Tuesday, 21 April 2020

Covid 19 Bulletin 18 April 2020 (H)

CSIRसीएसआईआर की एक और प्रयोगशाला में कोरोना वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग

कोशकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) और जीनोमिक एवं समेकित जीवविज्ञान संस्थान (आईजीआईबी) के बाद वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक और प्रयोगशाला में नये कोरोना वायरस के संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण (Genome Sequencing) का कार्य शुरू किया जा रहा है। चंडीगढ़ स्थित सीएसआईआर-सूक्ष्मजीव प्रौद्योगिकी संस्थान (इम्टेक) ने भी कोविड-19 की चुनौती से निपटने के लिए महत्वपूर्ण पहल करते नये कोरोना वायरस का संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण शुरू कर दिया है।
इम्टेक के निदेशक डॉ संजीव खोसला ने कहा है कि “इस अनुक्रमण से प्राप्त जीनोमिक संसाधन कोविड-19 के लिए जरूरी निदान और दवाओं के लक्ष्यों की पहचान करने में कारगर हो सकते हैं। जीनोम अनुक्रमण के नमूनों को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त संग्रह में जमा किया जाएगा।” दूसरे सूक्ष्मजीवों की तुलना में वायरस के रूपांतरित होने की दर अधिक होती है, और उनकी आनुवंशिक सामग्री तेजी से बदलती रहती है, क्योंकि वायरस संख्या तेजी से बढ़ती रहती है। संपूर्ण जीनोम अनुक्रम की जानकारी होने से शोधकर्ता वायरस की उत्पत्ति, भारत में मौजूद उसके रूपों और हमारे देश में इसके फैलने बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

“इस अनुक्रमण से प्राप्त जीनोमिक संसाधन कोविड-19 के लिए जरूरी निदान और दवाओं के लक्ष्यों की पहचान करने में कारगर हो सकते हैं। जीनोम अनुक्रमण के नमूनों को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त संग्रह में जमा किया जाएगा।”
संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण किसी जीव के जीनोम के पूर्ण डीएनए अनुक्रम को निर्धारित करने के लिए उपयोग की जाने वाली विधि है। सीएसआईआर-इम्टेक को सूक्ष्मजीव और जीनोमिक अनुसंधान में विशेषज्ञता के लिए जाना जाता है। यह संस्थान नैदानिक नमूनों से पृथक किए गए SARS-Cov-2 आरएनए जीनोम का अनुक्रमण करेगा। वर्ष 1984 में स्थापित सीएसआईआर-इम्टेक सूक्ष्मजीव विज्ञान में एक प्रमुख राष्ट्रीय स्तरीय उत्कृष्टता केंद्र है।
डॉ खोसला ने कहा, “हमने नमूनों का नैदानिक परीक्षण शुरू कर दिया है, और अब वायरल उपभेदों को अनुक्रमित करने के लिए इस मिशन को शुरू करते हुए हम इस वायरस की प्रकृति को समझने के लिए बेहतर रूप से सुसज्जित होंगे, जिसके कारण कोविड-19 वैश्विक महामारी फैल रही है।” यह संस्थान भारत में SARS-Cov-2 के उपभेदों में रासायनिक बदलावों का अध्ययन करने के लिए वास्तविक समय में पोर्टेबल और प्रत्यक्ष जीनोम अनुक्रमण में अपने अनुभव का उपयोग करेगा।
इंडिया साइंस वायर

CHITRA GENELAMP-N MAKES CONFIRMATORY TESTS RESULTS OF COVID-19 POSSIBLE IN 2 HOURS

CHITRA GENELAMP-N MAKES CONFIRMATORY TESTS RESULTS OF COVID-19 POSSIBLE IN 2 HOURS


Sree Chitra Tirunal Institute for Medical Sciences and Technology, Thiruvananthapuram, an institute of national importance of the Department of Science and Technology (DST), has developed a diagnostic test kit that can confirm COVID-19 in 2 hours at low cost. The confirmatory diagnostic test, which detects the N Gene of SARSCOV-2 using reverse transcriptase loop-mediated amplification of viral nucleic acid (RT-LAMP), will be one of the world’s first few, if not the first of its kinds, in the world. The test kit, funded by the DST called Chitra GeneLAMP-N, is highly specific for SARS-CoV-2 N-gene and can detect two regions of the gene, which will ensure that the test does not fail even if one region of the viral gene undergoes mutation during its current spread. The tests performed at NIV Alappuzha (authorized by ICMR) show that Chitra GeneLAMP-N has 100% accuracy and match with test results using RT-PCR. This has been intimated to ICMR, the authority to approve it for COVID-19 testing in India, following which license needs to be obtained from CDSCO for manufacturing. Current PCR kits in India enable detection of E gene for screening and RdRp gene for confirmation. Chitra GeneLAMP-N gene testing will allow confirmation in one test without the need for a screening test and at much lower costs. The detection time is 10 minutes and the sample-to-result time (from RNA extraction in swab to RT-LAMP detection time) will be less than 2 hours. A total of 30 samples can be tested in a single batch in a single machine allowing a large number of samples to be tested each day. “Development of a novel, inexpensive, rapid confirmatory for the diagnosis of COVID-19 by Sree Chitra in record time is a compelling example of how a creative team of clinicians and scientists working together seamlessly can leverage knowledge and infrastructure to make relevant breakthroughs. Establishment of a Technology Research Centre at SCTIMST and four other DST institutions has brought rich dividends by conversion of basic research into important technologies,” said Prof Ashutosh Sharma, Secretary, DST. The testing facility can be easily set up even in the laboratories of district hospitals with limited facilities and trained laboratory technicians. The results can be read from the machine from   the change in fluorescence. The cost with the new device for LAMP testing and the test kit for 2 regions of N gene (including RNA extraction) will be less than Rs 1000 per test for the laboratory. Sree Chitra has also additionally developed the specific RNA extraction kits along with GeneLAMP-N test kits and testing devices. The technology was transferred for manufacture to M/S Agappe Diagnostics Ltd, Ernakulam, a leading company in in-vitro diagnostics with national and international operations. Dr. Anoop Thekkuveettil, a senior scientist of the Biomedical Technology Wing of the Institute and Scientist-in-charge of the division of molecular medicine under the Department of Applied Biology and his team developed the kit in the last 3 weeks. For more details, please contact: Ms. Swapna Vamadevan, PRO, SCTIMST, Mob: 9656815943, Email: pro@sctimst.ac.in Website link: https://dst.gov.in/chitra-genelamp-n-makes-confirmatory-tests-results-covid-19-possible-2-hours


चिकित्सा पद्धति का विकास

चिकित्सा पद्धति का विकास
    मानव के होमोसेपियंस रूप में विकास होने पर उसकी बुद्धि के दौरान होने वाले संघर्षों का सामना वह अब शारीरिक शक्तियों के साथ-साथ बुद्धि से भी करने लगा।          समय के साथ मानव झुंड बनाकर या समूह में रहने लगा, जिससे 'हम' की भावना का विकास हुआ। इसके कारण उस समूह के सदस्यों की सुरक्षा सभी की जिम्मेदारी बन गई । इस सुरक्षा में जंगली जानवरों के हमले से लेकर बीमारिया रोगों का उपचार तक शामिल थे।
     समय के साथ प्रयोगों संयोगों एवं अनुभवों  के आधार पर मनुष्य का ज्ञान संग्रहित होता गया एवं कालांतर में यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होता गया। इस प्रकार नई पीढ़ी अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान में अपने अनुभवों से प्राप्त ज्ञान जोड़ते गई एवं इस क्षेत्र का विशेष क्षेत्र के रूप विकास हुआ । श्रम विभाजन एवं वर्ण व्यवस्था के विकसित होने के साथ ही उपचार करना वैध का काम माना जाने लगा । इसके लिए इस ज्ञान को लिखित रूप में भी सहेज कर रखा जाने लगा । इस विषय अर्थात चिकित्सा शल्य क्रिया  का विकास इन उदाहरणों से स्पष्ट समझा जा सकता है:-
1.सर्वप्रथम मनुष्य या मानव ने बीमार होने पर जंगली जड़ी-बूटियों के सेवन से उपचार करना सीखा ।
2.किसी प्रकार की चोट लगने पर इसे दबाकर या बांधकर घाव से खून बहना बंद करना एक सामान्य बात हो गई जो आज भी किया जाता है ।
3.किसी नुकीली वस्तु से कट जाने पर चींटे को इस घाव के दोनों हिस्सों को पकड़ाकर उसका सिर काट दिया जाता था जिससे चींटे का सिर टांके  की तरह काम करता था। यह तरीका आज भी आदिवासियों एवम आदिम जनजातियों में प्रयोग में लिया जाता है ।
4.चरक ऋषि चीरा लगाते समय अनावश्यक रक्तस्राव  को रोकने के लिए विषहीन जोंक का उपयोग किया करते थे ।जिससे आवश्यक चीरा बिना किसी व्यवधान के लगाया जा सके।
5. विष हीन जोंक का उपयोग दूषित रक्त को शरीर के किसी भाग से निकालने के लिए किया जाता था ।
    कालांतर में यूरोप में पुनर्जागरण के परिणाम स्वरूप अध्ययन क्षेत्र का प्रचार प्रसार हुआ जिसके कारण ऐसे रोगों के उपचार के तरीके खोजे जाने लगे जो अभी तक लाइलाज थे । इसी क्रम में लुइस पाश्चर ने जीवाणु सिद्धांत की खोज की । एडवर्ड जेनर ने टीके का निर्माण किया। सर रोनाल्ड रॉस ने मलेरिया परजीवी के जीवन चक्र को समझाया। 
   इन सभी के कारण स्वच्छता की महत्ता का विकास हुआ जिसका प्रयोग सुश्री फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने क्रीमिया युद्ध (1853) में कर अनेक सैनिकों की जान बचाई।

रोग उत्पति की विचारधाराएं

रोग उत्पति की विचारधाराएं 
1 पाश्चर का जीवाणु सिद्धान्त 
पासवर्ड ने जवानों सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसके अनुसार किसी रोग की उत्पत्ति का कारण सुख समझे होते हैं जो किसी दूसरे जीव या माध्यम से व्यक्ति में प्रवेश कर जाते हैं एवं रोग उत्पन्न करते हैं जैसे प्रोटोजोआ जवानों का वक्त वायरस इत्यादि इसी दांत ने अन्य सभी सिद्धांतों की तुलना में मेडिसन के विकास में बहुत अधिक योगदान दिया है इसी कारण स्वच्छता का उपचार में समावेश किया गया एवं तीता एसएक्सेस का विकास हुआ यह ही वह मुख्य विंडो था जिसके कारण हम आगे बढ़ पाए।
2 दैवीय प्रकोप विचार धारा
इस विचारधारा अनुसार रोग या बीमारी मनुष्य को प्रकृति या दैवीय शक्तियों द्वारा दिया गया दंड है जो कि उसके गलत कर्मों के कारण उसे दिया गया है । इसके उदाहरण मिश्र  की मेसोपोटामिया एवं भारत की मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता में मिलते हैं जहां विभिन्न पूजा एवं बली स्थल इस विचारधारा के पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करते हैं । 
   आज भी आदिम कबीलों में यहां तक कि गांव में किसी रोग के उपचार के लिए रोगी को स्थानीय देवी या देवता के पास ले जाया जाता है। एवं झाड़ा फूंक से उसका  उपचार  किया जाता है ।
      जैसे आज भी जैसे सांप के काटने पर स्थानीय देव के मंदिर में जाना । घर में गंभीर बीमारी होने पर पारिवारिक पूर्वजों को बुलाना एवं पूजा करना इत्यादि।
3 जैव चिकित्सीय विचार धारा:-
जीव विज्ञान में सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार ,हार्मोन ,एंजाइम कार्बोहाइड्रेट , प्रोटीन की खोज ने जैव - रासायनिक क्रियाओं को समझने में सहायता की। इन क्रियाओं को समझने के साथ-साथ यह भी ज्ञात हुआ कि इनकी कमी या अधिकता के कारण भी रोग उत्पन्न होते हैं । 
*कार्बोहाइड्रेट की कमी से हाइपोग्लाइसीमिया और अधिकता से हाइपोग्लाइसीमिया, (डायबिटीज)। 
*प्रोटीन की कमी की वजह से क्वाशियोरकर ,मेरास्मस,इत्यादि।
*एंजॉइम विकार की वजह से पाचन में दूध जन्या पदार्थों से एलर्जी होना ।
*हार्मोन विकार से कुशिंग सिंड्रोम, हाइपो या हाइपर थाइरॉएडिज्म आदि
4 बहु कारण विचारधारा:-
 उपरोक्त विचारधारा के एकीकरण के परिणाम स्वरूप इस विचारधारा का विकास हुआ एवं यह माना गया कि रोग उत्पत्ति का कोई निश्चित कारण नहीं होता है। रोग अनेक प्रकार के होते हैं। उसी प्रकार उनके कारण भी अलग-अलग होते हैं । एवमं रोग उत्पत्ति का कोई सर्वमान्य एकल कारण नहीं है बल्कि रोग उत्पत्ति के अनेक कारण हो सकते हैं यहां तक कि एक ही रोग उत्पन्न होने के कई कारण एक साथ जिम्मेदार हो सकते हैं उदाहरणार्थ  पीलिया होने के कारण अमन हो सकते हैं:-
* हेपेटाइटिस 
*एनीमिया 
*एंजॉइम विकार 
*विषाक्तता 
*पोषण संबंधी कारण
5 मनो- सामाजिक विचारधारा:-
 जब 'स्वास्थ्य ' में सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक की स्वस्थता को शामिल किया जाने लगा तो इनसे संबंधित कारण या परिस्थितियां भी रोग उत्पत्ति का कारण मानी गई । एवं उन्माद अवसाद या सिजोफ्रेनिया जैसे रोगों का कारण पारिवारिक कलह , विषाद, हीन भावना ,गरीबी ,लांछन ,सही देखभाल या लालन पालन न होना माने गए।
 वर्तमान में 'स्वास्थ्य ' की अवधारणा के बहुआयामी होने के कारण इन सभी को रोगों की उत्पत्ति का कारण माना जाता है। इसे 'आधुनिक विचारधारा' भी कहा जा सकता है।

Sunday, 19 April 2020

सबक सिखा रही कोरोना वायरस

      बहुत से सबक सिखा रही कोरोना वायरस -- एक सबक यह भी जन स्वास्थ्य के बारे में ----
          भविष्य की दुनिया की  व्यवस्था में शायद जन स्वास्थ्य सेवा नीति निर्धारक बहस की आधारशिला के रूप में उभरेंगे । पिछले कुछ दशकों में दुनिया की  व्यवस्था स्वास्थ्य सोवा ढांचे के छोटा होने, विनिवेश होने और नीजिकरण की साक्षी है जिसने कि स्वास्थ्य सेवाओं के व्यवसायिकरण की राह को ही आगे बढ़ाया है । महामारी के इस संकट में जब वो देश जिसके पास मजबूत जन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली है जिसमें चीन, सिंगापुर और ताइवान शामिल हैं ने महामारी पर प्रभावी तरीके से काबू पा लिया तो वहीं जिनकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली बाजार आधारित थी जैसे अमेरिका और यूरोपीय यूनियन वे बुरी तरह से तबाह हो गये।
          यहीं पर केरल की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली वैश्विक रूप से प्रासंगिक हुई है।
          केरल ने महामारी पर प्रभावी तरीके से काबू किया है, सक्षमता से सार्वजनिक एक्शन के उपयोग, जन केन्द्रीत स्थानीय प्रशासन, और व्यापक राजनीतिक चेतना के माध्यम से जिसने राज्य के सामाजिक परदिृश्य को परिभाषित किया है। भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में स्वास्थ्य को एक बुनियादी अधिकार और एक वैश्विक सार्वजनिक वस्तु की तरह लिया जायेगा। 
         इसमें  कोई दो राय नहीं कि स्वास्थ्य का उत्पादन नही किया जा  सकता है और उसे कामेडिटी की तरह बेचा भी नही जा सकता है। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य को एक सार्वजनिक वस्तु की अवधारणा को मान्यता दी है और विश्व बैंक उससे पहले ही ऐस कर चुका है, फिर भी मौजूदा संकट फिर से पूरी दुनिया में इस अवधारणा को जिंदा कर रहा है। स्वास्थ्य के एक सार्वजनिक वस्तु की अवधारणा के साथ ही इसमें राष्ट्र राज्य की भूमिका पर और इसकी नैतिक जिम्मेदारी पर भी पुनर्विचार होगा। इस उभरते हुए रूझान के दो आयाम हैं। इनमें से एक है  शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, प्रोद्यौगिकी और सामाजिक सुरक्षा में अधिक निवेश के साथ एक कल्याण राज्य के मॉडल को पुनर्जीवित करना। हम फैलती हुई महामारी को प्रभावी तरीके से नियंत्रित करने में बाजार राज्य के मॉडल की नाकामी को देख चुके हैं। पॉल मेसोन के अनुसार यह एक ऐसे कल्याण राज्य की जरूरत को बना सकता है जिसका फोकस सामाजिक न्याय, समानता और सार्वजनिक वस्तुओं के समान वितरण पर हो सकता है। 

संकट के घने बादल--1

                संकट के घने बादलों के बीच से ही उम्मीद की किरण दिखाई देती  है, यह विश्वास ही वह ताकत देता  है जिसके साथ हम हर चुनौती का सामना करते आये  हैं । आज भूख, अभाव और एक भयानक महामारी की ही सिर्फ विकराल छाया हमें घेरे हुए नहीं है , बल्कि आने वाले दिनों में जिन्दगी काफी मुश्किल में होने जा रही है । पूरे देश में कॉल डाउन ने  जहाँ कुछ राहत दी साथ ही वहीँ समस्याएं भी बहुत खड़ी की हैं |  यह  संकट अभी तक चल रही परिस्थितियों की विषमताओं में और विकराल रूप धारण करने वाला है। 2016 के आर्थिक सर्वे के मुताबिक  77 प्रतिशत लोग किसी तरह जिन्दा रहने की कोशिश में रहते रहे हैं, वे प्रतिदिन की दिहाड़ी से सिर्फ भूख से छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं-उनके पास बचता कुछ भी नहीं है। कैशलेस, यानी बिना पैसे के ही चल रही  है उनकी जिन्दगी। उन्हें बैंक से कोई कर्ज भी नहीं मिल सकता। किसी भी बड़ी जरूरत को पूरा करने के लिये बड़ी  ब्याज दर पर ही उनको  उधार मिल पाता  हैं और इस  ब्याज को ही चुकाने में ही उनकी  जिन्दगी गुजर  जाती है। आज भविष्य भी अंधकार में ही डूबा दीख रहा है, क्योंकि  लॉकडाउन के बाद वापस आने पर उनके वेतन में तो कटौती होगी ही, जो वेतन मिला नहीं, उसकी भी उम्मीद खत्म हो चुकी है। आज 1.3 बिलियन की जनसंख्या में, पूरा एक बिलियन, जो असंगठित क्षेत्र में है, उसका बुरा हाल है । ऐसी स्थिति में महामारी और उसके साथ तालाबंदी से आर्थिक स्तर तो उनका मुश्किल में आ ही चुका है, उत्पादन के सारे क्षेत्रों में भी ठहराव है।   यह जरूरी है कि सरकार को आज पूरी ताकत से अपनी सारी श्रम शक्ति ( गहराते संकट के बीच इस  मेहनतकश जनता) को बचाना ही होगा। आज पूरी व्यवस्था के सामने जो चुनौती है उसे इस  मजदूर तबके के बिना पराजित करना संभव नहीं है , जो समाज में अपनी हर जरूरत के लिये मोहताज रहता है। यह आज सिर्फ भारत की ही नहीं पूरे विश्व की स्थिति है। 
            इसलिये सरकार को, अभाव से जूझती इस जनता को कैश देना होगा, अलाउन्सेज देने होंगे, अगर वे बेरोजगार हैं तो समुचित स्वास्थ्य सुविधा, आर्थिक सहयोग और टैक्सों में छूट देनी होगी। 
जनता की क्रयशक्ति, को फिर से जीवित करने के लिये यह सब भी जरूरी है। लघु और मध्यम स्तर के उद्योग जो पिछले कई वर्षों से विषम कठिनाईयों से जूझते रहे हैं, बिखर भी चुके हैं, इन सबको फिर से जीवित करना होगा। उनकी  समुचित आर्थिक आपूर्ति करनी होगी। 
        इस संकट में सबसे बड़ी समस्या भूख की है-और भोजन जुटाने के लिये कृषि व्यवस्था को उबारना बहुत जरूरी होगा। जन वितरण व्यवस्था से राशन का वितरण भी होता है। फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के पास 77 मिलियन टन अनाज भरा पड़ा है, इसलिये इस अनाज को जनता में बांटने के लिये एफसीआई के गोदामों को खोल देना चाहिये। लेकिन वास्तविकता यह है कि जो छह किलोग्राम अनाज राशन में मुफ्त में बांटने का निर्णय है, उसके लिये भी राज्यों से पैसा मांगा जा रहा है। आर्थिक संकट की लगातार उपेक्षा के नतीजे भी सामने आ रहे हैं। 22 मार्च के बाद से बेरोजगारी में तिगुनी बढ़ोतरी हुई है। यह 8.7 प्रतिशत से 23.4 प्रतिशत तक और फिर 5 अप्रैल तक 30.9 तक पहुंच चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज 20.2 प्रतिशत है। इस तरह पूरे देश में यह बेरोजगारी, सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग इकोनोमी की रिपोर्ट के अनुसार 23. 4 तक पहुंच चुकी है। हमारे देश में वेतनभोगी मजदूरों की संख्या बहुत ही कम है, सिर्फ 22.1 प्रतिशत। बाकी के 78 प्रतिशत अमानवीय परिस्थितियों में, बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के काम करते हैं यही वह मजदूरों की विशाल जमात है, जो अपने घरों की ओर, सैकड़ों मील पैदले चले जा रहे हैं, जहां भूख और बेरोजगारी का एक नया दौर उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। बेरोजगार, बेसहारा और भूखी यह जनता ही देश की वह ताकत है जो देश को समृद्धता देती है, ओर समाज को आगे
ले जाती है। आज यह सत्य क्रमशः विश्व के सामने उजागर हो रहा है, जिसे किसी भी तरह अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस संकट ने पूरी व्यवस्था को एक नया आयाम दिया है, जो दक्षिणपंथी सोच की निरर्थकता को सामने ला रही है।