिया का अनुभव यही दिखाता है कि अनिवार्य लाइसेंसिंग के प्रावधान के प्रयोग के जरिए, पेटेंटशुदा दवाओं के दाम में 90 से 95 फीसद तक की कमी की जा सकती है।
          2000 के दशक के मध्य से इस देश में स्वास्थ्य रक्षा सेवाएं मुहैया कराने के मामले में दो महत्वपूर्ण पहलें सामने आयी हैं। इनमें पहली तो 2005 में राष्टï्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की शुरूआत ही है। यह नवउदारवादी सुधारों के लागू किए जाने के बाद से सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के करीब-करीब पूरी तरह से ही बैठ जाने की स्थिति से निपटने की आंशिक कोशिश थी। बेशक, एनएचआरएम की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने तथा उन्नत बनाने की महत्वाकांक्षा अपने आप में प्रशंसनीय ही मानी जाएगी। एनआरएचएम (या अब उसके नये रूप राष्ट्रीय  स्वास्थ्य मिशन) के चलते, बेशक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में कुछ सुधार आया है। लेकिन, इसकी वृहत्तर महत्वाकांक्षाएं शायद ही पूरी हो सकी हों क्योंकि इस योजना को लगातार फंड की कमी झेलना पड़ी है। राष्ट्रीय  स्वास्थ्य मिशन के लिए फंड के इस अभाव को, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में की गयी इस टिप्पणी की रौशनी में देखा जाना चाहिए कि, '(राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए) हासिल हुआ बजट और उसके तहत हुआ खर्चा, एनआरएचएम के खाके में पूरी तरह से नयी जान डालने के लिए जितने की कल्पना की गयी थी, उसका 40 फीसद ही था।
स्वास्थ्य बीमा को कारोबार को बढ़ावा देने का खेल
          दूसरी महत्वपूर्ण पहल, सार्वजनिक धन से संचालित बीमा योजनाओं की थी। इसकी शुरूआत 2007 से हुई, राज्य  और केंद्र, दोनों के ही स्तरों पर। राज्यों के स्तर पर ऐसी पहली योजना, आरोग्यश्री के नाम से आंध्र प्रदेश में शुरू की गयी और केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की शुरूआत की गयी, जिसे अब राष्टï्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना में तब्दील कर दिया गया है। ये योजनाएं, स्वास्थ्य रक्षा के लिए वित्त जुटाने और स्वास्थ्य रक्षा सेवाएं मुहैया कराने को स्पष्ट रूप से अलग करती हैं। ये योजनाएं, लाभार्थियों को आधिकारिक रूप से मान्यताप्राप्त स्वास्थ्य रक्षा सुविधाओं से स्वास्थ्य सेवा हालिस करने की इजाजत देती हैं। इनमें निजी और सरकारी, दोनों ही तरह की स्वास्थ्य सुविधाएं हो सकती हैं। लेकिन, व्यवहार में इस तरह मान्यता हासिल करने वाली स्वास्थ्य सेवा संस्थाओं में प्रचंड बहुमत निजी क्षेत्र की संस्थाओं का ही रहता है। वास्तव में ये स्वास्थ्य बीमा योजनाएं (जिन्हें दुनिया भर में स्वास्थ्य के क्षेत्र में नवउदारवादी सुधारों की निशानी ही कहा जा सकता है) सार्वजनिक वित्त के सहारे, निजी स्वास्थ्य सेवाओं को और ताकत देने का ही काम करती हैं। पुन: ये योजनाएं सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने पर स्वास्थ्य सेवा की भरपाई करती हैं, जबकि स्वास्थ्य पर निजी खर्च का ज्यादा बड़ा हिस्सा तो अस्पताल में भर्ती हुए बिना उपचार कराने वालों से ही आता है। लेकिन, समस्या सिर्फ इन स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के स्वास्थ्य संबंधी सभी जरूरतें पूरी न करने की ही नहीं है। समस्या यह भी है कि बेईमान स्वास्थ्य सेवा प्रदाता अनुुचित मुनाफे बटोरने के लिहहह इस व्यवस्था का गलत तरीके से दोहन करते हैं। इन योजनाओं को, जो बहुत हद तक निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के साथ साझेदारी में ही चलायी जा रही हैं, अनेक राज्यों में समूचे स्वास्थ्य व्यवस्था को ही सैकड़ों करोड़ रु0 का चूना लगाते पाया गया है। इसके लिए अंधाधुंध तथा बिना जरूरत के ही आपरेशन किए गए हैं, मिसाल के तौर पर कुछ इलाकों असामान्य रूप से बड़ी संख्या में बिना किसी जरूरत के ही, गर्भाशय निकालने के ऑपरेशन कर दिए गए हैं। इन योजनाओं से बेहतर स्वास्थ्य परिणाम हासिल करने में कोई मदद नहीं मिली है।
भाजपा की दृष्टि के अनुरूप नवउदारवादी सुधारों में तेजी
        मौजूदा भाजपा सरकार के सत्ता में आने के कुछ ही महीनों में, 2014 के आखिर तक ही नये शासन के इरादों को साफ करते हुए, स्वास्थ्य के क्षेत्र के लिए पहले ही आवंटन का जो वादा किया जा चुका था उसमें से, 20 फीसद की कटौती की जा चुकी थी। 2016-17 के बजट ने साफ कर दिया कि  यह सरकार उत्तरोत्तर सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संसाधन कम करने जा रही है और स्वास्थ्य रक्षा का काम मुनाफे संचालित निजी क्षेत्र के ही हाथों में आउट-सोर्स करने जा रही है। कुल मिलाकर स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए आवंटन में, 2015-16 के संशोधित अनुमान के  32,819 करोड़ रु0 के मुकाबले रु0 में मामूली बढ़ोतरी हुई और यह आवंटन 37,061 करोड़ रु0 हो गया। मुद्रास्फीति को हिसाब मेें लिया जाए तो यह प्रतिव्यक्ति आवंटन में सिर्फ 5 फीसद की बढ़ोतरी दिखाता है।
          हाल ही जारी की गयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में बहुत कम करने के बावजूद, यह आकांक्षा जतायी गयी है कि स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फीसद खर्च किया जाना चाहिए। इसके लिए वर्तमान खर्चे को दोगुना करना होगा। मोटा-मोटा हिसाब लगाएं तब भी हर साल प्रतिव्यक्ति आवंटन में 25-30 फीसद की बढ़ोतरी जितना आवंटन करने के जरिए ही, स्वास्थ्य रक्षा संबंधी खर्चा अगले पांच साल में सकल घरेलू उत्पाद के 2.5 फीसद के लक्ष्य तक पहुंच सकता है। विशेष रूप से चिंतित करने वाली बात यह है कि राष्ट्रीय स्वास्थ मिशन के लिए फंड की तंगी का रुझान अब भी बना हुआ है। राष्टï्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए आवंटन में बहुत ही मामूली बढ़ोतरी हुई है और यह 2015-16 के 19,135 करोड़ 37 लाख रु0 से बढ़कर, 2016-17 में 19,437 करोड़ रु0 तक ही पहुंच पाया है। मुद्रास्फीति और वास्तविक आबादी में बढ़ोतरी को हिसाब में लिया जाए तो यह, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए प्रतिव्यक्ति आवंटन में 6-7 फीसद की कमी का ही मामला बैठेगा।
          एक ओर तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के जरिए, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए उपलब्ध फंड को कम करने का स्पष्टï और सोचा-समझा खेल चल रहा था और दूसरी ओर वित्त मंत्री के उसी बजट भाषण की सुर्खियों में यह एलान किया जा रहा था कि सार्वजनिक धन से संचालित स्वास्थ्य बीमा योजना का विस्तार किया जाएगा। बीमा आधारित स्वास्थ्य रक्षा व्यवस्था को बढ़ावा देने के आग्रह से भाजपा सरकार के ग्रस्त होने को, इस बात के बढ़ते साक्ष्यों की रौशनी में देखा जाना चाहिए कि मौजूदा राष्ट्रीय तथा राज्यस्तरीय स्वास्थ्य बीमा योजनाएं, गरीबों पर पडऩे वाले स्वास्थ्य रक्षा खर्चे के सत्यानाशी बोझ पर अंकुश लगाने में विफल ही रही हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के ताजातरीन आंकड़े यही दिखाते हैं कि इस तरह की स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का कवरेज, ग्रामीण क्षेत्र में 13 फीसद और शहरी क्षेत्र में 12 फीसद से ज्यादा नहीं है।
स्वाथ्य बीमा के जरिए निजी क्षेत्र को बढ़ावा
          सरकार निजी स्वास्थ्य बीमा को भी आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने में लगी हुई है और 2015-16 के बजट में इस स्पष्ट रूप से बढ़ावा देते हुए, निजी स्वास्थ्य बीमा खरीदने वालों के लिए कर राहत का एलान किया गया था। इसके साथ ही साथ राजस्थान तथा मध्य प्रदेश जैसे राज्य वर्तमान ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाएं ही पट्टïे पर निजी क्षेत्र के हवाले करने की तैयारियां कर रही हैं।
          इन तमाम नीतियों का असर स्पष्टï रूप से दिखाई देने लगा है। अनेक राज्यों में राष्टï्रीय स्वास्थ्य  मिशन की गतिविधियां लडख़ड़ा रही हैं और कुछ राज्यों में तो ये गतिविधियां ठप्प ही हो गयी हैं। वास्तव में केंद्र में नयी सरकार बनने के छ: महीने के अंदर-अंदर ही फंड के सोखे जाने में कमी शुरू हो गयी थी और वित्त वर्ष 2014-15 के पहले छ: महीने में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए आवंटित फंड का सिर्फ 42 फीसद खर्चे किया जा सका था। सरकार के अपने आंकड़े ( सालाना ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़ों में प्रकाशित) कुछ बहुत ही चिंताजनक रुझानों की ओर इशारा करते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में काम कर रही ऑक्जिलरी नर्स मिडवाइफों (एएनएम) की संख्या में 2014 तथा 2015 के बीच वास्तव में गिरावट ही दर्ज हुई थी। यही स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में काम करने वाले विशेषज्ञों की संख्या की थी। 2015 के मार्च में, ग्रामीण सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में विशेषज्ञों के अनुमोदित पदों में से सिर्फ 18.8 फीसद भरे जा सके थे। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के जरिए, स्वास्थ्य रक्षा के बुनियादी ढांचे के निर्माण की गति भी धीमी पड़ रही है। 2014-15 में सिर्फ 228 नये प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तथा 33 नये सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खोले जा सके थे, जबकि 2013-14 में इतनी ही अवधि में क्रमश: 573 तथा 176 ऐसे स्वास्थ्य केंद्र खोले गए थे। सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में दवा आदि, उपभोग से खत्म होने वाली चीजों की और मानव संसाधनों की भारी तंगियां पैदा हो गयी हैं। समय-समय पर एचआइवी तथा टीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की दवाएं तक खत्म ही हो जाने की चोंकाने वाली खबरें भी आती रही हैं।
          स्वास्थ्य रक्षा के संबंध में भाजपा की जो दृष्टि  है उसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की शायद ही कोई भूमिका है। उनके तथाकथित 'स्वास्थ्य आश्वस्ति' मॉडल की धुरी, स्वास्थ्य बीमा की व्यवस्था है न कि स्वास्थ्य रक्षा का सार्वजनिक क्षेत्र में प्रावधान करना। आने वाले दिनों में हम इस परिकल्पना का और खुलकर अमल में उतारा जाना देखेंगे, जिसकी एक पहचान यह है कि सिर्फ प्राथमिक स्वास्थ्य रक्षा के स्तर पर, बुनियादी स्वास्थ्य रक्षा की व्यवस्था रहेगी न कि सार्वजनिक चौतरफा स्वास्थ्य व्यवस्था। भाजपा के सिद्धांतकार  बेशक इससे खुश होंगे कि इस तरह से निजी चिकित्सा सहायता का ताना-बाना और बढ़ेगा और इसमें भी निजी अस्पतालों की कार्पोरेट कंपनियों द्वारा संचालित शृंखलाएं खूब फल-फूल रही होंगी।      

आज का दौर और हमारी सेहत

आज का दौर और हमारी सेहत 
भारत की और हरियाणा के स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे में भी व्यापक स्तर की पुर्नगठन की प्रक्रियाएं जारी हैं और पिछले दशक से और तेजी पकड़ रही हैं।बड़े पैमाने पर प्राईवेट मैडीकल सैक्टर का फैलाव ए स्वास्थ्य सेवाओं में प्राईवेट इंशोरैंस कम्पनियों की दखलन्दाजी ए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में मैडीकल सर्विसिज के लिए पेमैंट सिस्टम की शुरुआत पिछले दशकों में हुई तीन मुख्य तबदीलियां हैं। मैडीकल एजुकेशन का बड़े पैमाने पर व्यापारिकरण साफ नजर आने लगा है जब कई राज्यों में प्राईवेट मैडीकल कालेजों में एम बी बी एस कोर्स की फीस दो करोड़ रुपये कर दी गई है। हरियाणा के बुढ़ेड़ा मैडीकल कालेज में भी एक करोड़ की फीस बताई जा रही है। जिस तेजी के साथ ये बदलाव आ रहे हैं इससे एक संशय की बड़ी जगह संवेदनशील दिमागों में बनती है। हो सकता है कि यदि हम उस रफतार से चले तो आने वाले कुछ वर्षों में हम स्वास्थ्य क्षेत्र में अमरीकी मॉडल जो कि बहुत मंहगा हैए मुनाफे से संचालित हैए तकनीकयटैक्नोलोजीद्ध इंटैंसिव हैए अन्यायपूर्ण व ना बराबरी पर टिका हुआ हैए को भारत वर्ष में प्रस्थापित कर देंगे।पूरी पूरी सम्भावना है कि बहुत जल्द ही हमारा स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जायेगा। हम में से काफी लोग यह भी महसूस करते हैं कि इससे उपजा असंतोष जन मंचों के माध्यम से अभिव्यक्ति पा रहा है और आने वाले समय में और तीखे स्वरों में उठाया जायेगा। इसमें एक हैरानी की बात यह है कि सरकारें तथा उनकी एजैंसीज भी इस कोरस में शामिल हो रही हैं। 
   गुड गर्वनैस के सिद्धान्त पर चलते हुए स्वास्थ्य सेवाओं की दोहरी व्यवस्था . एक अमीरों के लिए और एक गरीबों के लिए. के नियम को आगे बढ़ाया जा रहा है ताकि समता के मसले को आसानी से टैक्ल किया जा सके बिना उस प्रक्रिसा के साथ छेड़खानी किये बगैर जिसके चलते विनिवेश की प्रक्रिया चालू रही रहे। समाज के एक छोटे से अमीर और सर्विस के हिस्से के लिए अर्न्तराष्ट ªीय स्तर की उच्च तकनीक आधारित स्वास्थ्य सेवाओं का विकास जा रहा है और उसके माध्यम से फोरन एक्सचेंज कमाने का तर्क भी दिया जा रहा है। इसको हैल्थ टूरिज्म का नाम दिया गया है। गरीब लोगों के लिए सरकार विश्व बैंक की 1993 की रिपोर्ट पर आधारित सुझााव के हिसाब से ष्ष्मुफतष्ष् ष्ष् मिनिमम क्लीनिकल पैकेजष्ष् देगी।
     मूलभूत सवाल यह उठता है कि गरीब लोगों की जो बीमारियों का परोफाइल क्या उसका जो ष्ष् मिनिमम एसैन्सियल क्लीनिकल पैकेज ष्ष् सुझाया जा रहा है ए उसके साथ कोई तारतम्य भी हैघ् इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि इस पैकेज से हम गरीबों की बीमारियों का इलाज सम्भव नहीं है। इसके साथ ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में लागू किये जा रहे यूजर चार्जिज के चलते समाज के इस हिस्से के लिए अपनी स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान के लिए कोई जगह शायद ही बच पायेगी। इसी कारण से गरीबों के हिस्सों में भी एक ऐसा रुझान देखने को मिलता है कि वे यदि सम्भव हो तो या कुछ बेचकर जुगाड़ करके प्राईवेट सैक्टर में अपना इलाज करवाते हैं। ऐसा वे तभी करते हैं जब उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता। बीमारी काफी गम्भीर होती है या इलाज काफी महंगा होता है तो वे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की शरण में आने को मजबूर होते हैं या प्राईवेट डाक्टर के पास लुट पिट कर सरकारी अस्पतालों में पहुंचते हे। इस आबजरवेशन की विडम्बना यह है कि लोगों और खासकर गरीब लोगों द्वारा अपने स्वास्थ्य पर किये जा रहे खर्च को उनकी इलाज के लिए ष्ष्रजामन्दीष्ष् रुपी ब्यान के रुप में पेश किया जाता है। जबकि सच्चाई यही है कि दूसरे विकल्पों के अभाव में ऐसा किया जाता है न कि एक च्वाइस के रुप में। उन सर्वेक्षणों को जो इलाज पर परिवार द्वारा किये गये खर्चों के संदर्भ में किये गये हैं दो क्रिटिकल फैक्टरज के संदर्भ में देखे जाने की जरुरत है। एक तो यही कि उस पैसे की उगाही किस तरह और किन हालात में की गई और दूसरा यह कि इस खर्चे का परिवार पर कुल मिलाकर क्या आर्थिक असर पड़ा। जहां इस प्रकार की स्टडीज में स्वास्थ्य पर हुए खर्च को तो उजागर किया जाता है मगर इस खर्च के कारण जो कर्ज में डूबने की बात है उस पर चुप्पी साध ली जाती है। यह बात गरीब लोगों के हितों के खिलाफ जाती है। मजबूरी में जमीन बेचते हैं लोग । इस प्रकार की स्टडीज ने सर्विस के लिए पैसे वसूलने के सिद्धान्त को आधार दिया तथा पब्लिक अस्पतालों में भी ष्ष् यूजर चार्जिजष्ष् की शुरुआत हुई। यहां भी उदघोषित उद्येश्य बताया गया कि इन ष्ष् यूजर चार्जिज ष्ष् को गरीब लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा मगर असलियत यह है कि समाज का वह हिस्सा जो थोड़ा बहुत खर्च करने की क्षमता रखता है उसे भी ष्ष्प्राईवेट हैल्थ सिस्टमष्ष् की धकेल दिया गया है . साफ है कि यदि उसे पैसा खर्च करना है तो वह सैकेंड बैस्ट की च्वाइस क्यों करेगा घ् और प्राईवेट अस्पतालों को राज्य सरकारों ने सरकारी कर्मचारियों के लिए एमपैनलमैंट पर रख कर और प्रोत्साहन दिया है। इन अस्पतालों में करीब 60 प्रतिशत मरीज सरकारी कर्मचारी होते हैं जिनका इलाज का खर्च सरकार वहन करती हैं। दूसरी तरफ पब्लिक सैक्टर के अस्पतालों में ष्यूजर चार्जिज ष् लागू होने के बावजूद वहां की गिरती हुई स्वास्थ्य सेवाओं के क्या कारण हैंघ् पंजाब में सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या काफी कम हुई है। इतना ही नहीं वर्तमान हालात में गरीब लोगों पर दोहरी मार पड़ रही हैए जब वे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का इस्ते माल करते हैं तो एक तो पैसा देना पड़ता है अप्रत्यक्ष करों के रुप में और दूसरे सीधे टैक्स ष्ष् यूजर चार्जिजष्ष् के रुप में भी पैसा देना पड़ता है। प्राईवेट सैक्टर में कम्पीटीसन के नाम पर कम कीमत में स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने का तर्क दिया जाता है। मगर असली सच्चाई यही है कि जब बाजार व्यवस्था का एक मात्र लक्ष्य किसी भी कीमत पर अपना मुनाफा बढ़ाना हो तो प्राईवेट सैक्टर किसी भी कीमत पर किसी भी किस्म का कम्पीटीसन बर्दाश्त नहीं करता। सुधारीकरण के नाम पर सैकण्डरी और टरसरी स्तर की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को एक एक करके पी पी पी मॉडल के तहत प्राईवेट हाथों में देने के काम को एक तरह से प्राईवेटाइजेशन के सामने खड़े अवरोध को दूर करने की परिणीति के रुप में ही देखा जाना चाहिये। यहां तक भी तैयारी है कि सरकार अपनी भूमिका बदल ले। अब तक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में सरकार की भूमिका  सर्विस प्रोवाइडर की रही है। मगर अ बवह फाइनैंसर की भूमिका में आ रही है जो कि गरीबों के लिए प्राईवेट हैल्थ प्रोवाइडर से सेवाएं खरीद कर गरीबों को दिलवा सके। और यह बात प्राईवेट सैक्टर की स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वालों में कम्पीटीसन करवाकर गरीबों को क्वालिटी स्वास्थ्य सेवाएं हासिल करवाने का सरकार बहुत ही कारगर तरीका मान रही है। यह एक तरह से पहले से ही बड़े पैमाने पर सबसिडाइज्ड प्राईवेट हैल्थ सैक्टर को और अधिक सबसिडी देने का ही एक तरीका है। 
    आज हम इतिहास के उस मुकामपर हैं जहां भारतवर्ष ने उननिवेषवाद से मुक्ति पाये आजादी के 69 साल के करीब हो गये हैं।हम आज पतिहास के उस मुकाम पर भी हैं जहां भारतवर्ष ने सहर्ष रुप में ढांचागत समायोजन कार्यक्रम स्वीकार करके नवउपेनिवेषवाद की नई गुलामी को एक बार फिर स्वीकार कर लिया है। इस 69 संस की आजादी के दौरान गरीब लोगों की एक ऐसी भी पीढी पैदा हुई जो अपने पूरे जीवन काल में ता उम्र दो जून की रोटी की लक्जरी के बगैर ही मर गई। दूसरी तरफ उन्होंने यह भी देखा कि उनके खून पसीने की कमाई से हुए विकास के फलों को समाज के एक छोटे हिस्से के कम्फरट और एन्ज्वायमैंट  के लिए सुरक्षित करके रख लिया गया. यह तबका है उच्च वर्ग और स्वर्ण जाति का। यह महज एक दुर्घटना की बात नहीं है कि हमारे समाज का यही हिस्सा जिसने हमारी आजादी के सबसे ज्यादा सुख भोगे आज हमारे देश की संप्रभुता और भविष्य को गिरवी रख कर अपने लिए अर्न्तराष्ट ªीय स्तर के शासक वर्गों में अपना स्थान ढंूढ़ रहा है। इस बात को समझना बहुत जरुरी है। 
 70 साल के लगभग का समय कम नहीं होता  जिसमें हमें हमारे शासक वर्ग की नीतियों के बारे मेंए उनके इरादों के बारे मेंए लोगों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को लेकर अन्दाजा न हुआ हो। पाले बन्दी साफ होती जा रही है। यह महज एक चांस की बात नहीं है बल्कि च्वाइस की बात है कि हमारे देश में लाखों लोग लम्बी भूख के दौर से गुजर रहे हैं जबकि गोदामों में अनाज पड़ा पड़ा सड़ रहा है। यह महज चांस नहीं मगर च्वाइस है जिसने ट ªांसनेशनल पूंजी की डिक्टेटर सिप के लिए जमीन तैयार की है। हमारी राजसता से पार्लियामैंट को निष्क्रिय करवाने के इस पूंजी के गम्भीर प्रयास हो रहे हैं। उदाहरण के लिए यह महज चांस की बात नहीं है बल्कि च्वाइस का मसला है कि पिछले 69 साल में ष्ष् प्राइवेट मैडीकल सैंटरष्ष् का किस तरह से विकास हुआ। हम इस बात का क्या जवाब दे सकते हैं कि 80 के आरम्भ के दशक में जो प्राइवेट हैल्थ सैक्टर 20 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहा था वही अब 80 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहा है। इस प्राइवेट हैल्थ सैक्टर में काम करने वाले डाक्टर कहां से आते हैंघ् क्या ये डाक्टर हमारे शिक्षा व स्वास्थ्य शिक्षा के उत्पाद नहीं हैं जो बउ़े पैमाने पर गरीबों की मेहनत की कमाई में से सबसिडाइज्ड की जा रही हैघ् गरीबों की यह कमाई इनडायरेक्ट टैक्सिज के द्वारा सरकार के पास पहंुचती है। हमें क्यों नहीं झटका लगता है जब हम हिपोक्रेटिक औथ के बावजूद मैडीकल समुदाय के अन्दर जातिवाद और साम्प्रदायिकता बडे़ पैमाने पर महसूस करते हैंघ् क्या यह मैडीकल समुदाय की उसकी जाति व वर्ग की लोकेशन के कारण नहीं हैघ् क्या हमारी नीति में दोगलापन नहीं था या हैघ् हमने आजादी के बाद लाइसैंसियेट डाक्टर जो कि हमारी बड़ी जनता की जरुरत थाए की पढ़ाई जारी रखने की बजाय अर्न्तराष्ट ªीय दर्जे का डाक्टर बनाने की पढ़ाई पर जोर दिया जो पहले दुनिया के देशों में ब्रेन र्डेन के रुप में हमसे चला गया और आज देश में ही प्राइवेट सैक्टर में ब्रेन ड्रेन हो रहा हैं। हमारे हांव तक हम इस डाक्टर को जाने के लिए अभी तक प्रोत्साहित नहीं कर पाये। कभी सोचा है हम कैसा डाक्टर वपैदा कर रहे हैंघ् ऐसा आखिर क्यों किया गयाघ्
    आज जब हम एक तरफ तो अर्न्तराष्ट ªीय स्तर के ट ªेन्ड डाक्टरों की बहुतायत हमारे पास हैतो क्या हम उन तथकथित सब स्टैंडर्ड लाइसैंसियेट डाक्टरों की गरीबों के इलाज के लिए बात कर सकते हैंघ् जब हमने हमारी रनता के हिसाब से सफिसियैंट संख्या डाक्टरों की तैयार कर ली है तो हम रोजाना डाक्टरों की कमी का बहाना करके रोजाना और मैडीकल किस लिए  खोले जा रहे हैंघ् विश्व बैंक 1993 जिसने हमारे देश के स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे को दिशा निर्देश दिये वह सरप्लस डाक्टरों के बारे चुप्पी क्यों साधे हुए हैघ् दूसरी तरफ सच्चाई यह है कि कई पश्चिमी देशों में भारत के डाक्टर बड़ी संख्या में मौजूद हैं । हमारे देश की राष्ट ªीय स्वास्थ्य नीति इस पर चुप क्यों हैघ्उपनिवेशवाद की लिगेसी इसका जवाब नहीं हो सकती क्योंकि इसको पलटने के लिए हमारे पास 69 साल का समय रहा है। महज इतना भर कह देना काफी नहीं है कि ष्पब्लिक हैल्थ केयर सिस्टम ष् पर हमला बोला जा रहा है या इसे डिसमैंटल किया जा रहा है। बल्कि इसे परिभाषित करना बहुत आवश्यक  हो गया है। असल में किस चीज पर हमला किया जा रहा है और क्या डिसमैंटल किया जा रहा है इसे व्याख्यायित किया जाना बहुत जरुरी हो गया है। साथ ही यह भी देखना है कि किस तरह से यह सब गरीब लोगों के स्वास्थ्य को प्रभवित करेगा हालांकि गरीब लोग इन सब प्रक्रियाओं को एक इनडिफरैंसए क्रोध और बेचैनी के साथ देख रहे हैं। जब टूटी फूटी बिखरी उपस्वास्थ्य केन्द्रों की इमारतों से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की इमारतों तकय स्वास्थ्य क्षेत्र के उपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार के चलतेए गरीब विरोधीए जातिगतएलिंगभेद वाला मैडीकल प्रोफैसन और खासकर डाक्टर बतौर टीम लीडर के व्यवहार के कारणए दवाओं की कमी के कारणय उपकरणों की कमीएउपकरण हैं भी तो उनके इस्तेमाल करने वाले विषेशज्ञों की कमीए पी एच सी ष्सी एच सी और जिला अस्पतालों में ढीली स्वास्थ्य सेवाओं के चलतेए गरीब विरोधी और महिला विरोधी जनसंख्या नियन्त्रण विभाग के हमलों के चलते. गरीब लोग जमीना स्तर पर मौजूद स्वास्थ्य सेवाओं के भ्रष्टीकरण के गरीब चश्मदीद गवाह हैं और उनपर इस बात का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ने वाला जब उनको बताया जाता है कि यह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा खत्म किया जा रहा है क्योंकि उसके लिए तो एक तरह से यह पहले से ही बन्द हो चुका है। आगे क्या आने वाला है इस बात पर उन लोगों के बीच में भी जो इस स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे के बारे में गम्भीरता से सोचते हैं एक चुप सहमति सी लगती है। और इस बात पर भी चुप सहमति लगती है कि अब इन बााजार की ताकतों को आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता है। किसी भी व्यक्ति द्वारा उसके व्यक्गित विश्व दृृष्टिकोन के हिसाब से सरकार की राष्ट ªीय स्वास्थ्य नीति में बदलाव के लिए जो सोचा जाता है वह कुछ इस प्रकार कि विश्व बैंक और ट ªांसनेशनल पूंजी ने जो ढांचा और जगह देशों की सरकारों के माध्यम से बनाया है उसी में गरीब मरीजों की जगह कैसे बनाई जाए और साथ ही इस ढांचे को कोई चुनौती भी न दी जा सके। असल में मूलभूत ढंग से इन कमजोर तबकों की नजर से देखकर

Health

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11-   bl O;; esa de ls de ,d frgkbZ dsfUnz; ljdkj ls jkT;ksa dks miyC/k gksA gfj;k.kk ljdkj dk izfr O;fDr [kpZ 1786 ds yxHkx gSA ,d e/; lhek ds rgr LokLF; ds mij fd;s tkus okys leLr lkoZtfud O;; dks ldy ?kjsyw mRikn ds 5 izfr’kr rd c<+k;k tk,A
12-   izR;sd ftys esa LokLF; lsokvksa dh miyC/krk ,oa xq.kork lqfuf’pr dh tk,&leLr LokLF; lqfo/kkvksa esa lsokvksa dh xq.kork lqfuf’pr dh tk, ftlds rgr LokLF; lsokvksa dks IkzHkkoh ] lqjf{kr ] xSj ‘kks”k.kh; cuk;sa rFkk yksxksa dks lEekuiwoZd lsok;sa miyC/k gksaA ejhtksa ds vf/kdkjksa dk vknj gks ,oa ejhtksa dh vkjke rFkk larqf”V ij /;ku fn;k tkrk gksA xq.kork dk ekud dsoy HkkSfrd ;k fpfdRldh; lajpuk ij vk/kkfjr u gks tks fd izk;% cM+s dkiksZjsV vLirkyksa ;k eSMhdy VwfjTe ds yksx dks c<+kok nsrs gSa rFkk ;g de [kpZ esa lgh ,oa izHkkoh lsokvksa ds iznk; dks c<+kok ugha nsrk gSA leLr ljdkjh LokLF; laLFkku vius Lrj ij xkjUVh dh xbZ lHkh LokLF; lsokvksa dks iznku djus gsrw ck/; gksaA
13-   leLr yksd LokLF; lqfo/kkvksa dks fdlh Hkh izdkj ds miHkksXrk ‘kqYd ls eqDr fd;k tk, rFkk lsok,a ‘kklu }kjk lapkfyr lqfo/kkvksa ds ek/;e ls miyC/k djkbZ tk,a u fd futh lkoZtfud lg;ksx ¼ihihih½O;oLFkk lsA
14-   LokLF; lsokvksa dk futhdj.k can gks& ldzh; futhdj.k ds rjhds ( tSls lkoZtfud lalk/ku ;k iwath dks futh laLFkkuksa dks okf.kfT;d rkSj ij gLrkUrj.k djuk ]iw.kZ #i ls can djus gsrq vko’;d dne mBk;s tk,aA fuf”dz; #i ls gks jgs futhdj.k dks jksdus ds fy, yksd lqfo/kkvksa esa fuos’k c<+k;k tk,A
15-   lkoZtfud LokLF; laLFkkuksa ls iznr lsok,a dsoy iztuu LokLF;] Vhdkdj.k ,oa vU; pqfuUnk chekfj;ksa ds fu;U=.k ij lhfer u gksdj lesfdr LokLF; lsokvksa ij vk/kkfjr gksaA
16-   LokLF; dk;Zny dk csgrj izf’k{k.k gks% LokLF; lsokvksa esa dk;Zjr lHkh deZpkfj;ksa dh csgrjhu f’k{kk ,oa izf’k{k.k ds fy, lkoZtfud fuos’k dks c<+k;k tk,A
17-   ljdkj }kjk pykbZ tk jgh lHkh f’k{k.k laLFkkuksa }kjk mu t#jr ean bykdksa ls fpfdRldksa] ulksaZ rFkk LokLF; deZpkfj;ksa dks vko’;d la[;k esa p;fur dj f’k{kk@izf’k{k.k fn;k tk jgk gS ;g lqfuf’pr fd;k tk,A
18-   izf’k{k.k uhfr esa cnyko yk;k tk, ftlls fd LokLF; dk;Zny }kjk LFkkuh; vko’;drkvksa dks iwjk djus gsrw leLr t#jh n{krk,a nh tk ldsaA
19-   fpfdRlk rFkk lacfU/kr {ks= ds mPp f’k{kk O;oLFkk ds okf.kfT;dj.k can gksa rFkk futh f’k{k.k laLFkkvksa ds O;ofLFkr fu;U=.k gsrw izHkkoh ,oa ikjn’khZ rU= ykxw fd;k tk,A
20-   LokLF; iz.kkyh esa leLr lsokvksa ds fy, vko’;d lHkh in ,oa LFkku iz;kZIr #i ls l`ftr fd;s tk,a ,oa bu inksa dks le; le; ij Hkjk tk;sA Bsds ij fu;qDr deZpkfj;ksa dks fu;fer fd;k tk, rFkk vk’kkvksa ] cgqm|s’kh; dk;ZdrkZvksa rFkk vU; LokLF; deZpkfj;ksa dk Ikz;kIr #i ls {kerk fuekZ.k fd;k tk, ,oa mUgsa vius dk;Z ds fy, lgh ekuns; fn;k tk, o mi;qDr dk;Z djus dk ekgkSy iznku fd;k tk,A
21-   deZpkfj;ksa ds LokLF; ,oa lqj{kk ij /;ku fn;k tk, rFkk efgyk deZpkfj;ksa ds fy, fo’ks”k O;oLFkk cukbZ tk,A
22-   gj Lrj ds fy, ,sls LokLF; dSMj dk xBu gks ftlesa Ikz;kIr la[;k esa fpfdRld] ulsaZ rFkk LokLF;dfZeZ;ksa dk ny lfEefyr gks ftldks izkFkfed LokLF; lsok ds {ks= esa] yksd LokLF; ds lEcU/k esa ,oa ,d ny ds #i esa csgrj dk;Z djus esa izf’k{k.k izkIr gksA
23-   LkHkh vko’;d nokvksa dk ,oa tkap lqfo/kkvksa dh eqQ~r ,oa xq.korkiw.kZ miyC/krk rkfeyukMq] dsjy ,oa jktLFkku jkT; ds ekWMy vuqlkj lqfuf’pr gksA
24-   Lok;r] ikjn’khZ ,oa vko’;drk vk/kkfjr nok ,oa vU; lkefxz;ksa ds fy, [kjhn ,oa forj.k iz.kkyh xfBr ,oa ykxw gksA
25-   leLr LokLF; lqfo/kkvksa esa tsusfjd nokvksa ds fizfLdzI’ku ,oa mi;ksx dks vfuok;Z djkj fn;k tk;sA
26-   izR;sd Lrj ij Lkkeqnkf;d lgHkkfxrk] lgHkkxh ;kstuk fuekZ.k ,oa leqnk; vk/kkfjr fuxjkuh dks c<+kok fn;k tk;sA LokLF; lsok;sa turk ds izfr tokcnsg gksaA blds fy, leqnk; vk/kkfjr fuxjkuh ,oa ;kstuk fuekZ.k izfdz;k dks leLr yksd LokLF; dk;Zdzeksa ,oa lsokvksa dk vfuok;Z fgLlk cuk;k tk;s ftlls fd lsok iznku esa mrjnkf;Ro ,oa ikjnf’kZrk c
27-   f’kdk;r fuokj.k dh izfdz;kvksa dks lqpk# #i ls pykus ds fy, laLFkkxr O;oLFkk;sa cukbZ tk;sa ftlds fy, iz;kIr /ku jkf’k ds lkFk lkFk vko’;d izca/ku Lok;rrk Hkh izkIr gksA
28-   futh vLirkyksa }kjk fd;s tkus okys ‘kks”k.k dks lekIr fd;k tk;sA
29-   jk”Vªh; fDyfudy ,LVsfCy’eSaV ,DV ds varZxr ejhtksa ds vf/kdkj gj laLFkkvksa esa lqjf{kr gksa A fofHkUu lsokvksa ds nke fu;af=r gksaA fizfLdzI’ku] tkap rFkk jsQjy ds ihNs pyus okyh ?kwl[kksjh dks can fd;k tk,] ,oa blds fy, ‘kklu }kjk Ik;Zosf{kr ysfdu Lora= f’kdk;r fuokj.k O;oLFkk ykxw dh tk;sA ekud fueZk.k dk izdkj ,slk gks ftlesa dkjiksjsV fgr dk c<+kok u gks ldsA bu reke O;oLFkkvksa ij ;g Hkh fo’ks”k /;ku gks fd uSfrd ,oa xSj okf.kfT;d lsok iznku djus okys futh iznkrkvksa dks laiew.kZ ifjj{kk fey jgk gSA
30-   leLr lkoZtfud chek ;kstukvksa dks le; lhek ds vUrZxr yksd lsok O;oLFkk esa foyhu fd;k tk;s% vkj ,l ch okbZ tSls RkFkk vU; jkT; lapkfyr chek,a dj&vk/kkfjr lkoZtfud forh; O;OLFkk ls iksf”kr yksd LokLF; lsok O;oLFkk esa le; lhek ds varZxr foyhu gks A bu chek ;kstukvksa ds varZxr izkIr lHkh lsok;sa yksd LokLF; iz.kkyh esa Hkh lfEefyr gksa ,oa blds fy, Ik;kZIr lalk/ku miyC/k gksaA laxfBr ,oa vlaxfBr {ks= ds etnwjksa dks yksd LokLF; iz.kkyh esa iw.kZ #i ls ‘kkfey fd;k tk;s ftlls fd muds fy, lesfdr LokLF; lsok miyC/k gksA
31-   eq[;ea=h eq¶r bykt ^;kstuk*] tuuh lqj{kk ;kstuk vkfn lHkh LokLF; ;kstukvksa dks Bhd izdkj ls ykxw fd;k tk,A blds fy, ftyk Lrj ij lkekftd laLFkkvksa o tu laxBuksa ds dk;ZdrkZvksa dh ,d ekWfuVfjax desVh cukbZ tk, ftldh flQkfj'kksa ij lEcaf/kr foHkkx mfpr dk;Zokgh rqjUr djsA
32-   bafM;u isVSaV ,DV ds varZxr yksd LokLF; lqj{kk ds fy, dh xbZ O;OkLFkkvksa dk nokbZ;ksa dh miyC/krk c<+kus ds fy, mi;ksx gks RkFkk T;knkrj nokbZ;ksa ,oa midj.kksa ds ns’kh fuekZ.k dks c
33-   tSo fpfdLrdh; ‘kks/k rFkk fDyfudy Vªk;yksa dh l’kDr fofu;ked O;oLFkk gks% fDyfudy Vªk;yksa ds uSfrd lapkyu gsrq Li”V #ijs[kk rS;kj ,oa ykxw gks ftlls leLr fgrxzkfg;ksa ds l’kDr fofu;e ds fy, O;oLFkk;sa caf/kr gksa pkgs os forh; iznkrk gaks ] ‘kks/k laLFkk,a gksa ;k uSfrd lfefr;ka gksaA lh-Mh-,l-lh-vks- rFkk vkbZ-lh- ,e- vkj- }kjk leLr fDyfudy Vªk;yksa dh RkFkk Vªk;y LFkkuksa dh l’kDr fuxjkuh dh tk;s rFkk Vªk;y laLFkkuksa ds vkaoVu ds nkSjku ogka ij vko’;d lHkh vkikrdkyhu fLFkfr ds fuiVkjs gsrq O;oLFkk;sa lqfuf’pr gksa A fDyfudy Vªk;yksa esa Hkkx ysus okys izfrHkkfx;ksa dks Ikz;kIr {kfriw.kZ jkf’k miyC/k djkus gsrw ,oa mudks gks ldus okys leLr cqjs izHkko fuiVkjs ds fy, Ikz;kIr O;oLFkk ds lkFk funsZ’k fodflr vkSj ykxw gksaA fDyfudy Vªk;y izfrHkkfx;ksa ds fy, muds vf/kdkj i= fodflr fd;s tk;sa ftldh dkuwuh #i esa Hkh oS/krk gksA
34-   LkHkh ekufld #i ls ihfM+r ejhtksa dks LokLF; lsok,a ,oa j{kk lqfuf’pr dh tk;sa% ftyk Lrjh; ekufld LokLF; dk;Zdze dks jk”Vªh; LokLF; fe’ku ds varZxr ‘kkfey fd;k tk;sA jk”Vªh; ekufld LokLF; uhfr ij vey gks rFkk ekufld LokLF; dkuwu ikl fd;k tk;sA
35-   dhVuk'kd nokvksa ds vU/kk/kqU/k bLrseky ds pyrs gj {ks=] ekuoh;] i'kq o [ksrh esa blds nq"ifj.kke lkeus vk jgs gSaA nqHkkZX;iw.kZ ckr ;g gS fd ekuoh; Lrj ij bu dhVuk'kdksa dh ek=k irk yxkus ds VSLVksa dh lqfo/kk bl izns'k ds bdykSrs ihthvkbZ,e,l esa Hkh ugha gSA dbZ rjg dh chekfj;ka blds pyrs c<+ jgh gSa ;k iSnk gks jgh gSaA ;g lqfo/kk rRdky eqgS;k djokbZ tk,A
36-   lkeqnkf;d LokLF; dsUnzksa ij & ,d ltZu] ,d fQftfl;u] ,d f'k'kq jksx fo'ks"kK o ,d efgyk jksx fo'ks"kK ds izko/kku ds ekud dsUnzh; LokLF; foHkkx }kjk r; fd;s x, gSaA blds lkFk ;fn ejht csgks'kh dk fo'ks"kK ugha gS rks ltZu vkSj xk;udkWyksftLV rks viax gks tkrs gSaA blfy, bu ikapksa fo'ks"kKksa dh fu;qfDr;ka izR;sd lkeqnkf;d LokLF; dsUnzksa eas dh tk,A
37-   jk”Vªh; [kk| lqj{kk vf/kfu;e 2013 ds rgr *nky jksVh ;kstuk^ dks lgh
38-   dqiks"k.k uS’kuy QSfeyh gSYFk losZ rhu ds vuqlkj gfj;k.kk esa c<+k gSA blds fy, dkjxj dne mBk;s tk;saA blh izdkj xHkZorh efgykvksa esa uS’kuy QSfeyh gSYFk losZ rhu ds vuqlkj uS’kuy QSfeyh gSYFk losZ nks ds eqdkcys 10 izfr'kr [kwu dh deh c<+h gSA blds lkFk&lkFk yM+fd;ksa esa fd;s x;s ljdkjh losZ esa Hkh [kwu dh deh dk izfr'kr dkQh ik;k x;k gSA mfpr dne mBk;s tkus dh t:jr gSA
39-   ih ,u Mh Vh ,DV ds rgr mfpr dk;Zokgh dh tk,aA
tu LokLF; vfHk;ku gfj;k.kk
lEidZ %  9812139001 

समाज और स्वास्थ्य


समाज और स्वास्थ्य
डाॅ. रणबीर सिंह दहिया
हमारे संसार के पूरे इतिहास में सभी की सभी सभ्यताएं बीमारी और रुगण्ता के खतरों के साथ पली हैं। हम देख और जान सकते हैं कि प्रत्येक सभ्यता ने इस हकीकत से निपटने के समयानुसार अपने अपने तरीके ईजाद किये, मगर रोग मुक्त जीवन का सपना तो पिछली दो सदियों से ही देखा जाने लगा है। आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के विकास से हमें बीमारी की प्रक्रिया में सक्रिय हस्तक्षेप के औजार मिले किन्तु आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के शुरूआती पुलाव के बाद चिन्ताएं भी पैदा हुई हैं। पिछले सालों में भारत की स्वास्थ्य सम्बंधी स्थिति में कई अहम बदलाव आये हैं। पिछले दशकों में दवाइयों और कीटनाशकों के विरूद्ध प्रतिरोध की समस्या उभरी है और संक्रामक व परजीवी जनित बीमारियों ने फिर से सिर उठाया है। जैनेटिक खोजों के कारण उपजी बीमारियों का दायरा बढ़ा है और एडस का नया खतरा तो मुँह बाये खड़ा ही है। इस सबसे लड़ने के लिए जिस तरह के बदलाव की जरूरतें हैं वह नहीं हो पा रही हैं।
इसको ठीक करने के वास्ते दरकार तो समाज के ढांचे में बदलाव की थी मगर जो असल में हुआ वह है ढांचागत समायोजन। हमारे देश भारत में सन 1991 में ढांचागत समायोजन कार्यक्रम को अपनाया गया। हमें यही कहा गया कि हमारी ‘कमजोर’ अर्थव्यवस्था में यह एक जान फूंकने का प्रयास है। ‘विश्व बैंक’ और ‘मुद्रा कोष’ द्वारा थोंपी गई शर्तों के अधीन देश की आर्थिक नीति में व्यापक बदलाव किये गये हैं और किये जा रहे हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में जरूरी दवाओं सम्बन्धी नियंत्रण खत्म किये गये, सरकारी अस्पतालों में सेवा शुल्क वसूली लागू करने के प्रयास किये गये, स्वास्थ्य पर होने वाले सरकारी खर्च में कटौती जारी है, इसके साथ-साथ निजीकरण को बढ़ावा बेइन्तहा दिया जा रहा है।कार्पोरेट के माध्यम से स्वास्थय बीमा योजना के माध्यम से मुफ्त इलाज योजना के बारे सोचा जा रहा है ।
’सन 2000 तक सबक के लिए स्वास्थ्य’ का नारा जिस जोशो-खरोश से उछाला गया था, कुछ दिन उसे फुस फुसाया गया और अब तो बहुत से लोग नाम लेना भी भूल गये । इसके एवज में अब ‘चुनिंदा’ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को ही एकमात्र विकल्प बताकर पेश किया जा रहा है। ऐसी हालत में यह और भी जरूरी हो गया है कि स्वास्थ्य सम्बन्धी बहस को एक बार फिर से नये सिरे से छेड़ा जाए और इसकी समीक्षा की जाए। अन्यायपूर्ण नीतियों को रोकना और संसाधनों व सता के असमान वितरण के प्रयासों का विरोध लोगों की संगठित ताकत से ही संभव है। लोगों का स्वास्थ्य एक अहम मुद्या होते हुए भी उनका सामुहिक मुद्या नहीं बन सका है।
स्वास्थ्य सभी नागरिकों के लिए एक मौलिक एवं सार्वभौमिक अधिकार है। इस अधिकार के साथ साथ सवास्थ्य के उन निर्णायक मुद्यों व अन्र्तखण्डीय कारकों जैसे अच्छा भोजन, सुरक्षित साफ पीने योग्य पानी, बेहतर सफाई सुरक्षा व्यवस्था, बेहतर रहन सहन व खान पान, रोजगार, प्रदूशण रहित वातावरण व खाद्य पदार्थ, लिंग जाति व वर्ग आधारित असमानता का निवारण, सभी के लिए स्तरीय व गुणवतापूर्ण षिक्षा, सामाजिक न्याय तथा वर्तमान बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की सभी के लिए उपलब्धता आदि की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। महज थी्र डी-डाक्टर,डिजीज और डरग्ज- के पैमाने से स्वास्थ्य के मुद्ये को नहीं देखा जाना चाहिये और न ही इसे बाजार व्यवस्था में मुनाफे के रुप में देखा जाना चाहिये। तुरन्त लाभ हानि की नजर से नीति निर्घारकों को भी नहीं देखना चाहिये। दुर्भाग्य है हमारा कि हम इन संकीर्ण दायरों में ही स्वास्थ्य के मुद्ये को देख रहे हैं।
समेकित स्वास्थ्य रक्षा सेवाएं भी स्वास्थ्य के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा हंै। इस अधिकार को पूर्ण करने के लिए हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर संसाधनों से युक्त करने की , उसे विस्तारित करने की तथा उसे जवाब देह बनाने की आवष्यकता है जिससे देश की समस्त जनता को मुफत , समेकित, उच्च गुणवता पूर्ण तथा आसानी से उपलब्ध स्वास्थ्य रक्षा सेवाएं प्रदान की जा सकें।
सरकारी ढांचे में स्वास्थ्य सेवाओं में जरुरत के हिसाब से 76 प्रतिशत डाक्टरों और 53 प्रतिशत नर्सों की कमी है।;आर एच एसद्ध इसके साथ ही प्रयोगषालाओं मेंतकनीषियनों की 80 प्रतिषत और एक्सरे कर्मीयों की 85 प्रतिशत कमी है। यह राष्ट्रीय आंकडे़ हैं। हरियाणा के आंकड़े भी ज्यादा भिन्न नहीं हैं।-टेबल-
सब सैंटरों की संख्या----2010----------------2484
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या---2010--------441
समुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या---2010-------107-111
सब डिस्ट्रिक्ट हाॅस्पीटल की संख्या---2010 ............25
जिला स्तरीय हाॅस्पीटल की संख्या----2010--------21
कुल गांव की संख्या---2010------------------6955
स्वास्थ्य सुविधाएं, मध्यम दर्जे के कार्यकर्ताओं पर टिकी हैं - नर्सें, ए एनएम (दाइयां) और पैरा मैडीकल कर्मचारी (अर्द्ध चिकित्साकर्मी)। ये कार्यकर्ता ही लोगों की सामाजिक आर्थिक समस्याओं के सम्पर्क में आते हैं। परन्तु खुद के स्वास्थ्य क्षेत्र के काम के विश्लेषण में इनकी भागीदारी न के बराबर है। पहली बात तो यह है कि निचले दर्जे में होने के कारण इनसे सिर्फ आदेशों के पालन करने की अपेक्षा की जाती है, निर्णयों में इनकी कोई भागीदारी नहीं होती है। दूसरी बात यह है कि इन्हें यदि निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बना लिया जाए तो इनकी ट्रेनिंग इस तरह की नहीं हुई है कि ये अपने व्यवहारिक अनुभवों से अवधारणा या विचार विकसित कर सकें या अवधारणाओं को व्यवहार में बदल सकें।
जानकारी अपने आप बदलाव नहीं लाती। परन्तु जानकारी बदलाव की एक पूर्ण शर्त जरूर है। ‘समाज और स्वास्थ्य’ के माध्यम से देश में और हरियाणा में ‘समाज और स्वास्थ्य’ के माध्यम से देश में और हरियाणा में ‘जन स्वास्थ्य अभियान’ की यह कोशिश है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में हो रहे विकास के ताजा घटनाक्रम को शामिल करके लोगों तक पहुँचा जाए ताकि वर्तमान की झलक मिल सके और स्वास्थ्य सेवाओं तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में जन पक्षीय आधार को मजबूत किया जा सके।
इस उपलक्ष्य में निम्नलिखित प्रस्ताव रखे जाते हैं जो कि मौजूदा स्वास्थ्य परीस्थिति, जो कि पूर्णरुप से खारीज करने लायक है, को पलट सकें तथा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियां तथा स्वास्थ्य सेवाएं लागू करते हुए सबके लिए स्वास्थ्य का सपना साकार कर सकें।
1- स्वास्थ्य के सामाजिक निर्णायकों पर ध्यान हो- इसके अन्र्तगत स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देना , लोक वितरण प्रणाली को सार्वभौमिक बनाना होगा जिसके तहत स्थानीय खाद्य पदार्थों को बढ़ावा दिया जाए। राष्ट्रीय शिशु स्वास्थ्य एवं पोषण नीति बनाई जाए जिसके अंतर्गत आई सी डी एस का सार्वभौमिकीकरण हो व तीन साल तक के बच्चों को पूर्ण रुप से शामिल करने हेतू सेवाओं तथा कार्यदल में विस्तार हो। समस्त गावों व मोहल्लों में शुद्ध एवं सुरक्षित पेयजल की सार्वभौमिक उपलब्धता हो तथा हर गांव व मोहल्ले में स्वच्छ शोचालयों तक सार्वभौमिक पहुंच हो।
2- स्वास्थ्य सम्बन्धित लैंगिक पहलूओं को सम्बोधित किया जाए -इसके अंर्तगत समस्त महिलाओं तथा समलैंगिक नागरिकों को समेकित , आसानी से उपलब्ध उच्चगुणवतापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच व इसकी उपलब्धता की गाारण्टी दी जाए जो कि केवल मातृत्व सवास्थ्य सेवाओं तक ही सीमित न हो। उन समस्त कानून ,नीतियों तथा आाचरणों को समाप्त किया जाए जो कि महिलाओं के प्रजनन, यौनिक तथा जनतांन्त्रिक अधिकारों का हनन करता है। जो भी विभिन्न प्रजनन प्रोद्योगिकियां जो कि महिलाओं के लिए हानिकारक हो सकती हैं उन्हें नियंत्रित किया जाए । लिंग आाधारित उत्पीड़न को एक लोक स्वास्थ्य समस्या माना जाए तथा इसके तहत शारीरिक एवम मानसिक रुप से पीड़ितों को तमाम आवश्यक स्वास्थ्य जांच, दस्तावेजिकरण, रेफरल का अधिकार दिया जाए तथा समन्वित नैतिक चिकित्सीय कानूनी प्रक्रियाओं के लिए भी उन्हें अधिकृत बनाया जाए । स्वास्थ्य सेवाओं को किषोर किषोरियों के लिए मित्ऱतापूर्ण बनाया जाए तथा इस तबके को भी समेकित, उच्चगुणवता पूर्ण , आासनी से पहुंचने लायक स्वास्थ्य सेवाएं सुनिष्चित हो जो कि उनके विषेश प्रजनन तथा यौनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करती हों।
3- समस्त जाति आधारित भेदभाव तुरंत समाप्त किया जाए- जाति आधारित भेदभावों को, जो कि बुरे स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण सामाजिक कारक है , पूर्णरुप से समाप्त करने हेतू त्वरित एवं प्रभावी कदम उठाये जाएं। मानव द्वारा मैला ढोने वाले समस्त मैनुअल कार्य पूर्ण रुप से प्रतिबन्धित हों। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में इस भेदभाव से पीड़ित तबकों को प्राथमिकता दी जाए । इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं का पुर्नगठन किया जाए।
4- स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार को संवैधानिक बनाया जाए- देश में स्वास्थ्य के अधिकार का कानून लागू किया जाए जो कि समेकित, उच्चगुणवतापूर्ण, आसानी से उपलब्ध सेवाओं को सुनिष्चित करता हो तथा प्राथमिक, द्वितीय एवं तृतीय स्तरीय सेवायें आवष्यकतानुसार सबको उपलब्ध करता हो। सेवा प्रदाता को सेवाओं को उपलब्ध नहीं कराने या मना करने पर ;चाहे गुणवता,पहुंच या खर्च से जुड़े हुए कारणों से भी हो, उसे कानूनी अपराध घोषित किया जाए।
5- स्वास्थ्य के उपर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाया जाए-सकल घरेलू उत्पाद के कम से कम 3-6 प्रतिशत को स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित किया जाए जो कि 2014 की स्थििति में प्रति व्यक्ति 3000 रुपये बनता है।
इस व्यय में कम से कम एक तिहाई केन्द्रिीय सरकार से राज्यों को उपलब्ध हो। हरियाणा सरकार का प्रति व्यक्ति खर्च 1786 है। एक मध्य सीमा के तहत स्वास्थ्य के उपर किये जाने वाले समस्त सार्वजनिक व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 5% तक बढ़ाया जाए।
6- स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं गुणवता सुनिश्चित की जाए-समस्त स्वास्थ्य सुविधाओं में सेवाओं की गुणवता सुनिश्चित की जाए जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी , सुरक्षित , गैर शोषणीय बनाये तथा लोगों को सम्मानपूर्वक सेवायें उपलब्ध हों। मरीजों के अधिकारों का आदर हो एवं मरीजों की आराम तथा संतुष्टि पर ध्यान दिया जाता हो। गुणवता का मानक केवल भौतिक या चिकित्सकीय संरचना पर आधारित न हो जो कि प्रायः बड़े कार्पोरेट अस्पतालों या मैडीकल टूरिज्म को बढ़ावा देते हैं तथा कम खर्च में सही एवं प्रभावी सेवाओं के प्रदाय को बढ़ावा नहीं देता है। समस्त लोक सवास्थ्य संस्थान अपने स्तर पर गारन्टी की गई सभी स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदान करने हेतू बाध्य हों । समस्त लोक स्वास्थ्य सुविधाओं को किसी भी प्रकार के उपभोग्ता शुल्क से मुक्त किया जाए तथा सेवाएं शासन द्वारा संचालित सुविधाओं के माध्यम से उपलब्ध कराया जाए न कि निजी सार्वजनिक सहयोग व्यवस्था से।
7- स्वास्थ्य सेवाओं का सक्रीय एवं निष्क्रिय निजीकरण बंद हो- सक्रीय निजीकरण के तरीके ; जैसे सार्वजनिक संसाधन या पूंजी को निजी संस्थानों को वाणिज्यिक हस्तानन्तरण करना , पूर्ण रुप से बंद करने हेतू आवश्यक कदम उठाया जाए। निष्क्रिय रुप से हो रहे निजीकरण को रोकने के लिए लोक सुविधाओं में निवेश बढ़ाया जाए। सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों से प्रदत सेवाएं केवल प्रजनन स्वास्थ्य,टीकाकरण एवं अन्य चुनिन्दा बीमारियों के नियन्त्रण पर सीमित न होकर समेकित स्वास्थ्य सेवाओं पर आधारित हो।
8- स्वास्थ्य कार्यदल का बेहतर प्रशिक्षण होः स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत सभी कर्मचारियों की बेहतरीन शिक्षा एवं प्रशिक्षण के लिए सार्वजनिक निवेश को बढ़ाया जाए। सरकार द्वारा चलायी जा रही सभी शिक्षण संस्थान द्वारा उन जरुरत मंद इलाकों से चिकित्सकों, नर्सों तथा स्वास्थ्य कर्मचारियों को आवश्यक संख्या में चयनित कर शिक्षा व प्रशिक्षण दिया जा रहा है यह सुनिश्चित किया जाए। प्रशिक्षण नीति में बदलाव लाया जाए जिससे कि स्वास्थ्य कार्यदल द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने हेतू समस्त जरुरी दक्षताएं दी जा सकें। चिकित्सा तथा संबन्धित क्षेत्र के उच्च शिक्षा व्यवस्था के वाणिज्यिकरण बंद हों तथा निजी शिक्षण संस्थाओं के व्यवस्थित नियन्त्रण हेतू प्रभावी एवं पारदर्शी तन्त्र लागू किया जाए।भारतीय चिकित्सा परिषद,भारतीय नर्सिंग परिषद जैसी संस्थाओं विनियामक संस्थाओं को गहन समीक्षा के पश्चात पुनर्गठित किया जाए जिससे कि वर्तमान भ्रष्ट एवं अनैतिक व्यवस्था को समाप्त किया जा सके।
9- बेहतर शासित पर्याप्त लोक स्वास्थ्य कार्यदल होः लोक स्वास्थ्य प्रणाली में समस्त सेवाओं के लिए आवश्यक सभी पद एवं स्थान प्रर्याप्त रुप से सृजित किया जाए एवं इन पदों को समय समय पर भरा जाये। संविदा में नियुक्त कर्मचारियों को नियमित किया जाए तथा आशाओं , बहुउद्येशीय कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोक स्वास्थ्य तऩ्त्र के कर्मचारियों का प्रयाप्त रुप से क्षमतानिर्माण किया जाए एवं उन्हें अपने कार्य के लिए सही मानदेय किया जाए व उपयुक्त काय्र करने का माहौल प्रदान किया जाए। कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा पर ध्यान दिया जाएतािा इस हेतू महिला कर्मचारियों के लिए विशेष व्यवस्था बनाई जाए। उपलब्ध शोध से यह पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्र में डाक्टरों की कमी पेषेवर समस्याओं से ज्यादा प्रशासनिक कमजोरी तथा राजनैतिक पराजय के चलते है, जिसके सुधारने के लिए कार्य किया जाए । हर स्तर के लिए ऐसे लोक स्वास्थ्य कैडर का गठन हो जिसमें प्रयाप्त संख्या में चिकित्सक, नर्सें तथा स्वास्थ्य कर्मियों का दल सम्मिलित हो जिसका जिसको प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में, लोक स्वास्थ्य के सम्बन्ध में एवं एक दल के रुप में बेहतर कार्य करने में प्रशिक्षण प्राप्त हो।
10- सभी आवष्यक दवाओं का एवं जांच सुविधाओं की मुफत एवं गुणवतापूर्ण उपलब्धता सुनिष्चित होः जिस प्रकार तामिलनाडू, केरल एवं राजस्थान राज्य में किया गया है वैसा स्वायत , पारदर्शी एवं आवश्यकता आाधारित दवा एवं अन्य सामग्रियों के खरीदी एवं वितरण प्रणाली गठित एवं लागू हो। लंबित बीमारियो के सभी मरीजों के लिए सभी आवष्यक दवाओं का पूरी अवधि के लिए उपलब्धता सुनिश्चित हो एवं दवा वितरण केन्द्रों को मरीजों के आसान पहुंच के मद्येनजर गठित किया जाये। समस्त स्वास्थ्य सुविधाओं में जेनेरिक दवाओं का प्रिस्क्रिप्सन एवं उपयोग को अनिवार्य करार दिया जाये।
11 - सामुदायिक सहभागिता, सहभागी योजना निर्माण एवं समुदाय आधारित निगरानी को बढ़ावा दिया जायेः स्वास्थ्य सेवायें जनता के प्रति जवाबदेह हों। इसके लिए समुदाय आधारित निगरानी एवं योजना निर्माण प्रक्रिया को समस्त लोक स्वास्थ्य कार्यक्रमों एवं सेवाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जायेजिससे कि सेवा प्रदान में उतरदायित्व एवं पारदर्शिता बढे। शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को सुचारु रुप से चलाने के लिए संस्थागत व्यवस्थायें बनाई जायें जिसके लिए पर्याप्त धन राशि के साथ साथ आवश्यक प्रबंधन स्वायतता भी प्राप्त हो।
12- लोक स्वास्थ्य प्रणाली को भ्र्ष्टाचार मुक्त किया जायेः नियुक्ति, पदोन्नति, स्थानान्तरण, खरीदी तथा अधोरचना विकास के लिए पारदर्शी नीतियां बनाई जायें तथा लागू की जाएं जिस प्रकार तामिलनाडू राज्य ने खरीदी के लिए तािा कर्नाटक राज्य ने स्थानान्तरण के लिए नीतियां बनाइ्र हैं। शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को सुचारु रुप से चलाने के लिए संस्थागत व्यवस्थायें बनाई जायें जिसके लिए प्रयाप्त धनराशि के साथ साथ आवश्यक स्वायत्तता प्राप्त भी हो।
13- निजी अस्पतालों द्वारा किये जाने वाले शोषण को समाप्त किया जायेः राष्ट्रीय क्लिनिकल एस्टेब्लिष्मैंट एक्ट के अंर्तगत मरीजों के अधिकार हर संस्थाओं में सुरक्षित हों । विभिन्न सेवाओं के दाम नियंत्रित हों। प्रिस्क्रिप्षन, जांच तथा रेफरल के पीछे चलने वाली घूसखोरी को बंद किया जाए, एवं इसके लिए शासन द्वारा पर्यवेक्षित लेकिन स्वतंत्र शिकायत निवारण व्यवस्था लागू की जाये। मानक निर्माण का प्रकार ऐसा हो जिसमें कारपोरेट हित का बढ़ावा न हो सके। इन तमाम व्यवस्थाओं पर यह भी विशेष ध्यान हो कि नैतिक एवं गैर वाणिज्यिक सेवा प्रदान करने वाले निजी प्रदाताओं को संम्पूर्ण परि रक्षा मिल रहा है।
14- समस्त सार्वजनिक बीमा योजनाओं को समय सीमा के अंतर्गत लोक सेवा व्यवस्था में विलीन किया जायेः आर एस बी वाई जैसे तथा अन्य राज्य संचालित बीमाएं कर-आधारित सार्वजनिक वितीय व्यव्स्था से पोषित लोक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में समय सीमा के अंर्तगत विलीन हो । इन बीमा योजनाओं के अंर्तगत प्राप्त सभी सेवायें लोक स्वास्थ्य प्रणाली में भी सम्मिलित हों एवं इसके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों। संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लोक स्वास्थ्य प्रणाली में पूर्ण रुप से शामिल किया जाये जिससे कि उनके लिए समेकित स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो।
हरयाणा मुख्यमंत्री मुफ्त इलाज ‘योजना’, जननी सुरक्षा योजना आदि सभी स्वास्थ्य योजनाओं को ठीक प्रकार से लागू किया जाए। इसके लिए जिला स्तर पर सामाजिक संस्थाओं व जन संगठनों के कार्यकर्ताओं की एक माॅनिटरिंग कमेटी बनाई जाए जिसकी सिफारिशों पर सम्बंधित विभाग उचित कार्यवाही तुरन्त करे। हरयाणा से गुजरने वाले हाइवे पर एक्सीडैंट होने पर 48 घण्टे तक सभी को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं देने की योजना उचित ढंग से लागू की जाए।
15- स्वास्थ्य नीतियों के विकास में तथा प्राथमिकतायें तय करने में बहुपक्षीय अंर्तराष्ट्रीय वितीय संस्थाओं का तकनीकी सहयोग पूर्ण रुप से समाप्त होः विश्व बैंक , यू.एस.एड., गेट्स फाउन्डेशन , कंसलटेंसी संस्थाएं जैसे डियोलाइट,मैकेन्सी आदि का राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकतांए एवं वितीय या सेवा प्रदाय रणनीतियों के निर्धारण में भूमिका को पूर्ण रुप से समाप्त किया जाये। शोध व ज्ञान संसाधन का विकास एवं वितरण के लिए एक विषेश अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्रणाली गठित किया जाये , खासकर अन्य विकासशील देशों के साथ। डब्लू.एच. ओ. ,यूनिसेफ तथा अन्य संयुक्त राष्ट्रीय संस्थाओं के उपर तकनीकी निर्भरता एवं उनकी वितिय सहायता की आवश्यकता से मुक्त किया जाने हेतू शासकीय स्तर पर दबाव बनें। इस प्रकार की संस्थाओं
की ओर से आने वाले परामर्श तथा विशेषज्ञता को भी समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाये क्योंकि यह संस्थाएं भी कारपोरेट एवं निजी संस्थानों के हित से प्रभावित हैं ।
16 - राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर स्वास्थ्य पर शोध एवं विकास के लिए क्षमता निर्माण होः लोक स्वास्थ्य बजट का कम से कम 5% स्वास्थ्य पर शोध के लिए आवंटित हो जिसमें स्वास्थ्य तन्त्रों पर शोध भी शामिल हो। सवास्थ्य के क्षेत्र में तथा स्वास्थ्य तन्त्रों पर शोध हेतू नवीन संस्थागत ढांचे शासन द्वारा गठित हो तथा मौजूदा संस्थाओं को पर्याप्त शासकीय वितिय सहायता दिया जाये।
17- आवश्यक एवं सुरक्षित दवाईयों तथा उपकरणों की सही उपलब्धता सुनिष्चित होः सभी दवाईयों का मूल्य आधारित दाम नियन्त्रण हो , दवा एवं उपकरण सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रावधान हो। जेनेरिक दवाईयों के वितरण के लिए पर्याप्त संविधायें प्रणाली हों व चिकित्सकों द्वारा जेनेरिक दवाईयों के प्रिस्क्रिप्षन हेतू अनिवार्यता हो। इंडियन पेटैंट एक्ट के अंर्तगत लोक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए की गई व्यवस्थाओं का दवाईयों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उपयोग हो तथा ज्यादातर दवाईयों एवं उपकरणों के देषी निर्माण को बढावा मिले।
18- जैव चिकिस्तकीय शोध तथा क्लिनिकल ट्रायलों की सशक्त विनियामक व्यवस्था होः क्लिनिकल ट्रायलों के नैतिक संचालन हेतू स्पष्ट रुप रेखा तैयार एवं लागू हो जिससे समस्त हितग्राहियों के सशक्त विनमय के लिए व्यवस्थायें बंधित हो चाहे वे वितीय प्रदाता हो , शोध संस्थाएं हों या नैतिक समितियां हों। सी.डी.एस.सी.ओ. तथा आई.सी. एम. आर. द्वारा समस्त क्लिनिकल ट्रायलों का तथा ट्रायल स्थानों की सशक्त निगरानी की जाये तथा ट्रायल संसाधनों के आंवटन के दौरान वहां पर आवश्यक सभी आपातकालीन स्थिति के निपटारे हेतू व्यवस्थायें सुनिश्चित हों । क्लिनिकल ट्रायलों में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को प्र्याप्त क्षतिपूर्ण राशि उपलब्ध कराने हेतू एवं उनको हो सकने वाले समस्त बुरे प्रभाव निपटारे के लिए पर्याप्त व्यवस्था के साथ निर्देश विकसित और लागू हों। क्लिनिकल ट्रायल प्रतिभागियों के लिए उनके अधिकार पत्र विकसित किया जाय जिसकी कानूनी रुप में भी वैधता हो।
19- सभी मानसिक रुप से पीड़ित मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं एवं रक्षा सुनिश्चित की जायेंः जिला स्तरीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंर्तगत शामिल किया जाये। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति पर अमल हो तथा मानसिक स्वास्थ्य कानून पास किया जाये।
20- कीटनाशक दवाओं के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल के चलते हरियाणा के हर क्षेत्र, मानवीय, पशु व खेती में इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मानवीय स्तर पर इन कीटनाशकों की मात्रा पता लगाने के टैस्टों की सुविधा इस प्रदेश के इकलौते पीजीआईएमएस में भी नहीं है। कई तरह की बीमारियां इसके चलते बढ़ रही हैं या पैदा हो रही हैं। यह सुविधा तत्काल मुहैया करवाई जाए।
21- सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर - एक सर्जन, एक फिजिसियन, एक शिशु रोग विशेषज्ञ व एक महिला रोग विशेषज्ञ के प्रावधान के मानक केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा तय किये गए हैं। इसके साथ यदि मरीज बेहोशी का विशेषज्ञ नहीं है तो सर्जन और गायनकाॅलोजिस्ट तो अपंग हो जाते हैं। इसलिए इन पांचों विशेषज्ञों की नियुक्तियां प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों मे की जाए।
22. प्रदेश के जिलों में गुड़गांव, रोहतक, हिसार, भिवानी,फरीदाबाद और सोनीपत में विशेष आर्थिक पैकेज के तहत 1500 करोड़ रुपये की परियोजनांए शुरू की गइ्र हैं जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढांचे को विकसित करने के लिए इन जिलों के अस्पतालों को अपगे्रड करके सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल बनाये जा रहे हैं। बहुत ही हाईटेक उपकरण पिछले सालों में खरीदे गए जो बहुत कम जगह और कमतर स्तर पर इस्तेमाल किये जा रहे हैं। यहां पर उपयुक्त स्टाफ की कमी को पूरा करते हुए इसके लिए सम्बंधित विशेषज्ञों, डाॅक्टरों, नर्सों व पैरामैडिकल स्टाफ को उपयुक्त ट्रेनिंग देने की भी आवश्यकता है। निशुल्क सर्जीकल पैकेज योजना के तहत 2009 से बी. पी. एल परिवारों को दी जा रही निशुल्क सर्जरी की सेवा को लागू करने में आ रही सभी दिक्कतों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाये जायें। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व अधिसूचित झोंपड़ पट्टियों एवं बस्तियों के निवासियों के सभी आपरेशन मुफत करने की योजना को सही ढंग से लागू किया जाए । इंदिरा बाल स्वास्थ्य योजना 26 जनवरी 2010 से लागू की गई। जिसके तहत अठारह वर्ष तक की आयु के बचचों के स्वास्थ्य कार्ड बना कर सरकारी अस्पतालों में उनके स्वास्थ्य की निशुल्क जांच व ईलाज किया जाता है। बहुत से लोगों को इन सब योजनाओं से वाकिफ ही नहीं लगते ओर इनके क्रियान्वयन की दिक्कतों को भी दुरुस्त करने के कदम पहले सुझाये गये माध्यमों के द्वारा उठाये जायें। प्रदेश में 2005 तक एम. बी.बी.एस.की कुल सीटें 350 थी जो वर्ष 2013 में 850 हो गई। मगर इन विद्यार्थियों की गुणवता पूर्ण मैडीकल शिक्षा के लिए जरुरी फैकल्टी की काफी कमी है हरेक मैडीकल कालेज में और इन्फ्रास्ट्रक्चर की बहुत कमी है जिसे पूरा करना बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत दाल रोटी योजना को सही सही लागू किया जाए।
23- कुपोषण ;नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे- तीन के अनुसार, हरियाणा में बढ़ा है। दूर करने के लिए कारगर कदम उठाये जायें। इसी प्रकार गर्भवती महिलाओं में नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे तीन के अनुसार नैषनल फैमिली हैल्थ सर्वे दो के मुकाबले 10 प्रतिशत खून की कमी बढ़ी है। इसके साथ-साथ लड़कियों में किये गये सरकारी सर्वे में भी खून की कमी का प्रतिशत काफी पाया गया है। उचित कदम उठाये जाने की जरूरत है।
24-पी एन डी टी एक्ट के तहत उचित कार्यवाही की जाएं।
प्रस्तुतकर्ता ranbir dahiya पर 6:58 PM

वर्तमान-एलोपैथी चिकित्सा शिक्षा प्रणाली..एक समीक्षा

वर्तमान-एलोपैथी चिकित्सा शिक्षा प्रणाली..एक समीक्षा
रणबीर सिंह दहिया
जन स्वास्थ्य अभियान हरियाणा
9812139001
आज हमारे  देश  में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के बाद जो डाक्टर बनता है वह कहीं भी देश  की आवश्यकताओं  के अनुरुप नहीं बैठता है। प्रत्यक्ष में चिकित्सा प्रणाली के तीनों पक्षों- कंटैंट ,मैथड तथा भाषा  को ही इसका कसूर जाता है। लेकिन यह कसूर चिकित्सा प्रणाली से आगे सामान्य शिक्षा प्रणाली से जा जुड़ता है और उससे भी आगे हमारी समाज व्यवस्था से जुड़ जाता है। वास्तव में हमारी चिकित्सा शिक्षा और सामान्य शिक्षा दोनों आज की हमारी बाजारी समाज व्यवस्था के मातहत ही फल फूल रही हैं। मौजूदा शिक्षा सिर्फ ट्रेनिंग  देने की एक ऐसी प्रक्रिया नहीं जिससे कि एक खास काम लिया जा सके बल्कि यह एक व्यक्ति को एक खास तरह का अपेक्षित रोल अदा करने से रोकने की प्रक्रिया भी है।
आज के दिन हमारे देश में 4 6 0  के लगभग चिकित्सा शिक्षा संस्थान हैं-सरकारी और प्राईवेट जिनको एम सी आई ने स्वीकृति दी हुई है । और इनमें 6 3 9 8 5 विद्यार्थियों के लिए सीटें हैं | इस सारे फैलाव के बावजूद सच्चाई यह है कि कमोबेश  सभी डाक्टर अरबन बेसड हैं और भिन्न भिन्न राज्यों में इनकी संख्या का अनुपात भी अलग अलग है। एक छात्र के एम.बी. बी.एस. डाक्टर बनाने पर सरकार का एक करोड़ बीस हजार के लगभग धन खर्च होता है। छात्र को भी सरकारी कालेज में 52070  रूपये प्रति वर्ष  फीस देनी पड़ती है और हॉस्टल का खर्च अलग | प्राईवेट कालेज में सालाना फीस 18 से 25 लाख के लगभग हैं | एम डी ,एम एस की डिग्री प्राइवेट कालेज में लगभग 2 करोड़ की है |   यह भी कहा जा सकता है कि कुछ कालेजों में बढ़िया चिकित्सा तथा बढ़िया इलाज देने की महारथ हांसिल कर ली है परन्तु किस कीमत पर? नीट की परीक्षा में कुल एंड 720 थे | ऐसा फार्मूला पर्सेंटाइल का लगाया कि 96 अंक यानि 13 . 4 प्रतिशत नंबर वाले विद्यार्थी भी एलिजिबल हैं |  हो सकता है सीटें खाली रहने पर यह और भी नीचे चली जाये |  सोचा जा सकता है कि आने वाले वक्तों में डाक्टरों की गुणवत्ता का स्तर क्या होगा ? " मैरिट इज इक्वल टू मनी "|   चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य ढांचा दोनों अलग अलग दिशाओं में जा रहे हैं। आज एक फिजिसियन की भूमिका में और समाज की आवश्यकताओं  में बहुत कम तालमेल बचा है। मैडीकल शिक्षा में तथा स्वास्थ्य की देख रेख करने वाले ढांचे में कोई सामंजस्य नहीं रहा है। आज भी हमारे देश  में चिकित्सा को विज्ञान और तकनीक के दायरे में ही देखा जाता है तथा इसे समाज की आवश्यकताओं  से आाजाद करके ऐतिहासिक संदर्भों से काटकर समझा जाता है। एक वक्त भारत सरकार द्वारा गठित मैडीकल एजूकेशन कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक यह आलोचना बिल्कुल सही है कि ‘ वर्तमान चिकित्सा शिक्षा का असल में इस देश के बहुत बड़े हिस्से पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।
चिकित्सा शिक्षा को इस प्रकार की दिशा  दी गई कि जिससे हमारे समाज की जो मौजूदा सामाजिक सांस्कृतिक व आर्थिक हालत है इसे छिपाया जा सके जो कि आजकल के शासक वर्ग द्वारा खास वर्गों के हितों के लिए बनाई गई है। आज की हमारी यह सामाजिक आर्थिक संरचना बहुत सी बीमारियों की जड़ है। 
बहुत सी बीमारियां हैं जो कि कम खुराक, कम कपड़ों, साफ पानी की उपलब्धता की कमी, ठीक मकान न होने, ठीक मलमूत्र त्याग की सुविधा न होने , साफ सुथरे वातावरण की कमी की वजह से तथा इसके साथ ही कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधाएं होने के कारण पनपती हैं। इसका असर ग्रामीण भारत में और भी ज्यादा देखने को मिलता है।
                 दूसरा ग्रूप ऐसी बीमारियों का है जो बाजार व्यव्स्था के समाज में रहन सहन की देन हैं। मसलन मानसिक तनाव, साइकोसोमेटिक डिस्आरडर, नशा , हिंसा व ऐक्सीडैंटस।
                तीसरा ग्रूप है जो कि ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की परिस्थितियों का नतीजा हैं। इनमें ज्यादा मुनाफा कम से कम खर्च में कमाने की प्रवृति काम करती है। नतीजतन काम करने के खराब हालात की वजह से भी बीमारियां हो जाती हैं, वातावरण के प्रदूषण से कई बीमारियां जन्म लेती हैं, कीटनाशक दवाओं के दुष्प्रभाव तथा मिलावट कई प्राणघातक बीमारियां पैदा करती है।
               चौथा ग्रूप उन बीमारियों का है जो शोसक वर्गों और उनकी सरकारों द्वारा अपना प्रभुत्व करोडों करोड़ लोगों पर अपने निहित स्वार्थों के कायम रखने के दौरान पैदा होती हैं मसलन युद्ध के लिए किये गये प्रयोगों के नतीजे के तौर पर तथा वास्तविक युद्धों में कैमीकल, बायोलॉजिकल या न्यूक्लीयर हथियारों के इस्तेमाल परिणाम स्वरुप बहुत सी बीमारियां सामने आई हैं। स्थिति यहां तक जा पहुची है कि मनुष्य  तो क्या कोई भी जीव इसकी मार से नहीं बचेगा। लेकिन वर्तमान चिकित्सा प्रणाली में और चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में पूरे जोर शोर से कोशिश  की जाती है कि इन सच्चाईयों को छिपाया जाए और इन बीमारियों का मूल कारण दूसरे या तीसरे कारणों को बताया जाए।
वर्तमान चिकित्सा शिक्षा विद्यार्थियों में इस प्रकार की भावनाएं  जाग्रत करने की कोशिश करती है जो कि इस बाजारी समाज व्यवस्था के शोसन  करने के स्वरुप को बरकरार रखें। मिसाल के तौर पर इस चिकित्सा शिक्षा  के ग्रहण करने के बाद व्यक्ति या वह डाक्टर यह देख पाने में और समझ पाने में असमर्थ रहता है कि जो स्वास्थ्य  सेवाएं कल्बों द्वारा दी जाती है जैसे कि रोटरी कल्ब या लायन्ज कल्ब  उनका वास्तविक स्वरुप क्या है? इन कल्बों और संस्थाओं के सरगना कई वही लोग होते हैं जो समाज की सारी बुराईयों के लिए जिम्मेदार हैं जिसमें बीमारियां भी शामिल हैं मगर यही लोग हैं जो चालाकी से सफलतापूर्वक अपने आपको लोगों का असली सेवक तथा रक्षक बनाने का ढोंग इस स्वाथ्थ्य सेवा के माध्यम से करते हैं। यहां तक कि पूर्ण रुपेण जन विरोधी सरकारें भी इन स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से अपने आपको जन हितैषी  साबित करने में सफल रहती हैं। और इसी संदर्भ में हमारे देश  में समय समय पर हुए स्वास्थ्य ढांचे के ग्रामीन व शहरी विस्तार को देखना ज्यादा सही होगा।
हमारी वर्तमान चिकित्सा शिक्षा डाक्टर को औजारों और दवाओं के उद्योगों का एक सेल्जमैन बनाने का भरपूर प्रयास करती है इसके लिए तरह तरह के कार्यक्रम प्रायोजित करके डाक्टरों को शामिल किया जाता है। ऐसी नीतियां बनाई जाती हैं जहां पैसे वालों के लिए और सरकारी कर्मचारियों के लिए अपोलो और फोरटिस और बाकियों के लिए डिलिवरी हट और आशा  वर्कर। हमारे जैसे पिछडे़ हुए औद्योगिक देश  में जहां लेबर बड़ी सस्ती है, बेषुमार बेरोजगारी है, लेबर फोर्स असंगठित है, नौकरी की सुरक्षा कतई नहीं है और अनपढ़ता इस हद तक है कि बीमारी के दौरान भरपूर और जल्द स्वास्थ्य सुविधा की जरुरत ही नहीं समझी जाती। हमारे समाज में चिकित्सा सुविधा तक पहुंच इन बातों पर निर्भर करती है कि किसी की पैसा खर्च करने की ताकत कितनी है, उसकी षाशक वर्ग से कितनी नजदीकी है और उसकी चेतना का स्तर क्या है? ऐसे विकसित देषों में जहां पूंजी की स्वतन्त्रता महत्वपूर्ण भूमिका में है वहां चिकित्सा षिक्षा के और स्वास्थ्य सेवाओं के उद्येष्य समान हैं। बीमार आदमी की देखभाल का स्तर और गुणवता काफी उंचे पैमाने के हैं और वहां सरकार का स्वास्थ्य पर खर्च भी काफी है,नतीजतन वहां पर लेबर बहुत म्हंगी है और जब लेबर बीमार होती है तो उसका विकल्प जल्दी से नहीं मिल पाता और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लेबर फोर्स संगठित है। वहां की लेबर फोर्स को जल्दी व आसानी से नौकरी से बाहर नहीं फैंका जा सकता। वहां साक्षरता दर काफी उंची है।
एक तरह से देखें तो भारतवर्श में यह कहना पूर्ण रुप से ठीक नहीं है कि हमारे देश  का वर्तमान चिकित्सा शिक्षा का ढांचा गलत दिशा  में जा रहा है। यह तो असल में उसी दिशा  में जा रहा है जिस दिशा  में हमारे नीति निर्धारक इसे ले जा रहे हैं और वह दिशा  इस परिधारणा पर आधारित है कि स्वास्थ्य एक खरीदी जाने वाली वस्तु -कमोडिटी - है जिसके पास पैसा है वह खरीद सकता है। खरीदने की ताकत पैसे वाले के पास है तो उसी की सेहत ठीक रखने की दिशा भी बनती रही है। विरोधाभाष यहां पर यह है कि इस दिशा के चलते वह गरीब का इलाज कैसे करेगा? शायद दिखावा ही किया जा सकता है। यहां पर यह भी कहना जरुरी है कि विद्यार्थियों , अध्यापकों या सलेबस को यदि इस सबके लिए दोषी मानेंगे तो यह ज्यादती होगी क्योंकि इन सब को आज के वर्तमान वर्ग शक्तियों का जो  संतुलन है उससे अलग करके नहीं देखा जा सकता और इसलिए चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में बदलावों के मूल भूत प्रयासों को एकांगीपन के साथ आगे नहीं बढ़ाया जा सकता इसे भी समाज के दूसरे हिस्सों में परिवर्तन कारी संघर्शों व समाज सुधार के आन्दोलनों के साथ मिलकर ही एक नया समाज बनाने की व्यापक प्रक्रिया के हिस्से के रुप में ही देखा जाना चाहिये। मगर इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक बहुत कठिन काम है क्योंकि इसके लिए वैचारिक विमर्ष  की तीव्र आवश्यकता  है जो कि अभी तक बहुत कम रहा है। सिर्फ इतना ही काफी नहीं है कि आपने ज्ञान और हुनर हासिल कर लिया और मरीज का इलाज कर देंगे और बीमारी का खात्मा कर देंगे। इसके साथ जो ‘वैल्यू सिस्टम’ व आचरण की नैतिकता भावी डाक्टर के अन्दर पैदा किये जा रहे हैं वह भी उसका विश्व  दृष्टिकोण  बनाने में बड़ी भूमिका अदा करते हैं। वर्तमान चिकित्सा शिक्षा का वैल्यू सिस्टम विद्यार्थी को लोगों से दूर और अधिक दूर ले जा रहा है और यह व्यवहार-एटीच्यूड- सिर्फ चिकित्सा शिक्षा तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह तो स्कूल से ही आरम्भ हो जाता है और नतीजा यह होता है कि डाक्टर बनने के पीछे ‘ मोटिव फोर्स ’ पैसा , पै्रक्टिस , ईजी कैरीयर आदि बन जाते हैं और विश्व  दृष्टि  भी काफी खण्डित हो जाती है। किसी रिसर्च पर चर्चा के विद्वान कहते हैं कि हमारा काम रिसर्च करना है उसके सामाजिक पक्ष पर सोचना हमारा काम नहीं है। हो सकता है इनमें से बहुत से डाक्टर ईमानदारी से किसी भी वर्ग के साथ अपनी पक्षधरता के इच्छुक ना हों  और ‘क्लास न्यूट्रल’ रहने के पक्षधर हों। मगर ऐसा करते हुए भी अर्थात न्यूट्रल रहते हुए भी वास्तव में वे ताकत वर वर्गों या शासक वर्गों के दृष्टिकोण  या पक्ष को ही मदद कर रहे होते हैं। वर्ग विभाजित समाज में ‘क्लास न्यूट्रलिटी’ नाम की कोई चीज नहीं होती ।
जब हम कहते हैं कि चिकित्सा शिक्षा जरूरत  के हिसाब से ओरियेंटिड नहीं है , यह भी आधी सच्चाई है। जब नीति बनाई जाती है तो वह बहुसंख्यक लोगों के हितों को ध्यान में रखकर बनाने की बात की जाती है। जबकि पूरी सच्चाई यही है कि यह शिक्षा अल्पसंख्यक शासक वर्ग के हितों के हिसाब से ही व्यवहार में उतरती है। चिकित्सा शिक्षा  के कंटैंट और मैथड की इस ढंग से योजना बनाई जाती है कि एक ऐसा डाक्टर बने जो नौकर शाही पूर्ण तथा हाई आरकिक स्वास्थ्य के ढांचे को चलाए । इस ढांचे में बहुत ही केन्द्रित ढंग से विश्व  बैंक के दबाव में केन्द्रिय सरकार द्वारा फैंसले लिए जाते हैं। हमारी वर्तमान एलोपैथी चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में ग्रामीण भारत को ध्यान में रखकर बहुत स्तरों पर बदलाव लाने की  आवश्यकता नजर आती है।
रणबीर सिेह दहिया



शिशुओं

स्मरण योग्य बातें 
--आवश्यक है
* शिशुओं को खिलाते वक्त अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। उनके आहार में नरम पकी हुई सब्जियां एवं मौसमी फल शामिल करने की जरूरत है।
* बच्चों और किशोरों को दूध और दूध से भरपूर उत्पाद दें , क्योंकि वृद्धि और हड्डियों के विकास के लिए उन्हें काल्सियम की जरूरत होती है।
* अपने बच्चे को बाहरी गतिविधियों के बाद और भोजन से पहले अपने हाथ धोने तथा दिन में दो बार अपने दांत ब्रश से साफ करने जैसी स्वस्थ्य जीवन शैली पद्धति अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें। 
* एक बार भोजन के दौरान अधिक खाने से बचें। लगातार अंतराल पर खाएं
* सूर्य के प्रकाश में आने से विटामिन 'डी' को बनाये रखने में मदद मिलती है , जो कि कैल्शियम के अवशोषण में भी मदद करता है ।
* बच्चों को कभी भूखा न रहने दें।दूध और मसली हुई सब्जियों के साथ ऊर्जा (कैलोरी) दायक अनाज-दाल युक्त आहार खिलाएं।
* रोग के दौरान पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ दें। उचित पोषण की स्थिति बनाये रखने के लिए संक्रमण की अवधि के दौरान और बाद में बच्चे को अधिक खाने की जरूरत होती है।
* दस्त , अतिसार / डायरिया की अवधि के दौरान निर्जलीकरण रोकने और नियंत्रित करने के लिए जिंक टैबलेट के साथ साथ औरल रिहाईड्रेशन
साल्ट्स(ओआरएस) का उपयोग करें ।
* शरीर को हाईड्रेट (जलयोजित) करने के लिए 2 से 2.5 लीटर पानी पीएं। शीतल पेय और अन्य पैकेज्ड ड्रिंक के बजाय पाणी/छाछ/ लस्सी/ फलों के रस / नारियल पाणी को प्राथमिकता दें।
जन स्वास्थ्य अभियान हरयाणा