India’s just over 1% public health expenditure as a percentage of GDP is even lower than that of our poorer neighbouring countries, such as Sri Lanka, Bhutan and Nepal.
Friday, 3 July 2020
Wednesday, 1 July 2020
सर्पदंश - प्रथम उपचार तथा निगरानी
सर्पदंश
सर्पदंश - प्रथम उपचार तथा निगरानी
डॉ. यतीश अग्रवाल
सर्पदंश के कारण मानव जीवन की हानि को बहुत हद तक कम किया जा सकता है अगर इस घटना के तुरंत बाद व्यर्थ के वैकल्पिक उपचारों में समय व्यर्थ न किया जाए। पीड़ित को नजदीकी स्वास्थ्य सुविधा केंद्र पर पहुंचना जरूरी होता है। वहां पर चिकित्सक पीड़ित की हालत की जांच करके आगे की उपयुक्त चिकित्सा
शुरू कर सकता है।
सर्पदंश से भारत में प्रति वर्ष 50,000 व्यक्तियों की जान जाती है। अगर पारम्परिक, परन्तु अनुपयोगी तरीकों में समय व्यर्थ न गंवाया जाए तथा पीड़ितों को समय रहते उचित उपचार उपलब्ध कराया जाए, तो उनमें से कई लोगों की जान बचाई जा सकती है। एक डॉक्टर ही पीड़ित की स्वास्थ्य स्थिति का आकलन कर उसके अनुरूप उपचार विधि तय कर सकता है। कई मामलों में सर्पदंश से जीवन को हानि नहीं हो सकती। आंकड़ों के मुताबिक सर्पदंश के 70 प्रतिशत मामले विषहीन सांपों द्वारा होते हैं। विषैले सांपों में भी सिर्फ 50 प्रतिशत मामलों में ही
पीड़ित की जान जाने का खतरा होता है। उपचार विधि स्वास्थ्य की स्थिति के आधार पर निर्भर करती है। अगर सांप का काटा गंभीर नहीं है, तो डॉक्टर सिर्फ घाव की सफाई कर टाइटेनस रोधी टीका दे सकते हैं। इसके विपरीत अगर स्थिति जानलेवा है तो डॉक्टर विषरोधी दवा देने के बारे में विचार कर सकते हैं। विषरोधी दवा सांप के विष की प्रतिरोधी दवा होती है। इसे तैयार करना काफी मशक्कत भरा काम होता है, जिसमें सर्पदंश को
जानवरों, विशेषकर घोड़ों में इंजेक्शन द्वारा डालकर, जानवर के प्रतिरक्षा तंत्र में पैदा हुए प्रतिरक्षी को निकाल कर इसे तैयार किया जाता है। जानवरों के खून में विष मिलने के करीब आठ से दस हफ्ते बाद विषरोधी दवा तैयार होती है। इसे निकालने के लिए जानवरों के शरीर से खून निकाला जाता है और उसे पेचीदी प्रक्रिया द्वारा साफ किया जाता है। विषरोधी दवाएं काफी कीमती होती हैं, लिहाजा उनका प्रयोग सोच.समझकर करना चाहिए। अगर विषरोधी दवा उचित तरीके से और समय रहते दी जाए, तो ये जिंदगी बचाने में मददगार हो सकती है। जिन हालात में इन्हें देना आवश्यक है, वहां जितनी जल्दी इन्हें दिया जाए, उतने ही अच्छे परिणाम मिलते हैं। अगर स्थिति बेकाबू न हो, तो जिन स्वास्थ्य केन्द्रों या अस्पतालों में विषरोधी दवा उपलब्ध है, वे इन गंभीर परिस्थितियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकते हैं। विवेकपूर्ण प्रथम उपचार विधि अगर आपके परिवार के किसी सदस्य, पड़ोसी या किसी परिचित को सर्पदंश का शिकार होना पड तो जितनी जल्दी हो सके निकटवर्ती स्वास्थ्य केन्द्र में आपातकालीन उपचार आवश्यक है।
अगर सांप काटे के स्थल का रंग परिवर्तित होने लगे, सूजन आ जाए, या दर्द हो, तो आपातकालीन उपचार अनिवार्य है। जब तक मुकम्मल उपचार शुरु नहीं होता, तब तक निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिएः
धीरज रखें
धीरज रखें और जिस स्थल पर सांप ने काटा है, वहां से पीड़ित को दूर हटाएं। पीड़ित को धीरज बंधाएं, और उसकी व्यग्रता दूर करने की कोशिश करें। उसे ये बताएं कि अधिकांश सांप विषहीन होते हैं। डर, तनाव तथा उत्तेजना से दिल की धड़कन और रक्त प्रवाह तेज होते हैं। ऐसा होने पर विष शरीर में तेजी से फैलता है।
समय नोट करें
सांप के काटने का समय नोट करें। ये छोटी सी सूचना इलाज में डॉक्टर के लिए काफी महत्त्वपूर्ण साबित हो सकती है।
सांप का पीछा न करें
सांप को पकड़ने, मारने या उसका पीछा करने में समय बर्बाद न करें। हो सके, तो सांप की तस्वीर ले लें। या उसका रंग और आकार याद कर लें, जिसे डॉक्टर को बताया जा सके। अगर कोई सांप को मार भी देता है, तो उसे भी अस्पताल ले जाएं। इससे डॉक्टर को सांप का प्रकार पहचानकर उसके अनुरूप उपचार विधि सुनिश्चित करने में आसानी होगी। सभी तरह की शारीरिक क्रिया बंद कर दें आदर्श तो ये होता है कि सर्पदंश के शिकार
व्यक्ति को बिलकुल शांत बैठना चाहिए। उसे टहलना नहीं चाहिए। अगर सुरक्षित हो तो फर्श पर सीधा लेट जाना चाहिए तथा इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि शरीर के काटे हुए हिस्से को छाती से ऊपर न ले
जाएं, अन्यथा विष तेजी से शरीर में फैलने लगेगा। पीड़ित को किसी वाहन में निकटवर्ती स्वास्थ्य केन्द्र में ले जाना चाहिए। पीड़ित के शरीर में किसी भी प्रकार की गतिशीलता से विष शरीर में तेजी से फैलेगा।
घाव मत धोएं
अक्सर काटे गए अंग की सतह से विष हटाने के लिए पीड़ित व्यक्ति, परिवार का सदस्य या मददगार पहले घाव को धोने के विषय में सोचता है। ये घातक है। इससे शरीर में विष फैलने की प्रक्रिया तेज होती है। लिहाजा ऐसा करने से परहेज करना चाहिए।
चुस्त कपड़े और गहने हटाएं
अगर सांप के काटने के स्थल पर चुस्त कपड़े, जूते, अंगूठी, घड़ी या आभूषण हैं तो सूजन से पहले ही उन्हें हटा लेने की कोशिश करें। सांप के काटने के कारण आसपास की जगह में सूजन हो सकती है और ये वस्तुएं रक्त प्रवाह अवरुद्ध कर सकती हैं।
पीड़ित अंग को गतिहीन बनाएं
शरीर के जिस अंग में सांप ने काटा है, उसे तख्ती (स्प्लिंट) या गल.पट्टी (स्लिंग) बांधकर गतिहीन बनाएं। इसके लिए पट्टी या कपड़े का प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन ये सावधानी बरतनी चाहिए कि इससे काटे हुए अंग पर दबाव न पड़े और रक्त प्रवाह न रुके। चुस्त बंधन द्वारा किसी तरह का दबाव न बनाएं। इससे कोई लाभ नहीं होता, उल्टे हानि हो सकती है। स्प्लिंट के प्रयोग का उद्देश्य गति तथा मांसपेशियों में संकुचन रोकना है। क्योंकि इससे रक्त और लसीका तंत्र में विष का घुलना बढ़ सकता है।
काटे हुए अंग को न बांधें
काटे हुए अंग के आसपास बांधकर रक्त प्रवाह को न रोकें। पारम्परिक तरीकों में लोग सांप के विष
को शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने से रोकने के लिए काटे हुए अंग के आसपास रस्सी, बेल्ट, सुतली या
कपड़ा बांध देते हैं। उपचार के ऐसे पारम्परिक तरीके के प्रयोग की अनुमति नहीं दी जाती। इससे कोई लाभ नहीं होता। अक्सर ये विष को फैलने से रोकने में नाकाम रहते हैं। दूसरी बात, कि इससे पीड़ित और उसके परिजनों में सुरक्षा की झूठी भावना घर करती है, जिससे अस्पताल पहुंचने में देरी होती है। तीसरी बात, कि इस प्रक्रिया में कई तरह के जोखिम और पेचीदगी का भय होता है। अगर पट्टी को अधिक कसकर बांधा गया तो प्रभावित अंग में रक्त प्रवाह पूरी तरह बंद हो सकता है, जिससे वह अंग गल सकता है। भारत में सर्पदंश के मामलों में ये बात
अक्सर होती है। सबसे बुरा तो तब होता है, जब चुस्त बंधन को ढीला किया जाता है। विष मिले हुए तेज रक्त प्रवाह से तंत्रिका पक्षाघात हो सकता है, रक्त दाब कम हो सकता है या रक्त का थक्का जम सकता है दृप्रभाव की विशिष्टता विष के प्रकार के अनुसार होती है।
काटी हुई जगह पर बर्फ के प्रयोग से परहेज
काटी हुई जगह को ठंडा करने के लिए बर्फ का प्रयोग न करें।
विष दूर करने की कोशिश न करें
सांप के काटे हुए स्थल पर कट न लगाएं और मुंह से चूसकर विष निकालने की कोशिश न करें। चूषण कार्य के लिए पम्प का भी इस्तेमाल न करें। पहले सांप का जहर निकालने के लिए चूषण विधि का प्रयोग किया जाता था, लेकिन ये उपयोगी नहीं है और इस विधि से लाभ के बजाय नुकसान हो सकता है। पीड़ित के दंश प्रभावित अंग में कट लगाने से रक्तस्राव बढ़ सकता है और विष के कारण रक्त का थक्का जमने की सामान्य प्रक्रिया रुक सकती है। साथ ही कट लगाने से पीड़ित में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
कैफीन या अल्कोहल से परहेज
पीड़ित को चाय, कॉफी या एल्कोहल का पान नहीं करना चाहिए। इससे शरीर में विष फैलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
पारम्परिक उपचारक लाभदायक
नहीं हो सकते
पारम्परिक उपचारकों पर वक्त बर्बाद करने का कोई लाभ नहीं है। उन उपचारों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। उनके क्रियाकलाप मनोवैज्ञानिक स्तर पर लाभदायक हो सकते हैं, लिहाजा विषहीन सांपों के काटे जाने पर वो कारगर साबित हो सकते हैं।
बेवजह दवाएं न लें
पीड़ित को बिना डॉक्टर के निर्देश के कोई दवा न दें। जब तक डॉक्टर न कहें, तब तक पीड़ित को कोई दवा न दें। घरेलू तथा पारम्परिक दवाएं संक्रमण बढ़ा सकती हैं और इलाज के रास्ते में भी परेशानियां खड़ी कर सकती हैं।
निकटवर्ती अस्पताल पहुंचें
जिस व्यक्ति को सांप ने काटा है उसे तुरंत निकटवर्ती सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र या अस्पताल पहुंचाना चाहिए।पारम्परिक दवाएं देने में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। सर्पदंश के उपचार में वे लाभदायक साबित नहीं हुए हैं और प्रभावशाली उपचार में बिला वजह विलम्ब खतरनाक साबित हो सकता है।
अस्पताल ले जाते समय मरीज पर नजर रखें
जिस समय मरीज को निकटवर्ती अस्पताल ले जाया जा रहा हो, उसकी शारीरिक गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए रखें। अगर उसके शरीर में कोई नया लक्षण दिखे, जैसे पलकें बंद होना, तो अस्पताल पहुंचने पर तुरंत उसके बारे में डॉक्टर को बताएं। अस्पताल के रास्ते में मरीज को अगर सदमा पहुंचने का संकेत मिलता है तो स्वास्थ्य कार्यकर्ता उसे जिन्दा रखने के लिए प्रथम उपचार की मदद ले सकते हैं। एक बात याद रखनी चाहिए कि जितनी जल्दी हो सके अस्पताल पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। व्यर्थ बिताए गए हर पल से वांछित परिणाम
प्राप्त करने में परेशानी बढ़ेगी। सर्पदंश से होने वाली कई मौतें स्वास्थ्य केन्द्र पहुंचने में देरी की वजह से होती हैं।
निरीक्षण करना -
इन लक्षणों पर निगाह रखें
परिदृश्य 1ः जब शरीर में विष नहीं पहुंचा हो कुछ लोगों को शक होता है या वे कल्पना कर लेते हैं कि उन्हें सांप ने काट खाया है, या उन्हें वास्तव में सांप ने काटा हो, तो उनमें कुछ विशेष लक्षण दिख सकते हैं, इसके बावजूद कि उनके शरीर में विष नहीं गया हो।
भय तथा उत्तेजना के कारण दिखने वाले लक्षण
अधिक उत्तेजना के कारण मरीज तेज सांस लेने लगता है। चरम स्थिति में उसे सुई चुभोने सरीखा महसूस होता है, हाथों और पैरों में अकड़न होती है, और आंखें उनींदी होने लगती हैं। कुछ मरीजों को वैसोवेगल सदमा हो सकता है, जिसके कारण उन्हें चक्कर आने लगता है और दिल की धड़कन बहुत धीमी होने के कारण बेहोशी छा जाती है। कुछ मरीजों में झुंझलाहट पैदा होती है, जिसके कारण भ्रामक लक्षण दिख सकते हैं। रक्त दबाव और
स्पंदन दर बढ़ सकती है, जिसके कारण पसीना होना तथा सिहरन हो सकती है। ये लक्षण विशुद्ध रूप से
उस भय के कारण पैदा होते हैं, कि एक विषैले सांप ने काट खाया है।
गलत प्रथम उपचार तथा पारम्परिक इलाज के कारण उत्पन्न होने वाले लक्षण----
गलत प्रथम उपचार तथा पारम्परिक इलाज के कारण भी महत्त्वपूर्ण लक्षण पैदा हो सकते हैं। पट्टी या तख्ती के दबाव के कारण दर्द तथा सूजन पैदा हो सकती है एवं रक्त प्रवाह रुक सकता है। आयुर्वेदिक दवाएं खाने से उल्टियां हो सकती हैं। पौधों का रस आंख में डालने पर नेत्र.शोथ की बीमारी हो सकती है। श्वसन नलिका में जबरदस्ती तेल प्रवाहित करने से न्यूमोनिया या ब्रोन्कोस्पाज्म हो सकते हैं, कानों के ड्रम को नुकसान पहुंच सकता है और न्यूमोथ्रैक्स हो सकता है। काटने, दागने, गर्म तरल में डुबोने और आग पर सेंकने के कारण भयानक जख्म हो सकता है।
परिदृश्य 2ः
जब शरीर में विष का प्रवेश हुआ हो
प्रारम्भिक लक्षण
सर्पदंश से त्वचा पर तुरंत दर्द शुरु हो सकता है, जिसके बाद सर्पदंश की जगह जलन, दरार और तेज दर्द हो सकते हैं। सर्पदंश की जगह सूज सकती है, जो धीरे.धीरे बढ़कर दूसरे अंगों में भी फैल सकती है । दर्द भरी सूजन से लसिका पर्व यानि लिम्फ नोड में गांठ पड़ सकती है। हालांकि करैत, समुद्री सांप और कोबरा के कुछ प्रकारों के सर्पदंश में दर्द नहीं भी हो सकता है तथा सर्पदंश की जगह सूजन भी काफी कम हो सकती है। अक्सर करैत के काटने पर सोया हुआ व्यक्ति नींद से जागता भी नहीं और हो सकता है कि सर्पदंश के स्थान पर काटे का कोई निशान भी न दिखे।
विष फैलने के लक्षण------
सांपों की प्रजाति तथा शरीर में गए विष केआधार पर सर्पदंश के लक्षण भिन्न हो सकते हैं। कभी.कभार मृत सांप की जांच कर उनकी पहचान कर ली जाती है। मरीज के दिये विवरण, या सर्पदंश की परिस्थितियों अथवा उस सांप की प्रजाति के विष की जानकारी होने से भी कुछ अंदाजा लग सकता है।
काटने वाले सांप के बारे में दी गई सूचना-------
डॉक्टर के लिए सही विषरोधी दवा चुनने में मददगार साबित हो सकती है। वह आगामी परिस्थितियों का आकलन कर सकता है, तथा उसके आधार पर उपचार विधि सुनिश्चित कर सकता है। अगर काटने वाले सांप के बारे में जानकारी नहीं मिलती, तो मरीज और उसके लक्षणों की गहन निगरानी की जानी चाहिए तथा प्रयोगशाला में जांच के नतीजों का आकलन करना चाहिए। इन परिणामों को दूसरे सबूतों के साथ संयोग कर अनुमान लगाया
जा सकता है कि सांप की किस प्रजाति ने काटा है।
काटी गई जगह पर स्थानीय लक्षण------
- दंत छिद्र का निशान
- काटे गए अंग पर दर्द
- काटे गए स्थान से रक्तस्राव तथा जलन
- लसिका वाहिनी शोथ या लिम्फैन्जाइटिस (काटे
गए अंग पर लाल धारी बनना)
- लिम्फ नोड में सूजन
- सूजन, लाल पड़ना, जलन
स तेज दर्द, संक्रमण, पस बनना तथा उतकों का
गलना
सामान्यीकृत लक्षण और चिह्न-------
सामान्य।--
उबकाई आना, उल्टी होना, बेचौनी, पेट में दर्द,
कमजोरी, उनींदापन, तथा खिन्नता।
परिसंचारी लक्षण---
वाइपराइड प्रजाति के विषैले सांप के काटने से
देखने में परेशानी, धुंधलापन, चक्कर आना, बेहोशी छाना, सदमा पहुंचना, रक्त दाब कम होना, दिल की धड़कन में अनियमितता, फेफड़ों में पानी भरना और आंखों का लाल होकर सूजना जैसे लक्षण दिखते हैं।
रक्त स्राव और थक्का जमने में परेशानी---
वाइपराइड प्रजाति के विषैले सांपों के काटने पर सर्पदंश के स्थान से लगातार रक्तस्राव होता है, नसें कट जाती हैं, और अगर पुराने घाव हों तो उनसे भी रक्तस्राव शुरु हो जाता है। इनके अलावा पीड़ित के मसूड़ों से नियमित
रूप से खून आ सकता है, नाक बह सकती है, दिमाग और फेफड़ों से रक्तस्राव हो सकता है, खून की उल्टियां हो सकती हैं, गुदा से खून आ सकता है, रक्तमेह हो सकता है, योनि से खून आ सकता है, आंखों, त्वचा तथा रेटिना में भी खून आ सकता है।
वेस्टर्न रशेल वाइपर या डैबोइरसली के काटने पर कभी.कभी दिमाग की धमनी जाम हो जाती है।
तंत्रिका लक्षण---
विषैले सांपों, जैसे एलापिडा प्रजाति के कोबरा और रशेल वाइपर के काटने पर तंत्रिका से जुड़ी परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे उनींदापन, अकड़न तथा सिहरन, स्वाद तथा गंध में अनियमितता, आंखों में भारीपन, पुतलियों का गिरना, पुतलियों की बाहरी मांसपेशियों में पक्षाघात, चेहरे की मांसपेशियों में पक्षाघात, कपाल की नसों से संचालित मांसपेशियों में पक्षाघात, नाक से आवाज निकलना, बोलने में परेशानी, नाक से पानी बहना, स्राव निगलने में परेशानी, सांस लेने में परेशानी तथा शिथिलता।
कंकालीय मांसपेशियों के लक्षण----
समुद्री विषैले सांप तथा करैत की कुछ प्रजातियों जैसे बंगरास्नाइगर और बी कैंडिडस, वेस्टर्न रशेल वाइपर दबोइआ रसेली के काटने पर मांसपेशियों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। तेज दर्द हो सकता है, मांसपेशियों में कभी अकड़न तो कभी शिथिलता हो सकती है, जबड़ों में अकड़न हो सकती है, मूत्र में मायोग्लोबिन आ सकता है, रक्त में पोटैशियम का अनुपात सामान्य से काफी अधिक हो सकता है, हृदय गति रुक सकती है तथा गुर्दा काम करना बंद कर सकता है।
गुर्दे से जुड़े लक्षण----
वाइपराइड प्रजाति या समुद्री सांप के काटने पर पीठ में दर्द हो सकता है, मूत्र में खून आ सकता है, मूत्र में हीमोग्लोबिन बढ़ सकता है, मूत्र में मायोग्लोबिन आ सकता है, मूत्र बनना बंद हो सकता है तथा गुर्दे की प्रक्रिया बंद होने के लक्षण देखने को मिलते हैं। इनमें पीड़ित को अम्लता की शिकायत, सांस लेने में परेशानी, हिचकी आना, नाक बहना और छाती में दर्द की शिकायत हो सकती है। अंतरूस्रावी लक्षण रशेल वाइपर के काटने पर कफ ग्रंथि और गुर्दे की कार्यक्षमता कम हो जाती है। गंभीर स्थिति में सदमा लग सकता है तथा रक्त शर्करा में अत्यधिक कमी आ सकती है। सर्पदंश के महीनों और सालों बाद तक पीड़ित को कमजोरी, पशम बालों का झड़ना, नपुंसकता, मासिक धर्म में अनियमितता, अंडकोष का आकार घटना तथा हायपोथायरायडिज्म की शिकायत रहती है।
सर्पदंश का उपचार----------
सर्पदंश के शिकार व्यक्ति का विस्तृत नैदानिक आकलन और जांच के पश्चात डॉक्टरों की टीम उपचार का सर्वश्रेष्ठ उपाय सुनिश्चित कर सकती है। कुछ जहरीले सांपों का काटना जानलेवा नहीं होता। सर्पदंश की गंभीरता काटे गए अंग, शरीर में विष की मात्रा, उम्र तथा पीड़ित के स्वास्थ्य पर निर्भर करती है।
अगर स्थिति जान लेने जैसी गंभीर हो, तो डॉक्टर विषरोधी दवा दे सकते हैं। विषरोधी उपचार से विष के फैलने से रुकने तथा शरीर के अन्य अंगों के प्रभावित होने से बचने के कारण स्वास्थ्यलाभ की उम्मीद की जाती है। हालांकि इस प्रक्रिया म समय लगता है तथा सांप के जहर से गंभीर रूप से पीड़ित व्यक्ति को जीवन समर्थक प्रणाली, जैसे सदमे का उपचार, वेंटिलेशन की सहायता, तथा गुर्दे का डायलिसिस जैसी प्रक्रियाओं की उस समय तक मदद लेनी पड़ सकती है, जब तक प्रभावित अंगों का नुकसान दूर नहीं हो जाता।
सर्पदंश के शिकार व्यक्ति का बाहरी अवलोकन------
सर्पदंश के शिकार व्यक्ति का बाहरी अवलोकन परिवर्तनीय होता है। विषहीन सांपों के काटने पर बाहरी अवलोकन में कोई अन्तर नहीं आता, अगर घाव की सफाई कर उसका उचित इलाज किया जाता है। जहरीले सांप के काटने पर भी बाहरी अवलोकन ठीक रह सकता है, अगर पीड़ित को सर्पदंश के तुरंत बाद आपात उपचार उपलब्ध कराया जाए। बच्चों, कमजोर प्रतिरोधी क्षमता वाले व्यक्तियों और गहराई तक दंश का शिकार होने वालों की तुलना में सर्पदंश का हलका शिकार होन वाले, स्वस्थ वयस्कों का बाहरी अवलोकन बेहतर रहता है।
सर्पदंश से बचाव----
कई मामलों में सर्पदंश से बचा जा सकता है। बीहड़ स्थल में सांपों के करीब नहीं आना चाहिए तथा उन्हें नहीं छेड़ना चाहिए। जिन जगहों पर सांपों के होने की आशंका हो, वहां जाने से बचना चाहिए, जैसे लम्बी घास से भरे मैदान, पत्तियों का जमावड़ा, चट्टान और लकड़ियों के गट्ठर इत्यादि। फिर भी सामने सांप आ जाएं तो उन्हें निकलने के लिए जगह देनी चाहिए और उन्हें छिपने देना चाहिए। सांपों की प्रकृति इंसानों से दूर रहने की होती है। जब घर के बाहर कार्य करना पड़े, जहां सांपों के छिपे होने की संभावना हो, तो ऊंचे जूते, पूरी लम्बाई की पैंट और चमड़े के दस्ताने पहनें। रात में गर्मियों में घर के बाहर काम करने से बचें, क्योंकि यही वो समय है, जब सांप सर्वाधिक सक्रिय होते हैं।
(अनुवादः अगस्त्य अरूणाचल)
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम- कारण, आरंभक, खतरे के संकेत तथा अन्य जानकारी
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम- कारण, आरंभक, खतरे के संकेत तथा अन्य जानकारी
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम (उत्तेजनीय आंत्र सिन्ड्रोम) नामक एक सामान्य आंत्र विकार जो बड़ी आंत को प्रभावित करता है, एक दीर्घकालिक समस्या है जो लोगो के जीवन जीने के तरीके को परिवर्तित कर सकती है। अधिक प्रचलित रूप से अपने संक्षिप्त नाम आईबीएस से पहचाने जाने वाले इस विकार के संकेत और लक्षण आंतों में मरोड़ का होना है, जो व्यक्ति को अत्यधिक असहज कर देता है। य़द्यपि एक अच्छी बात ये है कि इससे जीवन के लिए खतरा नहीं होता है और कुछ अन्य आंत्र विकारों जैसे अल्सरेटिक कोलाइटिस के
विपरीत इस से आंत के ऊतकों में कोई परिवर्तन नही होता है और न कोलोरेक्टल (वृहदांत्र मलाशयी) कैंसर का जोखिम बढ़ता है। लाखों व्यक्ति इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम से पीड़ित होते हैं। इनमें से अधिकतर महिलाऐं हैं। लोगों में अधिकतर यह स्थिति युवावस्था से 40.45 वर्ष की उम्र तक हो सकती है। इसमें सामान्यतः पेट में तकलीफ, पेट में मरोड़ अथवा पेट में दर्द, पेट फूलना, गैस, शौच करने में दिक्कतें हो सकती हैं जिनसे या तो
डायरिया (अतिसार/दस्त) अथवा कब्ज हो सकता है तथा पतले, कठोर अथवा मृदु और तरल मल का उत्सर्जन हो सकता है।
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम से पीड़ित बहुत कम लोगों में ही गंभीर संकेत और लक्षण प्रकट होते हैं। कुछ लोग सिर्फ अपने आहार, जीवनशैली और तनाव को प्रबंधित करके लक्षणों को नियंत्रित कर लेते हैं।
लेकिन बहुतों में यह जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं। वे अपने कार्य अथवा विद्यालय से अकसर अवकाश ले
सकते हैं और दैनिक कार्यकलापों में भाग लेने में कम सक्षम महसूस कर सकते हैं। कुछ व्यक्तियों को अपनी
कार्यव्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता हो सकती है, और वे घर से कार्य कर सकते हैं अथवा काम के समय
में परिवर्तन कर सकते हैं अथवा काम करना बंद कर सकते हैं। कुछ को चिकित्सा उपचार और परामर्श की
आवश्यकता होती है.
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के क्या कारण हैं?
यह ज्ञात नहीं है कि यथार्थ रूप से इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम किस कारण होता है, लेकिन अनेक कारक इसमें भूमिका निभाते हैं। आंतो की भित्तियां पेशियों की परतों से अस्तरित रहती हैं जो एक समन्वित लय में संकुचन करती और शिथिल होती हैं और ये भोजन को आमाशय से आंत्र पथ से होकर मलाशय तक पहुंचाती हैं। इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम से पीड़ित व्यक्ति में ये संकुचन अधिक प्रबल और सामान्य से अधिक लंबी अवधि तक जारी रह सकते हैं, जिससे गैस, पेट फूलना और डायरिया हो सकते हैं। अथवा इसका उलटा भी हो सकता है
जिसमें आंत्रीय संकुचन निर्बल होते हैं जिससे भोजन का पथ मंद हो जाता है और कठोर; शुष्क मल का उत्सर्जन होता है।
जठरांत्रीय तंत्रिका तंत्र में असमान्यताएं भी इसमें भूमिका निभाती है, जिसमें व्यक्ति गैस अथवा मल के कारण पेट फूलने पर सामान्य से अधिक कष्ट का अनुभव करता है। मस्तिष्क और आंतों के बीच कम समन्वित संकेतों के कारण भी शरीर उन परिवर्तनों के लिए जरूरत से अधिक प्रतिक्रिया करता है जो सामान्यतः पाचन प्रक्रिया में होते हैं। इस अतिप्रतिक्रिया से पेटदर्द, मरोड़, पेट फूलना और डायरिया अथवा कब्ज हो सकती है।
ट्रिगर/आरंभक
वे उद्दीपन जो अन्य व्यक्तियों को प्रभावित नहीं करते हैं, इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम वाले व्यक्तियों में लक्षण प्रगट कर सकते हैं लेकिन इस स्थिति से पीड़ित सभी व्यक्ति किसी एक उद्दीपन के लिए एक ही तरीके से व्यवहार नहीं करते हैं। सामान्य आरंभकों में सम्मिलित हैं:
तनाव
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम से पीड़ित अधिकांश व्यक्ति यह पाते हैं कि उनके संकेत और लक्षण
िाक तनाव की स्थितियों जैसे किसी आने वाले परिणाम के सप्ताहों अथवा नए रोजगार के आरंभिक सप्ताहों में
अधिक होते हैं। यद्यपि, तनाव लक्षणों को बढ़ा सकता है, लेकिन यह संभवतः प्रमुख ट्रिगर नहीं है।
हार्मोन
चूंकि अधिकांशतः पीड़ित महिलाएं होती है, अतः चिकित्सा अनुसंधानकर्ता ये मानते हैं कि हार्मोनों में परिवर्तन संभवतः इस स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अनेक महिलाएं यह पाती हैं कि इसके संकेत और लक्षण उनके मासिक चक्र के समय अथवा उसके आसपास अधिक उग्र हो जाते हैं।
जीवाणु और आंत्र संक्रमण
कभी.कभी अन्य रोग जैसे संक्रामक डायरिया (गेस्ट्रोएन्टराइटिस) अथवा आंत में जीवाणवीय अतिवृद्धि भी इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम को आरंभ कर सकते हैं।
भोजन
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम में खाद्य.पदार्थ एलर्जी अथवा असहनशीलता की भूमिका अभी तक स्पष्ट रूप
से नहीं समझी जा सकी है, लेकिन अनेक व्यक्तियों में कुछ विशेष खाद्य पदार्थों को खाने पर गंभीर लक्षण प्रगट
हो सकते हैं। अनेक खाद्य पदार्थ इसे प्रभावित करते पाए गए हैं- फलियां, पत्तागोभी, फूलगोभी, ब्रोकली,
मसाले, वसा, फल, दूध, कार्बनीकृत पेय, चॉकलेट और ऐल्कोहॉल आदि इनमें से हैं।
किसे जोखिम है?
अनेक व्यक्तियों में कभी.कभार इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के संकेत और लक्षण प्रगट होते हैं, लेकिन निम्नलिखित व्यक्तियों में इसके होने की अधिक संभावना होती है।
युवा वयस्क
45 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों में इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के होने की अधिक प्रवृत्ति होती है।
महिलाएं
महिलाओं में पुरुषों की तुलना में इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के विकसित होने की लगभग दोगुनी संभावना
होती है।
पारिवारिक इतिहास
अध्ययन सुझाते हैं कि जिन व्यक्तियों के परिवार के किसी सदस्य को इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम हो उनमें इसके होने का जोखिम अधिक होता है। जोखिम पर पारिवारिक इतिहास का प्रभाव जीन्स से, पारिवारिक परिवेश के सामूहिक कारकों से अथवा दोनों से संबंधित हो सकता है।
मनोवैज्ञानिक समस्याएं
चिन्ता, अवसाद, व्यक्तित्व विकार और बचपन में यौन दुर्व्यवहार का इतिहास जोखिम के कारक हैं।
महिलाओं के लिए, घरेलू दुर्व्यवहार भी जोखिम का एक कारक हो सकता है।
संकेतों और लक्षणों की पहचान करना
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के संकेत और लक्षण भिन्न लोगों में अत्यधिक भिन्न होते हैं और अन्य रोगों के लक्षणों के सदृश हो सकते हैं। सबसे सामान्य
लक्षणों में हैः
* डायरिया (अक्सर उग्र डायरिया के रूप में वर्णित
किया जाता है)
* कब्ज
* कब्ज और डायरिया एकांतरी रूप से होते हैं; लेकिन यह एक ऐसा संकेत है जो अधिक गंभीर स्थिति को प्रदर्शित कर सकता है और पीड़ित व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा परामर्श के लिए प्रेरित करना चाहिए
* पेट में दर्द अथवा मरोड़, सामान्यतः पेट के निचले भाग में होता है, जो खाने के बाद और अधिक हो
जाता है तथा मल त्याग के बाद बेहतर महसूस होता है
* अत्यधिक गैस अथवा पेट फूलना
* सामान्य से अधिक कड़ा अथवा ढीला मल (पत्रक अथवा चपटे फीते जैसा मल)
* मल में श्लेश्म का होना
* बवासीर का बढ़ जानाः डायरिया और कब्ज, दोनों इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के लक्षण हैं, जो बवासीर को भी बढ़ा सकते हैं
* तनाव स्थिति को और अधिक बिगाड़ सकता है।
* कुछ व्यक्तियों में मूत्र रोग के लक्षण अथवा यौन समस्याएं भी हो जाती हैं।
प्रारूपिक रूप से चार प्रकार की स्थितियां होती हैं।
--कब्ज के साथ आईबीएस सी (IBS-C)
--और डायरिया के साथ आईबीएस डी (IBS-D हो सकता है। कुछ व्यक्तियों में कब्ज और डायरिया
का एकांतरी पैटर्न दिखाई देता है। यह मिश्रित आईबीएस (IBS-M) कहलाता है। अन्य व्यक्ति जो
आसानी से श्रेणियों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं उन्हें अउपप्रकारित (Unsubtyped) आईबीएस अर्थात
(IBS-U) कहा जाता है।
परिणाम
अधिकांश व्यक्तियों के लिए, इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम एक गंभीर स्थिति है, लेकिन कभी.कभी संकेतों और लक्षणों के अत्यधिक उग्र हो जाने और कभी बेहतर हो जाने अथवा पूर्णतः लुप्त हो जाने की संभावना रहती है।
इस स्थिति का व्यक्ति के जीवन की समग्र गुणवत्ता पर प्रभाव इसकी सबसे प्रमुख जटिलता हो सकती है। यदि व्यक्ति आईबीएस के कारण कुछ खाद्य पदार्थों को खाना छोड़ दें, तो संभव है कि उन्हें अपनी आवश्यकतानुसार पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाएगा, जिससे वे कुपोषण से पीड़ित हो सकते हैं। आईबीएस के इन प्रभावों से व्यक्ति यह महसूस कर सकते हैं कि वे अपना जीवन संपूर्णता से नहीं जी पा रहे हैं, जिससे वे हतोत्साहित अथवा अवसादग्रस्त हो जाते हैं।
चिकित्सक के पास कब जाएं
यद्यपि अनेक वयस्क इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के संकेतों और लक्षणों का अनुभव करते हैं, लेकिन लक्षणों से ग्रसित पांच में से एक से भी कम व्यक्ति चिकित्सीय सहायता लेते हैं। यदि किसी व्यक्ति की आंत्रीय प्रवृत्तियों में स्थायी परिवर्तन हो जाता है अथवा कोई अन्य संकेत या लक्षण दिखाई देता है; तो यह महत्वपूर्ण है कि वह चिकित्सक के पास जाए क्योंकि ये लक्षण अधिक गंभीर स्थिति जैसे वृहदांत्र (कोलन) कैन्सर का संकेत हो सकते हैं।
यदि चिकित्सक अधिक गंभीर स्थितियों को नकार कर इरीटेबल बाउल सिन्ड्रोम के निदान की पुष्टि करने में सफल होता है तो वह लक्षणों से राहत में सहायता कर सकता है और साथ ही उपचार भी बता सकता है, जिससे उन संभावित जटिलताओं से बचा जा सके जो संभवतः गंभीर डायरिया के कारण हो सकती हैं।
खतरे के संकेत
कुछ संकेत और लक्षण अधिक गंभीर स्थिति को इंगित कर सकते हैं। यदि आपको इनमें से कोई भी
खतरे के लक्षण दिखाई देते हैं तो आपको चिकित्सक के पास जाने में विलम्ब नहीं करना चाहिए। इन लक्षणों में सम्मिलित हैंः
* 50 वर्ष की आयु के बाद रोग का पुनः हमला
* वजन घटना
स मलाशय से रक्तस्त्राव
* ज्वर
* जी मिचलाना अथवा बार.बार उबकाई आना
* पेट में दर्दः विशेष रूप से यदि मल निवृत्ति से
पूर्ण आराम नहीं मिलता है अथवा रात के समय
दर्द होता है
* डायरिया जो स्थायी रूप से रहता है और आपको
नींद से जगा देता है।
* आयरन की कमी से सबंन्धित एनीमिया (रक्ताल्पता)
किस चिकित्सक को दिखाएं?
यदि आप में इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के लक्षण दिखाई देते हैं, तो आपको अपने पारिवारिक चिकित्सक अथवा आन्तरिक रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए। आरंभिक जांच के बाद आपके पारिवारिक चिकित्सक आपको जठरांत्र रोग विशेषज्ञ के पास भेज सकते हैं।
एक जठरांत्र रोग विशेषज्ञ वह विशेषज्ञ चिकित्सक होता है जो पाचन संबंधी विकारों के उपचार में दक्ष होता है। चिकित्सक से परामर्श करने से पहले की तैयारी करना किसी चिकित्सक के पास जाने से पहले जिन लक्षणों को आप अनुभव कर रहे हैं, और कितने समय से वे दिखाई दे रहे हैं, और क्या आपको कोई ऐसा
विशेष कारक पता है जो विशिष्ट रूप से लक्षणों को प्रकट कर देता है, इन सब बातों को लिख लेना अच्छा रहता है। आपको प्रमुख व्यक्तिगत जानकारी समेत अपने जीवन में हाल में हुए परिवर्तनों अथवा तनाव के कारकों के विषय में भी लिख लेना चाहिए। ये कारक इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम की आवृत्ति और गंभीरता में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।
आपको उन प्रश्नों पर भी विचार करके उन्हें लिख लेना चाहिए, जिन्हें आप अपने चिकित्सक से पूछना चाहेंगे। अपने प्रश्नों की पहले से ही सूची बना लेने से आपको अपने चिकित्सक के साथ अधिक समय बिताने और जानकारी साझा करने में सहायता मिलेगी। इन प्रश्नों के अतिरिक्त, चिकित्सक से मुलाकात के समय यदि आपके मन में कोई और प्रश्न आए तो पूछने में झिझकना नहीं चाहिए। हो सकता है कि आपका चिकित्सक आपसे अनेक प्रश्न पूछे। उनका उत्तर देने के लिए तैयार होने पर आपके पास उन बातों की चर्चा करने के
लिए अधिक समय बच सकता है जिनकी आप अधिक विस्तार से चर्चा करना चाहते हैं। आपसे आपके लक्षणों और उनकी कालावधि तथा गंभीरता के विषय में पूछा जा सकता हैः क्या लक्षण कुछ समय तक प्रकट
होकर गायब हो जाते हैं; अथवा वैसे ही बने रहते हैं, क्या आपने किसी ऐसी बात पर गौर किया है जो आपके रोग के लक्षणों को आरंभ करती प्रतीत होती है, जैसे कोई खाद्य पदार्थ, तनाव अथवा महिलाओं में उनका मासिक चक्र; क्या बिना प्रयास किए आपका वजन कम हुआ है; क्या आपको अपने मल में रक्त दिखाई दिया है; क्या आपको उबकाई आने अथवा ज्वर जैसे संकेत अथवा लक्षण दिखाई दिये हैं; क्याआपको हाल ही में काफी तनाव, भावनात्मक कठिनाई अथवा हानि झेलनी पड़ी है; आपका प्रारूपिक दैनिक आहार क्या है; क्या आपके यहाँ आंत विकार अथवा वृहदांत्र (कोलन) कैंसर का कोई पारिवारिक इतिहास रहा है; और क्या आपको कोई अन्य बीमारी है। ये प्रश्न चिकित्सक को सही रोग निदान तक पहुंचने और उन परीक्षणों को करवाने के लिए बताने में सहायक हो सकते हैं जो आपकी स्थिति के लिए उपयुक्त हो।
रोगनिदान
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम का रोगनिदान काफी हद तक विस्तृत चिकित्सीय इतिहास, चिकित्सक के क्लीनिक में चिकित्सीय परीक्षण और रोगनिदानी परीक्षणों पर निर्भर करता है जो अन्य ऐसी स्थितियों को नकार सकता है जो इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के जैसी लेकिन अधिक गंभीर प्रकृति की होती हैं।
लक्षणों के आधार पर रोगनिदान के मानक
चूंकि इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम तथा अन्य क्रियाशील जठरांत्रीय विकारों के सटीक निदान के लिए कोई पुष्टिकारी भौतिक लक्षण नहीं होते हैं, अतः चिकित्सा अनुसंधानकर्ताओं ने व्यापक रोगनिदानी मानकों के दो सेट विकसित किए हैं जो प्राथमिक रूप से व्यक्ति में दिखने वाले लक्षणों पर आधारित होने के साथ ही यह बताते हैं कि अन्य अधिक गंभीर स्थितियां नहीं हैं।
रोम मानक
रोम मानक कारक किसी चिकित्सक के लिए इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के रोग निदान के लिए अनेक विशिष्ट संकेतों और लक्षणों की सूची है। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण पेट में दर्द और परेशानी है जो महीने में कम से कम तीन दिन तक रहती है और रोगी को बार.बार कम से कम पिछले तीन महीनों से परेशान कर रही है। ऐसे लक्षण निम्नलिखित में से दो या अधिक बातों से संबन्धित होने चाहिएः मलत्याग के बाद स्थिति में सुधार, मल त्याग की परिवर्तित आवृत्ति अथवा मल की परिवर्तित संगतता।
मैनिंग मानक
मैनिंग मानक निम्नलिखित मानकों पर केन्द्रित हैंः मलत्याग के बाद दर्द से राहत, अधूरा मल त्याग, मल में श्लेष्म का आना, और मल की संगतता। जितने अधिक लक्षण उपस्थित होंगे उतनी ही इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के होने की संभावना अधिक होगी। आप जिस चिकित्सक से परामर्श करते हैं संभव है कि वह इस बात का मूल्यांकन करे कि आप इन मानकों के लिए कितने उपयुक्त हैं, साथ ही ये भी कि क्या आपमें कोई ऐसे लक्षण या संकेत हैं जो संभवतः अधिक गंभीर स्थिति को इंगित करते हैं। यदि आप आईबीएस मानक को पूरा करते हैं और आपमें किसी चेतावनी के संकेत अथवा लक्षण नहीं हैं, तो आपका चिकित्सक बगैर अतिरिक्त परीक्षण किए आपको
उपचार का सुझाव दे सकता है। लेकिन यदि आपको उपचार से लाभ नहीं होता है अथवा चिकित्सक को
कोई अनिश्चितता हो तो आपको अधिक परीक्षणों की आवश्यकता हो सकती है।
रोगनिदानी परीक्षण
आपका उपचार करने वाले चिकित्सक मल परीक्षण समेत अनेक परीक्षणों की सिफारिश कर सकते हैं जिससे आपकी आंतों के संक्रमण अथवा भोजन से पोषकों को ग्रहण करने की क्षमता संबंधी समस्याओं की जांच हो सकें। जो एक ऐसी स्थिति है जिसको ?अल्पअवशोषण के नाम से जाना जाता है। लैक्टोस असहनशीलता परीक्षण
लैक्टोस एक एन्जाइम है जिसकी आपको डेयरी उत्पादों में पाई जाने वाली शर्करा को पचाने के लिए आवश्यकता होती है। यदि आप इस एन्जाइम को निर्मित नहीं कर पाते हैं, तो आपको पेट में दर्द, डायरिया और गैस समेत इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम से होने वाली समस्याएं हो सकती हैं। यह जानने के लिए कि क्या यह आपके लक्षणों का कारण हैं, आपके चिकित्सक श्वास परीक्षण के लिए अथवा कुछ सप्ताह के लिए आपके आहार में दूध और दुग्ध उत्पादों को सम्मिलित नहीं करने के लिए कह सकते हैं।
श्वास परीक्षण
आपके चिकित्सक जीवाणुओं की अतिवृद्धि नामक स्थिति का पता लगाने के लिए एक श्वास परीक्षण कर सकते हैं, जिसमें वृहदांत्र से जीवाणु ऊपर छोटी आंत में आकर वृद्धि करते हैं जिससे पेट फूलन
पेट संबंधी दिक्कतें और डायरिया जैसी समस्याएं हो जाती है। यह उन व्यक्तियों में अधिक सामान्य है जिनमें आंतों की शल्यक्रिया हो चुकी हो अथवा जो डायबिटीज (मधुमेह) अथवा किसी अन्य ऐसे रोग से पीड़ित हो जो पाचन को मंद कर देता है।
रक्त परीक्षण
सीलिएक रोग गेहूँ, जौ तथा राइ प्रोटीन के प्रति संवेदनशीलता है जिससे इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम जैसे संकेत और लक्षण प्रगट हो सकते हैं। आईबीएस से पीड़ित बच्चों में सीलिएक रोग की संभावना उन बच्चों से कहीं अधिक होती है जिन्हें आईबीएस नहीं होता है। यदि आपके चिकित्सक को संदेह हो कि आपको सीलिएक रोग हैं; तो वह आपकी छोटी आंत की बायोप्सी प्राप्त करने के लिए पेट के ऊपरी भाग की एन्डोस्कोपी कर सकते हैं।
मल परीक्षण
यदि आपको गंभीर डायरिया हो तो चिकित्सक जीवाणुओं अथवा परजीवियों की उपस्थिति का पता लगाने के लिए आपका मल परीक्षण कर सकते हैं। चिकित्सक आपसे निम्नलिखित इमेजिंग परीक्षणों के लिए कह सकते हैंः
फ्लैक्सिबल सिग्मोइडोस्कोपी
इस परीक्षण में वृहदांत्र के निचले भाग (सिग्मोइड) की एक लचीली, प्रकाशित नली से जांच की जाती है, जिसे सिग्मोइडोस्कोप कहते हैं।
कोलोनोस्कोपी
कुछ मामलों में, विशेषरूप से यदि आपकी उम्र 50 वर्ष अथवा उससे अधिक है, अथवा आपमें अधिक गंभीर स्थिति के लक्षण दिखाई देते हैं तो आपके चिकित्सक यह रोग निदानी परीक्षण कर सकते हैं जिसमे एक छोटी, लचीली नली का उपयोग वृहदांत्र की पूरी लंबाई में जांच करने के लिए किया जाता है।
कंप्यूटरीकृत टोमोग्राफी (सीटी) स्कैन
सीटी स्कैन में आंतरिक अंगों के अनुप्रस्थ एक्सरे बिंब निर्मित होते हैं। आपके उदर और श्रोणि प्रदेश के
सीटी स्कैन से आपके चिकित्सक को विशेष रूप से यदि आपको पेट में दर्द की शिकायत हो तो आपके रोग लक्षणों के अन्य कारणों को नकारने में सहायता मिलती है।
लोअर जीआई बेरियम सीरीज
इस परीक्षण में , चिकित्सक आपकी बड़ी आंत को एक द्रव (बेरियम विलयन) से भर देते हैं , जिससे
एक्सरे में किसी समस्या को देखना आसान हो जाता है।
इन परीक्षणों को करने का उद्देश्य रोग की मूल प्रकृति का पता लगाना है। यह हो जाने के बाद,
उपचार राहत के लक्षणों पर केन्द्रित होता है जिससे आप जितना संभव हो सके सामान्य जीवन जी सकें।
लेखक---डॉ. यतीश अग्रवाल
(अनुवादः कुंकुम चतुर्वेदी)
ड्रीम --नवम्बर -2017
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम (उत्तेजनीय आंत्र सिन्ड्रोम) नामक एक सामान्य आंत्र विकार जो बड़ी आंत को प्रभावित करता है, एक दीर्घकालिक समस्या है जो लोगो के जीवन जीने के तरीके को परिवर्तित कर सकती है। अधिक प्रचलित रूप से अपने संक्षिप्त नाम आईबीएस से पहचाने जाने वाले इस विकार के संकेत और लक्षण आंतों में मरोड़ का होना है, जो व्यक्ति को अत्यधिक असहज कर देता है। य़द्यपि एक अच्छी बात ये है कि इससे जीवन के लिए खतरा नहीं होता है और कुछ अन्य आंत्र विकारों जैसे अल्सरेटिक कोलाइटिस के
विपरीत इस से आंत के ऊतकों में कोई परिवर्तन नही होता है और न कोलोरेक्टल (वृहदांत्र मलाशयी) कैंसर का जोखिम बढ़ता है। लाखों व्यक्ति इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम से पीड़ित होते हैं। इनमें से अधिकतर महिलाऐं हैं। लोगों में अधिकतर यह स्थिति युवावस्था से 40.45 वर्ष की उम्र तक हो सकती है। इसमें सामान्यतः पेट में तकलीफ, पेट में मरोड़ अथवा पेट में दर्द, पेट फूलना, गैस, शौच करने में दिक्कतें हो सकती हैं जिनसे या तो
डायरिया (अतिसार/दस्त) अथवा कब्ज हो सकता है तथा पतले, कठोर अथवा मृदु और तरल मल का उत्सर्जन हो सकता है।
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम से पीड़ित बहुत कम लोगों में ही गंभीर संकेत और लक्षण प्रकट होते हैं। कुछ लोग सिर्फ अपने आहार, जीवनशैली और तनाव को प्रबंधित करके लक्षणों को नियंत्रित कर लेते हैं।
लेकिन बहुतों में यह जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं। वे अपने कार्य अथवा विद्यालय से अकसर अवकाश ले
सकते हैं और दैनिक कार्यकलापों में भाग लेने में कम सक्षम महसूस कर सकते हैं। कुछ व्यक्तियों को अपनी
कार्यव्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता हो सकती है, और वे घर से कार्य कर सकते हैं अथवा काम के समय
में परिवर्तन कर सकते हैं अथवा काम करना बंद कर सकते हैं। कुछ को चिकित्सा उपचार और परामर्श की
आवश्यकता होती है.
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के क्या कारण हैं?
यह ज्ञात नहीं है कि यथार्थ रूप से इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम किस कारण होता है, लेकिन अनेक कारक इसमें भूमिका निभाते हैं। आंतो की भित्तियां पेशियों की परतों से अस्तरित रहती हैं जो एक समन्वित लय में संकुचन करती और शिथिल होती हैं और ये भोजन को आमाशय से आंत्र पथ से होकर मलाशय तक पहुंचाती हैं। इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम से पीड़ित व्यक्ति में ये संकुचन अधिक प्रबल और सामान्य से अधिक लंबी अवधि तक जारी रह सकते हैं, जिससे गैस, पेट फूलना और डायरिया हो सकते हैं। अथवा इसका उलटा भी हो सकता है
जिसमें आंत्रीय संकुचन निर्बल होते हैं जिससे भोजन का पथ मंद हो जाता है और कठोर; शुष्क मल का उत्सर्जन होता है।
जठरांत्रीय तंत्रिका तंत्र में असमान्यताएं भी इसमें भूमिका निभाती है, जिसमें व्यक्ति गैस अथवा मल के कारण पेट फूलने पर सामान्य से अधिक कष्ट का अनुभव करता है। मस्तिष्क और आंतों के बीच कम समन्वित संकेतों के कारण भी शरीर उन परिवर्तनों के लिए जरूरत से अधिक प्रतिक्रिया करता है जो सामान्यतः पाचन प्रक्रिया में होते हैं। इस अतिप्रतिक्रिया से पेटदर्द, मरोड़, पेट फूलना और डायरिया अथवा कब्ज हो सकती है।
ट्रिगर/आरंभक
वे उद्दीपन जो अन्य व्यक्तियों को प्रभावित नहीं करते हैं, इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम वाले व्यक्तियों में लक्षण प्रगट कर सकते हैं लेकिन इस स्थिति से पीड़ित सभी व्यक्ति किसी एक उद्दीपन के लिए एक ही तरीके से व्यवहार नहीं करते हैं। सामान्य आरंभकों में सम्मिलित हैं:
तनाव
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम से पीड़ित अधिकांश व्यक्ति यह पाते हैं कि उनके संकेत और लक्षण
िाक तनाव की स्थितियों जैसे किसी आने वाले परिणाम के सप्ताहों अथवा नए रोजगार के आरंभिक सप्ताहों में
अधिक होते हैं। यद्यपि, तनाव लक्षणों को बढ़ा सकता है, लेकिन यह संभवतः प्रमुख ट्रिगर नहीं है।
हार्मोन
चूंकि अधिकांशतः पीड़ित महिलाएं होती है, अतः चिकित्सा अनुसंधानकर्ता ये मानते हैं कि हार्मोनों में परिवर्तन संभवतः इस स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अनेक महिलाएं यह पाती हैं कि इसके संकेत और लक्षण उनके मासिक चक्र के समय अथवा उसके आसपास अधिक उग्र हो जाते हैं।
जीवाणु और आंत्र संक्रमण
कभी.कभी अन्य रोग जैसे संक्रामक डायरिया (गेस्ट्रोएन्टराइटिस) अथवा आंत में जीवाणवीय अतिवृद्धि भी इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम को आरंभ कर सकते हैं।
भोजन
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम में खाद्य.पदार्थ एलर्जी अथवा असहनशीलता की भूमिका अभी तक स्पष्ट रूप
से नहीं समझी जा सकी है, लेकिन अनेक व्यक्तियों में कुछ विशेष खाद्य पदार्थों को खाने पर गंभीर लक्षण प्रगट
हो सकते हैं। अनेक खाद्य पदार्थ इसे प्रभावित करते पाए गए हैं- फलियां, पत्तागोभी, फूलगोभी, ब्रोकली,
मसाले, वसा, फल, दूध, कार्बनीकृत पेय, चॉकलेट और ऐल्कोहॉल आदि इनमें से हैं।
किसे जोखिम है?
अनेक व्यक्तियों में कभी.कभार इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के संकेत और लक्षण प्रगट होते हैं, लेकिन निम्नलिखित व्यक्तियों में इसके होने की अधिक संभावना होती है।
युवा वयस्क
45 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों में इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के होने की अधिक प्रवृत्ति होती है।
महिलाएं
महिलाओं में पुरुषों की तुलना में इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के विकसित होने की लगभग दोगुनी संभावना
होती है।
पारिवारिक इतिहास
अध्ययन सुझाते हैं कि जिन व्यक्तियों के परिवार के किसी सदस्य को इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम हो उनमें इसके होने का जोखिम अधिक होता है। जोखिम पर पारिवारिक इतिहास का प्रभाव जीन्स से, पारिवारिक परिवेश के सामूहिक कारकों से अथवा दोनों से संबंधित हो सकता है।
मनोवैज्ञानिक समस्याएं
चिन्ता, अवसाद, व्यक्तित्व विकार और बचपन में यौन दुर्व्यवहार का इतिहास जोखिम के कारक हैं।
महिलाओं के लिए, घरेलू दुर्व्यवहार भी जोखिम का एक कारक हो सकता है।
संकेतों और लक्षणों की पहचान करना
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के संकेत और लक्षण भिन्न लोगों में अत्यधिक भिन्न होते हैं और अन्य रोगों के लक्षणों के सदृश हो सकते हैं। सबसे सामान्य
लक्षणों में हैः
* डायरिया (अक्सर उग्र डायरिया के रूप में वर्णित
किया जाता है)
* कब्ज
* कब्ज और डायरिया एकांतरी रूप से होते हैं; लेकिन यह एक ऐसा संकेत है जो अधिक गंभीर स्थिति को प्रदर्शित कर सकता है और पीड़ित व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा परामर्श के लिए प्रेरित करना चाहिए
* पेट में दर्द अथवा मरोड़, सामान्यतः पेट के निचले भाग में होता है, जो खाने के बाद और अधिक हो
जाता है तथा मल त्याग के बाद बेहतर महसूस होता है
* अत्यधिक गैस अथवा पेट फूलना
* सामान्य से अधिक कड़ा अथवा ढीला मल (पत्रक अथवा चपटे फीते जैसा मल)
* मल में श्लेश्म का होना
* बवासीर का बढ़ जानाः डायरिया और कब्ज, दोनों इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के लक्षण हैं, जो बवासीर को भी बढ़ा सकते हैं
* तनाव स्थिति को और अधिक बिगाड़ सकता है।
* कुछ व्यक्तियों में मूत्र रोग के लक्षण अथवा यौन समस्याएं भी हो जाती हैं।
प्रारूपिक रूप से चार प्रकार की स्थितियां होती हैं।
--कब्ज के साथ आईबीएस सी (IBS-C)
--और डायरिया के साथ आईबीएस डी (IBS-D हो सकता है। कुछ व्यक्तियों में कब्ज और डायरिया
का एकांतरी पैटर्न दिखाई देता है। यह मिश्रित आईबीएस (IBS-M) कहलाता है। अन्य व्यक्ति जो
आसानी से श्रेणियों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं उन्हें अउपप्रकारित (Unsubtyped) आईबीएस अर्थात
(IBS-U) कहा जाता है।
परिणाम
अधिकांश व्यक्तियों के लिए, इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम एक गंभीर स्थिति है, लेकिन कभी.कभी संकेतों और लक्षणों के अत्यधिक उग्र हो जाने और कभी बेहतर हो जाने अथवा पूर्णतः लुप्त हो जाने की संभावना रहती है।
इस स्थिति का व्यक्ति के जीवन की समग्र गुणवत्ता पर प्रभाव इसकी सबसे प्रमुख जटिलता हो सकती है। यदि व्यक्ति आईबीएस के कारण कुछ खाद्य पदार्थों को खाना छोड़ दें, तो संभव है कि उन्हें अपनी आवश्यकतानुसार पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाएगा, जिससे वे कुपोषण से पीड़ित हो सकते हैं। आईबीएस के इन प्रभावों से व्यक्ति यह महसूस कर सकते हैं कि वे अपना जीवन संपूर्णता से नहीं जी पा रहे हैं, जिससे वे हतोत्साहित अथवा अवसादग्रस्त हो जाते हैं।
चिकित्सक के पास कब जाएं
यद्यपि अनेक वयस्क इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के संकेतों और लक्षणों का अनुभव करते हैं, लेकिन लक्षणों से ग्रसित पांच में से एक से भी कम व्यक्ति चिकित्सीय सहायता लेते हैं। यदि किसी व्यक्ति की आंत्रीय प्रवृत्तियों में स्थायी परिवर्तन हो जाता है अथवा कोई अन्य संकेत या लक्षण दिखाई देता है; तो यह महत्वपूर्ण है कि वह चिकित्सक के पास जाए क्योंकि ये लक्षण अधिक गंभीर स्थिति जैसे वृहदांत्र (कोलन) कैन्सर का संकेत हो सकते हैं।
यदि चिकित्सक अधिक गंभीर स्थितियों को नकार कर इरीटेबल बाउल सिन्ड्रोम के निदान की पुष्टि करने में सफल होता है तो वह लक्षणों से राहत में सहायता कर सकता है और साथ ही उपचार भी बता सकता है, जिससे उन संभावित जटिलताओं से बचा जा सके जो संभवतः गंभीर डायरिया के कारण हो सकती हैं।
खतरे के संकेत
कुछ संकेत और लक्षण अधिक गंभीर स्थिति को इंगित कर सकते हैं। यदि आपको इनमें से कोई भी
खतरे के लक्षण दिखाई देते हैं तो आपको चिकित्सक के पास जाने में विलम्ब नहीं करना चाहिए। इन लक्षणों में सम्मिलित हैंः
* 50 वर्ष की आयु के बाद रोग का पुनः हमला
* वजन घटना
स मलाशय से रक्तस्त्राव
* ज्वर
* जी मिचलाना अथवा बार.बार उबकाई आना
* पेट में दर्दः विशेष रूप से यदि मल निवृत्ति से
पूर्ण आराम नहीं मिलता है अथवा रात के समय
दर्द होता है
* डायरिया जो स्थायी रूप से रहता है और आपको
नींद से जगा देता है।
* आयरन की कमी से सबंन्धित एनीमिया (रक्ताल्पता)
किस चिकित्सक को दिखाएं?
यदि आप में इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के लक्षण दिखाई देते हैं, तो आपको अपने पारिवारिक चिकित्सक अथवा आन्तरिक रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए। आरंभिक जांच के बाद आपके पारिवारिक चिकित्सक आपको जठरांत्र रोग विशेषज्ञ के पास भेज सकते हैं।
एक जठरांत्र रोग विशेषज्ञ वह विशेषज्ञ चिकित्सक होता है जो पाचन संबंधी विकारों के उपचार में दक्ष होता है। चिकित्सक से परामर्श करने से पहले की तैयारी करना किसी चिकित्सक के पास जाने से पहले जिन लक्षणों को आप अनुभव कर रहे हैं, और कितने समय से वे दिखाई दे रहे हैं, और क्या आपको कोई ऐसा
विशेष कारक पता है जो विशिष्ट रूप से लक्षणों को प्रकट कर देता है, इन सब बातों को लिख लेना अच्छा रहता है। आपको प्रमुख व्यक्तिगत जानकारी समेत अपने जीवन में हाल में हुए परिवर्तनों अथवा तनाव के कारकों के विषय में भी लिख लेना चाहिए। ये कारक इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम की आवृत्ति और गंभीरता में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।
आपको उन प्रश्नों पर भी विचार करके उन्हें लिख लेना चाहिए, जिन्हें आप अपने चिकित्सक से पूछना चाहेंगे। अपने प्रश्नों की पहले से ही सूची बना लेने से आपको अपने चिकित्सक के साथ अधिक समय बिताने और जानकारी साझा करने में सहायता मिलेगी। इन प्रश्नों के अतिरिक्त, चिकित्सक से मुलाकात के समय यदि आपके मन में कोई और प्रश्न आए तो पूछने में झिझकना नहीं चाहिए। हो सकता है कि आपका चिकित्सक आपसे अनेक प्रश्न पूछे। उनका उत्तर देने के लिए तैयार होने पर आपके पास उन बातों की चर्चा करने के
लिए अधिक समय बच सकता है जिनकी आप अधिक विस्तार से चर्चा करना चाहते हैं। आपसे आपके लक्षणों और उनकी कालावधि तथा गंभीरता के विषय में पूछा जा सकता हैः क्या लक्षण कुछ समय तक प्रकट
होकर गायब हो जाते हैं; अथवा वैसे ही बने रहते हैं, क्या आपने किसी ऐसी बात पर गौर किया है जो आपके रोग के लक्षणों को आरंभ करती प्रतीत होती है, जैसे कोई खाद्य पदार्थ, तनाव अथवा महिलाओं में उनका मासिक चक्र; क्या बिना प्रयास किए आपका वजन कम हुआ है; क्या आपको अपने मल में रक्त दिखाई दिया है; क्या आपको उबकाई आने अथवा ज्वर जैसे संकेत अथवा लक्षण दिखाई दिये हैं; क्याआपको हाल ही में काफी तनाव, भावनात्मक कठिनाई अथवा हानि झेलनी पड़ी है; आपका प्रारूपिक दैनिक आहार क्या है; क्या आपके यहाँ आंत विकार अथवा वृहदांत्र (कोलन) कैंसर का कोई पारिवारिक इतिहास रहा है; और क्या आपको कोई अन्य बीमारी है। ये प्रश्न चिकित्सक को सही रोग निदान तक पहुंचने और उन परीक्षणों को करवाने के लिए बताने में सहायक हो सकते हैं जो आपकी स्थिति के लिए उपयुक्त हो।
रोगनिदान
इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम का रोगनिदान काफी हद तक विस्तृत चिकित्सीय इतिहास, चिकित्सक के क्लीनिक में चिकित्सीय परीक्षण और रोगनिदानी परीक्षणों पर निर्भर करता है जो अन्य ऐसी स्थितियों को नकार सकता है जो इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के जैसी लेकिन अधिक गंभीर प्रकृति की होती हैं।
लक्षणों के आधार पर रोगनिदान के मानक
चूंकि इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम तथा अन्य क्रियाशील जठरांत्रीय विकारों के सटीक निदान के लिए कोई पुष्टिकारी भौतिक लक्षण नहीं होते हैं, अतः चिकित्सा अनुसंधानकर्ताओं ने व्यापक रोगनिदानी मानकों के दो सेट विकसित किए हैं जो प्राथमिक रूप से व्यक्ति में दिखने वाले लक्षणों पर आधारित होने के साथ ही यह बताते हैं कि अन्य अधिक गंभीर स्थितियां नहीं हैं।
रोम मानक
रोम मानक कारक किसी चिकित्सक के लिए इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के रोग निदान के लिए अनेक विशिष्ट संकेतों और लक्षणों की सूची है। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण पेट में दर्द और परेशानी है जो महीने में कम से कम तीन दिन तक रहती है और रोगी को बार.बार कम से कम पिछले तीन महीनों से परेशान कर रही है। ऐसे लक्षण निम्नलिखित में से दो या अधिक बातों से संबन्धित होने चाहिएः मलत्याग के बाद स्थिति में सुधार, मल त्याग की परिवर्तित आवृत्ति अथवा मल की परिवर्तित संगतता।
मैनिंग मानक
मैनिंग मानक निम्नलिखित मानकों पर केन्द्रित हैंः मलत्याग के बाद दर्द से राहत, अधूरा मल त्याग, मल में श्लेष्म का आना, और मल की संगतता। जितने अधिक लक्षण उपस्थित होंगे उतनी ही इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम के होने की संभावना अधिक होगी। आप जिस चिकित्सक से परामर्श करते हैं संभव है कि वह इस बात का मूल्यांकन करे कि आप इन मानकों के लिए कितने उपयुक्त हैं, साथ ही ये भी कि क्या आपमें कोई ऐसे लक्षण या संकेत हैं जो संभवतः अधिक गंभीर स्थिति को इंगित करते हैं। यदि आप आईबीएस मानक को पूरा करते हैं और आपमें किसी चेतावनी के संकेत अथवा लक्षण नहीं हैं, तो आपका चिकित्सक बगैर अतिरिक्त परीक्षण किए आपको
उपचार का सुझाव दे सकता है। लेकिन यदि आपको उपचार से लाभ नहीं होता है अथवा चिकित्सक को
कोई अनिश्चितता हो तो आपको अधिक परीक्षणों की आवश्यकता हो सकती है।
रोगनिदानी परीक्षण
आपका उपचार करने वाले चिकित्सक मल परीक्षण समेत अनेक परीक्षणों की सिफारिश कर सकते हैं जिससे आपकी आंतों के संक्रमण अथवा भोजन से पोषकों को ग्रहण करने की क्षमता संबंधी समस्याओं की जांच हो सकें। जो एक ऐसी स्थिति है जिसको ?अल्पअवशोषण के नाम से जाना जाता है। लैक्टोस असहनशीलता परीक्षण
लैक्टोस एक एन्जाइम है जिसकी आपको डेयरी उत्पादों में पाई जाने वाली शर्करा को पचाने के लिए आवश्यकता होती है। यदि आप इस एन्जाइम को निर्मित नहीं कर पाते हैं, तो आपको पेट में दर्द, डायरिया और गैस समेत इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम से होने वाली समस्याएं हो सकती हैं। यह जानने के लिए कि क्या यह आपके लक्षणों का कारण हैं, आपके चिकित्सक श्वास परीक्षण के लिए अथवा कुछ सप्ताह के लिए आपके आहार में दूध और दुग्ध उत्पादों को सम्मिलित नहीं करने के लिए कह सकते हैं।
श्वास परीक्षण
आपके चिकित्सक जीवाणुओं की अतिवृद्धि नामक स्थिति का पता लगाने के लिए एक श्वास परीक्षण कर सकते हैं, जिसमें वृहदांत्र से जीवाणु ऊपर छोटी आंत में आकर वृद्धि करते हैं जिससे पेट फूलन
पेट संबंधी दिक्कतें और डायरिया जैसी समस्याएं हो जाती है। यह उन व्यक्तियों में अधिक सामान्य है जिनमें आंतों की शल्यक्रिया हो चुकी हो अथवा जो डायबिटीज (मधुमेह) अथवा किसी अन्य ऐसे रोग से पीड़ित हो जो पाचन को मंद कर देता है।
रक्त परीक्षण
सीलिएक रोग गेहूँ, जौ तथा राइ प्रोटीन के प्रति संवेदनशीलता है जिससे इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम जैसे संकेत और लक्षण प्रगट हो सकते हैं। आईबीएस से पीड़ित बच्चों में सीलिएक रोग की संभावना उन बच्चों से कहीं अधिक होती है जिन्हें आईबीएस नहीं होता है। यदि आपके चिकित्सक को संदेह हो कि आपको सीलिएक रोग हैं; तो वह आपकी छोटी आंत की बायोप्सी प्राप्त करने के लिए पेट के ऊपरी भाग की एन्डोस्कोपी कर सकते हैं।
मल परीक्षण
यदि आपको गंभीर डायरिया हो तो चिकित्सक जीवाणुओं अथवा परजीवियों की उपस्थिति का पता लगाने के लिए आपका मल परीक्षण कर सकते हैं। चिकित्सक आपसे निम्नलिखित इमेजिंग परीक्षणों के लिए कह सकते हैंः
फ्लैक्सिबल सिग्मोइडोस्कोपी
इस परीक्षण में वृहदांत्र के निचले भाग (सिग्मोइड) की एक लचीली, प्रकाशित नली से जांच की जाती है, जिसे सिग्मोइडोस्कोप कहते हैं।
कोलोनोस्कोपी
कुछ मामलों में, विशेषरूप से यदि आपकी उम्र 50 वर्ष अथवा उससे अधिक है, अथवा आपमें अधिक गंभीर स्थिति के लक्षण दिखाई देते हैं तो आपके चिकित्सक यह रोग निदानी परीक्षण कर सकते हैं जिसमे एक छोटी, लचीली नली का उपयोग वृहदांत्र की पूरी लंबाई में जांच करने के लिए किया जाता है।
कंप्यूटरीकृत टोमोग्राफी (सीटी) स्कैन
सीटी स्कैन में आंतरिक अंगों के अनुप्रस्थ एक्सरे बिंब निर्मित होते हैं। आपके उदर और श्रोणि प्रदेश के
सीटी स्कैन से आपके चिकित्सक को विशेष रूप से यदि आपको पेट में दर्द की शिकायत हो तो आपके रोग लक्षणों के अन्य कारणों को नकारने में सहायता मिलती है।
लोअर जीआई बेरियम सीरीज
इस परीक्षण में , चिकित्सक आपकी बड़ी आंत को एक द्रव (बेरियम विलयन) से भर देते हैं , जिससे
एक्सरे में किसी समस्या को देखना आसान हो जाता है।
इन परीक्षणों को करने का उद्देश्य रोग की मूल प्रकृति का पता लगाना है। यह हो जाने के बाद,
उपचार राहत के लक्षणों पर केन्द्रित होता है जिससे आप जितना संभव हो सके सामान्य जीवन जी सकें।
लेखक---डॉ. यतीश अग्रवाल
(अनुवादः कुंकुम चतुर्वेदी)
ड्रीम --नवम्बर -2017
Tuesday, 23 June 2020
PGIMS ROHTAK DATA --2018--2019
PGIMS ROHTAK DATA --2018--2019
2018 2019
1. ओपीडी इमरजेंसी के अलावा------1861306 --------1743495
2. इमरजेंसी --------------------------- 336836----------390074
3. कुल ओपीडी------------------------2198142----------2133569
4.रोजाना औसतन ओपीडी------------7386---------------7081
5. दाखिल कुल मरीज-----------------117018------------123403
6.रोजाना दाखिले औसतन------------321-----------------337
7.कुल डेथ -----------------------------7074---------------8010
8.कुल जन्म----------------------------11222--------------12796
9.% बिस्तर ऑक्युपेंसी-----------------83.66---------------82.33
10. औसतन स्टे(दिन)-------------------5.73----------------5.75
11.मेजर सर्जरी -------------------------24653---------------25976
12.माइनर सर्जरी-----------------------158825-------------158641
13कुल ऑपरेशन-----------------------183478-------------184617
1. ओपीडी इमरजेंसी के अलावा------1861306 --------1743495
2. इमरजेंसी --------------------------- 336836----------390074
3. कुल ओपीडी------------------------2198142----------2133569
4.रोजाना औसतन ओपीडी------------7386---------------7081
5. दाखिल कुल मरीज-----------------117018------------123403
6.रोजाना दाखिले औसतन------------321-----------------337
7.कुल डेथ -----------------------------7074---------------8010
8.कुल जन्म----------------------------11222--------------12796
9.% बिस्तर ऑक्युपेंसी-----------------83.66---------------82.33
10. औसतन स्टे(दिन)-------------------5.73----------------5.75
11.मेजर सर्जरी -------------------------24653---------------25976
12.माइनर सर्जरी-----------------------158825-------------158641
13कुल ऑपरेशन-----------------------183478-------------184617
PGI Chandigarh Data
PGI Chandigarh Data
2018
2019
Hospital Beds
Indoor (Sanctioned Beds)
1740
1740
Observation
208
208
Total Beds 1948 1948
Bed occupancy rate
107.7
111.2
Average daily inpatients census 1874 1936
Average Length of stay
7.0 days
7.1 days
Gross Death Rate ( including Emergency ) 5.9% 5.1%
OPD 2869150 2914343
Admissions
Adults and Children
92359
93996
New born 5821 6013
Total
98180
100009
Indoor Deaths 5791 5303
Operations
Major
50243
51221
Minor
202413 214055
Total
252656
265276
Deliveries 5876 6056
पीजीआईएमएस के स्त्री विभाग के कुछ आंकड़े
पीजीआईएमएस के स्त्री विभाग के कुछ आंकड़े
साल ओपीडी आईपीडी कुल डिलीवरी मुख्य ऑपरेशन सीजेरियन
2008 83289 19456 8165 5095 1999
2009 83646 19500 8205 5576 2329
2010 79693 22205 9381 5661 2616
2011 76021 22701 9166 5134 2712
2012 77646 25959 9640 6276 2675
2013 60442 16932 9326 3909 2827
2014 83297 20964 9949 5825 2585
2015 92692 16135 9683 6051 2861
2016 92357 16536 10049 5255 2901
2017 102282 19741 10774 5655 3280
2018 105030 18829 11222 5938 3445
2019 99995 21384 12796 4567 3246
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