Tuesday, 12 November 2019

MALNUTRITION


कुपोषण
बाल कुपोषण के भयावह आँकड़े सरकारों की अपराधी उदासीनता आने वाली एक पूरी पीढ़ी को अपंग बीमार बनाती व्यवस्था
डॉ. पावेल पराशर

बीती 13 जनवरी को झारखण्ड की रघुबर सरकार ने मिड डे मील के तहत बच्चों को मिलने वाले अण्डों में कटौती की घोषणा करते हुए इसे हफ़्ते में तीन से दो करने का फै़सला ले लिया। सरकार ने इसका कारण बताया है कि हर दिन बच्चों को अण्डा खिलाना सरकार के लिएमहँगासौदा पड़ रहा है। ताज्जुब की बात है कि राज्य की खनिज सम्पदाओं, जंगलों, पहाड़ों को अपने कॉर्पाेरेट मित्रों के हाथों औने-पौने दाम पर बेचना सरकार को कभीमहँगानहीं पड़ा। ग़ौरतलब है कि झारखण्ड देश के सबसे कुपोषित राज्यों में से एक है और खनिज प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस राज्य के 62 बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। राज्य के कुल कुपोषित बच्चों में से 47 बच्चों मेंस्टण्टिंगयानी उम्र के अनुपात में औसत से कम लम्बाई पायी गयी है जो कि कुपोषण की वजह से शरीर पर पड़ने वाले अपरिवर्तनीय प्रभावों में से एक है। पूरे देश के कुपोषण के आँकड़ों पर नज़र डालें तो न्छप्ब्म्थ् के अनुसार भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के 39 बच्चे स्टण्टिंग के शिकार हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आने वाली एक पूरी पीढ़ी, कुपोषण के दुष्प्रभावों की वजह से ठिगनी रह जाने को अभिशप्त है। ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट, 2018 (जीएनआर) के अनुसार विश्व में कुपोषण की वजह से ठिगने रह जाने वाले बच्चों में से 47 सिर्फ़ तीन देशों में हैं, भारत, पाकिस्तान नाइजीरिया। विश्व भूख सूचकांक 2018 के अनुसार विश्व के 119 अविकसित विकासशील देशों की सूची में भारत 103वें स्थान पर विराजमान है। हमारे देश में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की होने वाली अकाल मृत्यु के 50 मामलों के लिए कुपोषण ज़िम्मेदार है। भारत में हर दिन 3000 बच्चे कुपोषण के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कारणों की वजह से दम तोड़ देते हैं।

बाल कुपोषण के कारण, लक्षण दुष्परिणाम --

बाल कुपोषण तब होता है जब बच्चे के शरीर में प्रोटीन, कार्बाेहाइड्रेट, वसा, विटामिन खनिजों सहित पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिलते। इसके कारणों में मुख्यतः प्रोटीन कैलोरी की कमी सबसे बड़ी दीर्घकालिक भूमिका निभाती है। प्रोटीन कैलोरी की कमी की वजह से होने वाला कुपोषण, “प्रोटीन ऊर्जा कुपोषणकहलाता है। कैलोरी प्रोटीन की कमी का सम्बन्ध भोजन की मात्रा और गुणवत्ता से तो है ही, साथ ही साफ़-सफ़ाई बच्चे के पालन-पोषण के वातावरण से भी है। इसके अलावा बच्चे की माँ के शरीर में गर्भावस्था के दौरान मौजूद ख़ून की कमी और कुपोषण का इतिहास, भविष्य में बच्चे में कुपोषण की सम्भावना को कई गुणा बढ़ा देता है। जन्म के बाद के छह महीने तक अनन्य स्तनपान मिलना भी बाल कुपोषण का एक महत्वपूर्ण कारण है। कुपोषण के कुछ आम लक्षणों में शामिल हैं, वसा की कमी, दम फूलना, अवसाद, सर्जरी के बाद जटिलताओं का ख़तरा, घाव देर से भरना, ‘हाइपोथर्मियायानी असामान्य रूप से शरीर का निम्न तापमान, बीमारी ठीक होने में लम्बा वक़्त लगना, थकान, उदासीनता इसके अलावा कुपोषण के अधिक गम्भीर मामलों में पतली, सूखी, पीली त्वचा, चेहरे से वसा खोने की वजह से गालों का खोखला हो जाना, आँखों का धँस जाना आदि। लम्बे समय तक कैलोरी की कमी की वजह से दिल, जिगर श्वास की विफलता जैसे गम्भीर परिणाम भी हो सकते हैं। गम्भीर रूप से कुपोषित बच्चों का शारीरिक विकास आम बच्चों की तुलना में धीमा अपूर्ण होता है। उनमें शारीरिक मानसिक विकलांगताओं का भी ख़तरा रहता है। हालाँकि जो बच्चे ठीक हो जाते हैं, उनमें भी लम्बे समय तक कुपोषण के प्रभाव दिखते हैं जैसे कि पाचन तन्त्र और मानसिक कार्यों में दिक़्क़त। बच्चों में जन्म से लेकर दो वर्ष की आयु तक उनके कुपोषण से ग्रस्त होने उस कुपोषण के दीर्घकालिक होने की सम्भावना अधिक रहती है।

सरकारी कुप्रबन्धन, भ्रष्टाचार बजटदृकटौती काशिकार होती योजनाएँरू

भारत सरकार ने 1995 में बच्चों की प्रोटीन कैलोरी की ज़रूरतों की आंशिक आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिएमिड डे मीलयोजना की शुरुआत की थी। मिड डे मील योजना का लक्ष्य बच्चों के लिए ज़रूरी कैलोरी के एक तिहाई हिस्से ज़रूरी प्रोटीन के 50 हिस्से की आपूर्ति सुनिश्चित करना था। हालाँकि यह योजना अपने जन्म के समय से ही कुप्रबन्धन, भ्रष्टाचार लगातार होती फ़ण्ड बजट कटौती की वजह से अधिकतर राज्यों में अपने निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति में असफल रही, पर फिर भी इस योजना की शुरुआत के बाद कई क्षेत्रों में बाल कुपोषण के आँकड़ों में प्रत्यक्ष सुधार देखे गये। झारखण्ड सहित कुछ राज्यों में प्रोटीन की आपूर्ति के लिए चावल, दलहन के साथ अण्डे को सम्मिलित किया गया। अण्डे में मौजूद एल्ब्यूमिन प्रोटीन, “प्रोटीन ऊर्जा कुपोषणसे पीड़ित बच्चों के लिए गुणात्मक रूप से प्रोटीन का सर्वाेत्तम स्रोत है और मिड डे मील में यदि ईमानदारी से हर बच्चे को रोज़ाना एक अण्डा सुनिश्चित किया जाये तो कुपोषण के इन भयानक आँकड़ों में कई गुना तक सुधार लाया जा सकता है। लेकिन खनिज प्राकृतिक सम्पदाओं से भरपूर झारखण्ड राज्य की सरकार के लिए राज्य की सम्पदाओं को चवन्नी के भाव कॉर्पाेरेट घरानों को बेचना कभी भीमहँगासौदा महसूस नहीं हुआ, पर कुपोषित बच्चों को अण्डों से मिलने वाला पोषण उसे महँगा सौदा लगने लगा। 7 की दर सेविकासका दावा ठोंकती रघुबर सरकार के पास अपने इसविकासका एक छोटा सा हिस्सा इस राज्य में विकराल मुँहबाए खड़े कुपोषण रूपी राक्षस से लड़ाई हेतु भी ख़र्चने को नहीं है। ग़ौरतलब है कि संस्कृति धर्म पर ठेकेदारी का दावा ठोंकने वाली भारतीय जनता पार्टी ने जिन-जिन प्रदेशों में अपनी सरकार बनायी, वहाँ-वहाँ उसनेधार्मिक भावनाओंहवाला देते हुए अण्डे को बच्चों की थाली से छीन लिया, चाहे वह हिमाचल हो या महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तराखण्ड, यूपी या मणिपुर।

जहाँ एक तरफ़ कुपोषण के भयानक आँकड़े भारत को दुनिया के सबसे पिछड़े कुपोषित देशों की क़तार में खड़ा करते हैं, वहीं मिड डे मील, आईसीडीएस, आँगनवाड़ी जैसी योजनाओं से आर्थिक सहायता खींचकर इन्हें भी ख़त्म करने की साज़िशें ज़ोर पर हैं। दूसरी तरफ़ पूँजीपतियों के हज़ारों करोड़ के क़र्ज़े माफ़ करते हुए उसकी भरपाई मेहनतकश जनता के हिस्से के कल्याणकारी कार्यक्रमों में कटौती के द्वारा की जा रही है।भात भातकहते हुए मर गयी बालिका सन्तोषी को सख़्त हिदायत है कि जितना मिल रहा है, उतने में हीसन्तोषकरो और अपनी हड्डियों का पाउडर बनाकर इस पूँजीवादी व्यवस्था के मुनाफ़े के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी पिसते रहो।

प्लास्टिक कंटेनर

खानपान में प्लास्टिक कंटेनर के
इस्तेमाल से बचें!
सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए और बिस्फिनाल-ए (बीपीए) पर प्रतिबंध लगाकर पहला सबसे स्पष्ट और तर्कसंगत कदम उठाना चाहिए। समय-समय पर हानिकारक रसायनों के लिए प्लास्टिक पदार्थों की जांच करने और इससे संबंधित धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ उचित कार्रवाई हेतु सरकार के पास एक तंत्र होना चाहिए। दुर्भाग्यवश, ऐसी प्रणाली भारत में मौजूद नहीं है। ‘फूड ग्रेड प्लास्टिक‘ जैसे लेबल एक छलावा मात्र हैं और इनका कोई मतलब भी नहीं बनता है, क्योंकि कोई भी प्लास्टिक सुरक्षित नहीं है। हमें निरर्थक महत्वाकांक्षा में पड़ने के बजाय स्वास्थ्य और पर्यावरण की दिशा में प्राथमिकता तय करने वाली नई जीवन शैली से अगली पीढ़ी को सम्बल प्रदान करना चाहिए। क्योंकि हमारे पास केवल एक जीवन और एक पृथ्वी है।
हम ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां हम वर्तमान प्रवृत्ति का पालन करते हैं, चाहे खानपान से जुड़ी आदतें हों, सामग्रियों का उपयोग या फैशन आदि हो। स्कूल में लंच बॉक्स का एक उदाहरण लेते हैं। दो दशक पहले अपने स्कूल के दिनों में, मैं गोल छोटे स्टील कंटेनर में अपना दोपहर का भोजन ले जाता था, जिसे हम ‘चोटू प्रथम‘ (राइस कंटेनर) कहते थे। तब के बाद, ये कंटेनर पुराने और अप्रचलित हो गए, इन दिनों स्कूलों में फैशन ट्रेडमार्क बन चुके मशहूर कार्टून पात्र और जानवरों की छवि वाले रंगीन लंच बॉक्स प्रचलन में है। हमें गुणी अभिभावक दर्शाने के लिए समाज मेरी बेटी को उन ट्रेंडी, रंगीन लंच बॉक्स खरीदने के लिए निर्देशित करता है। वे बच्चों के लिए लुभावने होते हैं, अगर मैं जोर देता हूं कि वह अपना खाना स्टील लंच बाक्स में ले जाए तो उसका स्कूल में उपहास उड़ाया जाएगा और उसे पुरानी सोच का ठहरा दिया जाएगा! वह निराश होगी और जल्द ही अपने लंच बॉक्स को और अधिक आधुनिक करने की मांग करेगी! हालांकि, हकीकत में, इसमें कोई बदलाव
नहीं होगा। इनमें से लगभग सभी प्लास्टिक स्कूल लंच बाक्स पॉलीकार्बोनेट नामक एक प्लास्टिक उप प्रकार से बने होते हैं। पॉलीकार्बोनेट प्लास्टिक (जिसमें ‘इपाक्सी’ रेजिन’ पाया जाता है) निरपवाद रूप से एक सिंथेटिक रसायन का श्राव करते हैं, जिसे बिस्फिनाल ए (बीपीए) कहा जाता है। इसकी रासायनिक संरचना महिलाओं के प्रजनन हार्मोन एस्ट्रोजन के समान दिखती है और यदि यह हमारे शरीर के अंदर आ जाए तो अंडाशय में गुणसूत्र का ह्रास सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है, इसी तरह पुरुषों की प्रजनन क्षमता में कमी आती है, हृदय संवहनी तंत्र क्षति, स्तन और प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। बढ़ती सार्वजनिक जागरूकता और कानूनी हस्तक्षेप से विकसित देशों में बीपीए युक्त प्लास्टिक के उपयोग में कमी आई है। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ईयू, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, ताइवान, चीन और मलेशिया समेत कई विकासशील देशों में भी बीपीए पर प्रतिबंध लगा दिया गया है या पहले से ही प्रतिबंधित है। इन प्रवर्तनों की अवहेलना करने के लिए, प्लास्टिक निर्माताओं ने बीपीए को ‘‘बीपीएमुक्त‘‘ प्रमाणन प्राप्त करने के लिए बीपीएस (बिस्फिनाल एस) और बीपीएफ (बिस्फिनाल एफ) के साथ तेजी से बदल दिया है, हालांकि नए शोध से पता चला है कि बीपीएस
और बीपीएफ घातक हैं, और इसलिए इसकी खुराक पूरी तरह से टालना चाहिए। भारत में, अफसोस की बात है कि बीपीए पर प्रतिबंध नहीं है, न ही इसकी बिक्री पर कोई प्रतिबंध लागू है, जो वैज्ञानिक रूप से जागरूक नागरिकों के लिए एक निराशाजनक बात है। 2013 में, भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा बीपीए की बोतलों को प्रतिबंधित करने के लिए एक मसौदा तैयार किया गया था लेकिन प्लास्टिक उद्योग के सहकर्मी दबाव के कारण, सरकार इन मसौदे के दिशा-निर्देशों को लागू करने से बचती रही। चाहे औद्योगिक विकास या नागरिकों के स्वास्थ्य का सवाल हो, विशेष रूप से कमजोर नागरिक, गर्भवती महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता, सरकार के लिए तर्कसंगत रूप से एक नैतिक सवाल है। नागरिकों और ग्राहकों को सूचित करने के लिए, कई कंपनियां स्वेच्छा से अपने उत्पादों को ‘बीपीएमुक्त’ लोगो के साथ चिह्नित करती हैं। 2014 में एक अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया कि इन घोषित ‘बीपीएमुक्त’ उत्पादों में से अधिकांश ने प्रसिद्ध ब्रांडों से शिशु आहार की बोतलों को बीपीए के लिए सकारात्मक परीक्षण किया। आप कैसे जानेंगे कि आप जो प्लास्टिक खरीदते हैं, वह बीपीए ध् बीपीएस ध् बीपीएफ मुक्त है? “फाइन प्रिंट” एक आसान तरीका है। अधिकांश प्लास्टिक 

Saturday, 9 November 2019

बवासीर

बवासीर से संबंधित जानकारी
रोगलक्षण, कारण एवं रोगनिदान
आम बोलचाल में ‘पाइल्स’ कही जाने वाली बवासीर व्याधि - मलाशय एवं गुदाक्षेत्र के आसपास एवं अंतर्गत संवर्धित तथा शोथयुक्त शिराओं को कहा जाता है। पृष्ठमार्ग के निम्नतर सिरे पर बवासीर की शिराओं में सूजन हो जाती है तथा मलत्याग करते समय उनमें खिंचाव होता है, वे संकरी पड़ जाती हैं और साथ ही उनमें क्षोभण होने लगता है। इसी कारण मलत्याग करना कष्टकर बन जाता है और मलद्वार मंे दर्द तथा रुधिर स्राव की शिकायत होने लगती है।

बवासीर एक आम रोग है। अनुमानतः 50 प्रतिशत व्यक्ति जीवन में कभी
न कभी इससे ग्रस्त होते हैं। रोग वैसे तो किसी भी आयु में होना संभव है किंतु
प्रायः बुजुर्ग व्यक्ति तथा गर्भवती महिलाएं इससे अधिक ग्रस्त देखे गए हैं।
रोग लक्षण की पहचान
अधिकांश मामलों में बवासीर के किसी प्रकार के रोगलक्षण व्यक्त नहीं होते और कई लोगों को तो रोग होने का आभास भी नहीं होता। ऐसे में निम्न रोगलक्षण व्यक्त होना संभव हैः
मलत्याग करने के पश्चात
रुधिरस्राव। रुधिर आमतौर पर
गाढ़ा लाल रंग का होता है।
ऐसा प्रतीत होता है मानों मांस का कोई टुकड़ा गुदा से लटक रहा हो जिसे
मलत्याग के बाद भीतर करना पड़ता हो।
मलत्याग के पश्चात श्लेष्मा निकास
गुदाद्वार के निकट छिलन, लाली और शोथ
मल के स्थान पर श्लेष्मा निकलना
मलत्याग के बाद भी पूरी तसल्ली न होना
बवासीर के मस्सों में हमेशा तकलीफ नहीं होती बशर्ते वे मलाशय संवरणी में न फंसे हों और उनमें रुधिर संचालन मंद या बाधित हो गया हो। गुदा से रुधिर स्रोत का मुख्य कारण बवासीर ही है। ऐसा होने या मलाशय
में दर्द होने पर रोग लक्षणों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। हालांकि बवासीर बहुत कम मामलों में घातक रोग है किंतु चिकित्सक द्वारा रोगनिदान करवाना ज़रूरी है। ऐसा भी बहुत कम स्थितियों मंे देखा गया है कि बवासीर के पीछे कोई घातक रोग छिपा हो, जैसे कि वृहतआंत्र.मलाशय कैंसर।
चिकित्सीय परामर्श
बवासीर के संकेतक लगातार बने रहने अथवा उग्र रोगलक्षण व्यक्त होने अथवा गुदा से रुधिर स्राव होने की स्थिति में बिना विलम्ब किए चिकित्सक से परामर्श ज़रूरी है। ऐसे में, पारिवारिक चिकित्सक, सामान्य सर्जन अथवा वृहदांत्र.गुदाक्षेत्र सर्जन से परामर्श किया जाना चाहिए। ऐसा करना जरू़री है क्योंकि बवासीर के
पीछे कहीं अधिक बड़ी तथा घातक बीमारी भी छिपी होनी संभव है। कई बार बवासीर खुद ही ठीक हो जाती है। प्रायः बिना किसी चिकित्सीय निर्देश के फार्मेसी से मिलने वाली आम दवाओं से ही आराम आ जाता है। वैसे रोगलक्षणों में आराम न मिलने पर या दर्द अथवा रुधिर स्राव होने पर चिकित्सक से परामर्श लेने में हिचकिचाना
उचित नहीं। कुछ लोगों को बवासीर जैसे शरीर के अंतरंग स्थान मंे होने वाले रोग की वजह से चिकित्सक के पास जाने में संकोच महसूस होता है किन्तु ऐसा करना उचित नहीं है क्योंकि बवासीर भी अन्य व्याधियों के समान शरीर का एक शारीरिक कष्ट ही है।
------सबसे ज़रूरी बात - चिकित्सक को अपने सभी रोगलक्षण बतलाने चाहिए।
उदाहरण के लिए क्या व्यक्ति का वज़न हाल में ही कम हुआ है, नित्यकर्म की प्रवृत्ति में  बदलाव आया है या फिर क्या मल गहरे रंग का और लेसदार होने लगा है।
****चिकित्सक द्वारा बवासीर का रोग निदान।
प्रायः चिकित्सक द्वारा गुदा जांच से ही बवासीर की पुष्टि हो जाती है।
---मलाशय परीक्षण
-गुदा के बाहरी भाग का परीक्षण कर इस तथ्य की पुष्टि करता है कि बवासीर के मस्से बाहर की तरफ दिखाई दे रहे हैं अथवा नहीं। तत्पश्चात आंतरिक परीक्षण भी किया जाना संभव है। सरलतम परीक्षण डिजिटल गुदाक्षेत्रीय
परीक्षण है। कुछ लोग, धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से गुदा परीक्षण नहीं करवाना चाहते। इसी तरह कुछ चाहते हैं कि उनका परीक्षण महिला या पुरुष द्वारा ही किया जाए जो कि वे स्वयं हैं या फिर कुछ चाहते हैं कि परीक्षण के दौरान कोई रिश्तेदार या मित्र भी उपस्थित रहे। किसी भी प्रकार की प्राथमिकताएं रहने पर चिकित्सक को पूर्व में सूचित किया जाना चाहिए।
----परीक्षण प्रक्रिया
गुदा क्षेत्र का परीक्षण करने से पूर्व चिकित्सक रोगी को प्रक्रिया की पूर्व जानकारी प्रदान करता है। रोगी को अपने
अधोवस्त्र उतारकर, एक पलंग पर बांई करवट लेकर तथा अपने घुटने वक्ष की तरफ उठा कर लिटाया जाता है। चिकित्सक परीक्षण की शुरुआत, सावधानी से गुदा के बाहरी भाग से करता है तथा अपसामान्यताओं का परीक्षण किया जाता है जैसे कि फूली हुई मलाशय एवं गुदा के आस.पास की रुधिर वाहिकाएं।
निरीक्षण के पश्चात चिकित्सक अपने एक हाथ में रबड़ का दस्ताना पहन कर एवं अपनी अंगुली में जैल लगाकर उसे धीरे से मलाशय की ओर प्रविष्ट करता है। ऐसा करते समय रोगी को हल्की पीड़ा या असहजता अनुभव कर
सकना संभव है।
मलाशय परीक्षण के दौरान रोगी से गुदा क्षेत्र की पेशियों को चिकित्सक की अंगुली की तरफ खींचने के लिए कहा जाता है। ऐसा करने से चिकित्सक के लिए यह जांच करना सहज हो पाता है कि व्यक्ति की गुदा एवं मलाशय की
पेशियां किस सीमा तक सुसंगत रूप से काम कर पा रही हैं।

मलाशय परीक्षण में आमतौर पर एक से पांच मिनट का समय लगता है जो चिकित्सक द्वारा किसी अपसामान्यता के नज़र आने पर निर्भर करता है। मलाशय परीक्षण हो जाने के बाद चिकित्सक सावधानीपूर्वक अपनी अंगुली गुदाद्वार से बाहर निकाल लेता है। इस प्रक्रिया में हल्का रुधिर  स्राव हो सकता है, खासतौर पर बवासीर होने की स्थिति में, इससे घबराने की ज़रूरत नहीं है।
*****प्रॉक्टोस्कोपी
कुछ मामलों में अपना आंतरिक परीक्षण करवाने के लिए प्रॉक्टोस्कोप (मलाशयदर्शी उपकरण) की ज़रूरत पड़ती है। प्रॉक्टोस्कोप एक पतली, खोखली नली जैसा उपकरण होता है जिसके एक सिरे पर रोशनी रहती है। इस उपकरण को गुदा मार्ग से मलाशय मंे प्रविष्ट कराया जाता है। इसके माध्यम से चिकित्सक समग्र गुदानाल का पर्यवेक्षण करने में और बवासीर के मस्सों का संज्ञान लेकर उनकी गंभीरता का आकलन करने में सक्षम हो पाता है।
*****बवासीर के प्रकार
गुदा परीक्षण या प्रॉक्टोस्कोपी करने के पश्चात चिकित्सक के लिए रोगी के बवासीर का प्रकार निर्धारण करना संभव हो जाता है। बवासीर के मस्से बाहर और भीतर दोनों तरफ हो सकते हैं। आंतरिक  मस्से गुदानाल के ऊपरी हिस्से के दो तिहाई भाग में होते हैं जबकि बाहरी मस्से आखिरी तीसरे हिस्से में जो गुदा द्वार के निकट होता है। निचले भाग के स्नायु दर्द का अहसास कराने में सक्षम होते हैं, ऊपरी भाग के नहीं। बवासीर के भीतरी मस्से बवासीर के आंतरिक मस्से मलाशय में इतने अंदर होते हैं कि उनका संज्ञान या उन्हें महसूस कर पाना रोगी के लिए संभव नहीं होता। उनसे तकलीफ भी नहीं होती क्योंकि मलाशय में बहुत कम दर्द संचारक स्नायु होते हैं। रुधिर स्राव ही एकमात्र ऐसा संकेत है जो उनका संज्ञान कराता है। कभी.कभी भीतरी बवासीर के मस्से लटक जाते हैं या फिर बढ़ जाते हैं और गुदा से बाहर निकलने लगते हैं। ऐसे में वे गीले, गुलाबी त्वचा की पट्टी की तरह प्रतीत होते हैं। लटकने वाले बवासीर के मस्से तकलीफ देते हैं क्योंकि कपड़ों से रगड़ने और बैठने के कारण उग्र हो जाते हैं। आमतौर पर वे खुद ब खुद गुदा के भीतर चले जाते हैं, और यदि स्वयं न भी जा पाएं तो हल्के हाथ से
उन्हें भीतर किया जा सकता है।
****बाहरी बवासीर.मस्से
बाहरी मस्से गुदा में रहते हैं और अक्सर तकलीफ देते हैं। बाहरी मस्सों के लटक जाने पर ऐसा लगता है मानों मांस का कोई लोथड़ा गुदा से लटक रहा है। ऐसा आमतौर पर मलत्याग के दौरान होता है। बाहरी लटकने वाले मस्सों में कभी कभार खून के थक्के जम जाते हैं जिसके कारण एक अत्यंत कष्टकर स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसे ‘थ्रोम्बोसिस‘ (घनास्रता) कहते हैं। बाहरी बवासीर का मस्सा घनास्रित होने पर डरावना लगता है, जामुनी या नीला पड़ जाता है और कई बार उससे खून भी रिसने लगता है। बाहर से चाहे ऐसे मस्से कितने ही भयावह क्यों न लगें घनास्रित मस्से आमतौर पर गंभीर स्थिति के नहीं होते और स्वतः लगभग एक सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। दर्द यदि असह्य हो जाए तो ऐसे मस्सों को सर्जरी से हटाया जा सकता है ताकि रोगी को आराम आ सके।
उग्रता मापन बवासीर के मस्सों के आकार और उनकी उग्रता के आधार पर सर्जन उन्हें कुछ और वर्गों में विभाजित करते हैं, जो निम्न है ---
**प्रथम स्तर के बवासीर मस्से
प्रथम डिग्री के मस्से गुदा के भीतरी अस्तर में छोटे.छोटे उद्भेदों के रूप में उभरते हैं और बाहरी तौर पर दृश्य नहीं होते।
*द्वितीय स्तरीय मस्से
द्वितीय स्तरीय मस्से बड़ी शोथ युक्त होते हैं जो मलत्याग के समय बाहर की ओर निकल आते हैं और कुछ समय बाद स्वतः भीतर चले जाते हैं।
*तृतीय स्तर के मस्से
तृतीय स्तरीय मस्से एक या अधिक छोटी मुलायम गांठों की तरह होते हैं जो गुदा से बाहर लटकने लगते हैं और उन्हें व्यक्ति हल्के हाथों से भीतर कर देता है। ये तथाकथित प्रोलैप्सिंग एण्ड रिड्यूसिबल पाइल्स कहलाते हैं।
*चतुर्थ स्तर के मस्से
चतुर्थ स्तरीय मस्से बड़े मांस के लोथड़े होते हैं जो गुदा से बाहर लटकते हैं और जिन्हें भीतर नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार ये ‘इर्रिड्यूसिबल’ कहलाते हैं। चिकित्सक के लिए यह जानना बेहतर रहता है कि रोगी किस प्रकार के बवासीर से ग्रस्त है। इस जानकारी से उपचार विधि का चयन सहज हो जाता है।
**बवासीर होने के कारण
बवासीर का सुनिश्चित कारण तो अनिश्चित है किंतु इसका सम्बंध गुदा के भीतर  व बाहरी क्षेत्र की रुधिर वाहिकाओं पर अतिरिक्त दाब से जोड़ा जा सकता है। इस दबाव के कारण पृष्ठ भाग की रुधिर वाहिकाएं सूजकर फूल जाती हैं। किसी व्यक्ति को बवासीर होने के निम्न कारक संभाव्य हो सकते हैंः
बवासीर की पारिवारिक पृष्ठभूमि-----
वैसे यह तथ्य सुनिश्चित तौर पर अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है किंतु परिवार में  किसी को बवासीर रहने पर व्यक्ति के रोग से प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है।
कब्ज--
लम्बे समय से कब्ज बने रहने पर भी मल त्याग करते समय काफी प्रयास करना पड़ता है जो बवासीर का कारण बन जाता है।
मोटापा--
जरूरत से ज्यादा वज़्ान या फिर मोटापे के कारण श्रेाणि क्षेत्र की रुधिर वाहिकाओं का दबाव पड़ता है जिससे वे संवर्द्धित हो जाती हैं और बाद में बवासीर का
कारण भी बन जाती हैं।
गर्भावस्था---
गर्भ धारण करने पर बढ़ता हुआ शिशु भी श्रोणि क्षेत्र की रुधिर बाहिकाओं पर अतिरिक्त दबाव डालने लगता है जिससे वे संवर्द्धित हो जाती हैं। गर्भावस्था के हारमोनों के कारण भी शिराएं शिथिल होकर संवर्द्धित होने लगती हैं और क्षोभग्रस्त हो जाती हैं। गर्भावस्था में हो जाने वाली बवासीर व्याधि आमतौर पर प्रसव के पश्चात कुछ ही हफ्तों में स्वयं समाप्त हो जाती है।
आयु---
आयु बढ़ने के साथ शरीर के सम्बलकारक ऊतक कमजोर पड़ने लगते हैं और इसी कमी के कारण बवासीर की आशंका बढ़ जाती है।
उदर का दबाव बढ़ाने वाली स्थितियां---
लम्बे समय तक एक ही मुद्रा मंे बैठे रहने वाले लोग, अक्सर लम्बे समय तक चलने वाली खांसी या बारबार मतली आने की शिकायत वाले व्यक्ति अथवा भारी वस्तु उठाने वाले लोगों को उदर में अधिक दबाव सहना पड़ता है और नतीजतन बवासीर की आशंका बढ़ जाती है।
जीर्ण दस्त---
लम्बे समय तक बनी रहने वाली दस्त की प्रकृति से भी व्यक्ति का बवासीर ग्रस्त होना संभव है।
*****स्वयं आजमायें
----जीवनशैली के कुछ एक बदलावों से गुदा क्षेत्र एवं मलाशय की रुधिर वाहिकाआंे पर दबाव कम किया जा सकता है और ऐसा करने पर बवासीर की तकलीफ में राहत मिलती है।
----आहारपरक बदलाव
बवासीर होने का कारण कब्ज है तो कोशिश करें कि मल ढीला रहे ताकि मलत्याग में ज़ोर न लगाना पड़े?
ऐसा करने के लिए धीरे.धीरे अपने आहार में रेशेयुक्त पदार्थ शामिल करें। फाइबर के मुख्य स्रोत हैं . गेहूं का चोकर युक्त आटा, दालें और फलियां, मेवे, जई, फल और सब्जियां। अधिक से अधिक तरल पदार्थ लें। खासतौर पर पानी।
----कब्ज का कारण बनने वाली दवाएं न लें जैसे कि दर्दनिवारक औषधियां जिनमें कोडीन विद्यमान रहता है। 
---वज़न अधिक होने पर घटाने का प्रयास करें। वजन को सीमित मात्रा में भोजन और नियमित व्यायाम करने से घटाया जा सकता है। ऐसा करने से कब्ज कम होता है और बवासीर होने की आशंका भी घट जाती है।
----नित्यकर्म प्रशिक्षण
मल त्याग करते समय गुदा की शिराओं पर जोर न डालें। जोर डालने पर बवासीर और बिगड़ जाती है।
मलत्याग की इच्छा को टालें नहीं, निवृत्त होने की बजाय मल रोक लेने से वह सख्त पड़ जाता है और सूख भी जाता है जिससे नित्यकर्म से निवृत्त होनेमें जोर  लगाना पड़ता है।
इन सभी सावधानियों को अपनाने से भविष्य में  दोबारा बवासीर होने से बचाव संभव है।
(अगले माहः ‘बवासीर का उपचार - घरेलू उपाय तथा सर्जरी विधियां’)
लेखक ---डॉ यतीश  अग्रवाल 
(अनुवादः कुंकुम जोशी)