Wednesday, 25 September 2019

Haryna education and health

आज हरियाणा में चुनाव के दौर में जनता की तरफ से राजनितिक पार्टियों से अपेक्षाएं
आज कल की भयभीत करने वाली राजनीती व शंकट ग्रस्त आर्थिक हालातों के दौर में चनाव के वक्त जनता के वास्तविक मुद्दों पर बातचीत करना बहुत जरूरी है | इस वक्त शिक्षा और स्वास्थ्य जनता के दो अहम मुद्दे हैं ---
1. शिक्षा, विशेष कर स्कूली शिक्षा
  • शिक्षा को समीक्षा के शीर्ष पर रखने का एक खास कारण है । शिक्षा मानव के लिये समाज में व आर्थिक जगत में जगह बनाने की सबसे महत्त्वपूर्ण सीढी है ।
  • वो लोग जो बहुत बड़ी पूंजी के मालिक हैं और बैठे बिठाये ऐसो आराम या रुतबा पा सकते हैं वो भी लैजिटिमेशी के लिये नामी शिक्षण संस्थानों की डिग्री हाँसिल करते हैं । सामंतवादी नोबिलिटी जो अपने वंशानुगत धन पर  धार्मिक सामाजिक मान्यताओं के बल पर मोज मस्ती करती थी वहीं पूंजीवादी आका मेरिटोक्रेसी की दुहाई देकर कमेरे लोगों के आंशिक परिश्रम को हड़पते हैं । पूंजीवादी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक आईडियोलोजी मैरिटोक्रेसी के दर्शन के माध्यम से राज करती है ।


  • मजदूरों व सीमान्तर किसानों के बच्चों के लिये शिक्षा का महत्व और भी ज्यादा है क्योंकि उनके पास और कोई साजो सामान नही जिसके बल पर वो अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य उज्ज्वल बना सकें ।
  • आजादी के बाद और खासकर हरियाणा के स्टेट के रूप में अलग अस्तित्व में आने के बाद में स्कूली शिक्षा की अच्छी शुरूवात हुई थी |गौर तलब है कि प्रदेश में स्कूली सिस्टम कामन स्कूलों (Universal School system) की तर्ज पर ही शुरू हुआ, सरकार की चेष्टा थी कि सभी स्कूलों में एक समान सुविधाएँ हों । यदि आने वाले दशकों में स्कूली शिक्षा वैसे ही सरकारी कर्तव्यों में रहती तो आज हमारे स्कूल विश्व स्तर के होते |नतीजतन आज के दिन 50% से भी ज्यादा छात्र सरकारी स्कूलों से पलायन कर निजि स्कूलों में जा चुके हैं, जहाँ उनके किसान मजदूर व निम्न मध्यम वर्ग के माता पिता को असहनीय मोटी फीस देनी पड़ रही है और वोभी ज्यादातर निजि स्कूलों के हर लिहाज से घटिया यानि सब सटैन्डर्ड है शिक्षा स्तर के लिये|
समाधान क्या हो सकते हैं :-
  • पब्लिक मोर्चा समस्या पर गहन विचार के बाद ईस निश्कर्ष पर पहूँचा है और मेरी भी व्यक्तिगत राय है कि हरियाणा की पीछले 50 सालों की प्रगति व आज की आर्थिक स्थिति (जब राज्य की SGDP 700,000 करोड़ तक पहुँच चुकी है व यहाँ की प्रतिव्यक्ति आय 205'00 रुपये  सालाना है) के हिसाब से प्रदेश के हर बच्चे के लिये सरकारी खर्च से चलने वाले एक जैसे उच्चतम स्तर के स्कूल (also called common schools or universal schools) उपलब्ध कराये जा सकते हैं ।
  • ऐसे टाप क्लास स्कूल परचूर.मात्रा में सिर्फ किताबी ज्ञान ही नही बल्कि खेल कूद, संगीत,गाना बजाना, सांग, फिल्म व जीवन यापन के लिये सभी प्रकार के हाथ के हूनर भी बच्चों को दे सकेंगे ।
  • टाप क्लास कामन स्कूली अनुभव बच्चों में किताबी ज्ञान के साथ सामाजिकता की भावना भरने व उनको स्वस्थ एवमं बलिष्ठ नागरिक बनाने में मील का पत्थर शाबित होंगे । प्रदेश के लिये  आर्थिक व तकनीकी दृष्टि से जापान व योरोपीय देशों की कतार में जगह बनाने में अहम भूमिका अदा करेंगे ।
  • समान स्कूल का अनुभव बच्चों को जाति उँच-नीच, लिंगभेद व साम्प्रदायिक भेदों के संकुचित दायरे से बाहर निकालकर उनको सच्ची देशभक्ती से ओतप्रोत भी करेगा ।
उच्च शिक्षा: प्रदेश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी ज्यादातर सार्वजनिक व पब्लिक बजट से चलने वाली शिक्षा व्यवस्था होना लाज्मी है । सरकारी क्षेत्र के कालेजों व विश्वविद्यालयों में प्रयाप्त रगूलर प्राध्यापकों की भर्ती करके सभी सब-सटैन्डर्ड निजि संस्थानों बन्द किया जाना चाहिये ।
  • सभी शिक्षा संस्थानों में सामाजिक महत्व के अनुसंधान करने वाले संकाय जोड़े जाने की आवश्यकता हैं । ईन सभी संस्थानों को सिर्फ शिक्षाविदों द्वारा (अध्यापकों, छात्रों, उनके अभिभावकों व फील्ड में काम कर रहे गण्य मान्य लोगों की सलाह से) बिना किसी  पार्टी प्रेरित राजनितिक दखल के संचालित किया जाना चाहिए ।
सरकार की मदद से चलने वाले व शिक्षण संगठनों द्वारा संचालित कालेजों की मदद बन्द करने की हाली सरकारी सोच का पब्लिक मोर्चा पूरजोर विरोध करता है ।

दूरगामी परिणाम
  • पब्लिक मोर्चे का मानना है कि उच्चतम कोटी के कामन स्कूलों की व्यवस्था व उच्च शिक्षा के लिये दिये गये ऊपरलिखित सुधारों से प्रदेश में युवाओं के लिये 3-4 लाख नये व रैगुलर रोजगार भी सृजित होंगे और अगले 15 साल में हमारा प्रदेश पढाई,  रिसर्च व आर्थिक विकास में, विकसित देशों के साथ मेज पर बैठ सकेगा ।
  • आखिरकार युनिवर्शल स्कूल सभी वर्गों के बच्चों के विकास के लिये लेवल पलेईंग फील्ड तैयार करेंगे ।
  • कामन व गुणवत्ता पूर्ण स्कूलों का अनुभव बच्चों को संवेदनशील नागरिकों में परिवर्तित करने का और फलस्वरूप समाज में हर तरह के सामाजिक न्याय (औरत मरद की बराबरी की भावना, जाति उत्पीणन का उन्मूलन व धार्मिक द्वेस का अन्त) को परमोट करने का सबसे कोस्ट ईफैक्टिव माध्यम है ।
2. स्वास्थ्य सेवायें-युनिवर्शल स्वास्थ्य सेवा
  • आदमी के जीवन में सेहत की देखरेख व चिकित्सा को सविंधान के जीने के अधिकार को साक्षात करने की दृष्टि से देखा जाना चाहिए । जब तक आधुनिक मैडिकल सांईस वजुद में नही थी तब तक मृत्यु दर अनियंत्रित जन्म दर के बराबर थी,  जीवन अनिस्चितता से भरा पड़ा था, यानि जीने. का अधिकार तरह तरह बीमारियों से लड़ाई करने की क्षमता का मुहताज था । आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के बिना आज भी जीवन उतना ही अनिश्चित होता और ऐसे में जीने का अधिकार भी अधुरा होता ।
  • शूरूवात: आजादी के बाद और विशेष कर हरियाणा के अलग राज्य बनने के बाद सरकार की जिला स्तर के हस्पतालों, पीएचसी व सीएचसी हस्पतालों की की स्थापना करने की एक बहुत ही सकारात्मक पहल थी ।

  • काबिले जिक्र है कि तत्कालिक सरकारों ने बहुत बड़े पैमाने पर टीकाकरण के कार्यक्रम माध्यम से लाखों बच्चों की जिन्दगी बचाने की बड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की थी । 1950 के आसपास पैदा होने वाले बच्चों की ऐसी पहली पीढ़ी थी जिनमें से 90% के आस पास जिन्दा रहे और फले फुले।
  • हरियाणा में स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा(2016-17) सोचने का विषय :
             सरकार द्वारा निश्चित किये गए मापदंडों के हिसाब से 5000 की जनसंख्या पर एक उप स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए, 30000 की जनसंख्या पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए और 1,20,000 की जनसंख्या पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए। 
    हरयाणा की 2016-17 की अनुमानित जनसंख्या 2 करोड़ 79 लाख के लगभग है। 
    इसके हिसाब से हरियाणा में जो ढांचा होना चाहिए और जो है वह नीचे दिया जा रहा है--
    संस्था         जो हैं      जो चाहियें 
    उपस्वास्थ्य   2603     5580
    केंद्र
    पीएचसी       498       930
    सीएचसी।      123       232
    हॉस्पिटल्स       125
    टीबी सेन्टर        15
    पोस्ट पार्टम।      37
    केंद्र
    शहरी स्वास्थ्य     16
    केंद्र
    नोट -- एक सीएचसी में निम्लिखित विशेषज्ञ होने चाहिए
    सर्जन........  1
    शिशु रोग विशेषज्ञ....1
    स्त्री रोग विशेषज्ञ....1
    फिजिशियन....1
    बेहोशी विशेषज्ञ ...1 ( हो सके तो)
        अफसोस की बात है कि हरियाणा की 123 सीएचसी में से एकाध में ही ये सारे विशेषज्ञ होंगे। 
    सिविल अस्पतालों की हालत भी ज्यादा अच्छी नहीं हैं ।
    जनता का भी उसका अपना स्वास्थ्य अभी एजेंडा बनना बाकी है। 
  • यदि ऊपरलिखित सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का लगातार विकास हुआ होता तो हरियाणा आज स्वास्थ्य सेवाओं की दृष्टि से भारत की अग्रणी स्टेट होती, जबकि आज हम 12वें स्थान पर हैं, बंगाल व जम्मु काश्मिर से भी  नीचे, जबकि आर्थिक दृष्टि से बड़े राज्यों की तालिका में हम शीर्ष स्थान पर हैं ।
  • राज्य का रोहतक में स्थित परिमियर मैडिकल कालेज हस्पताल भी डाक्टरों (एक तिहाई तो अधिकारिक स्थान ही खाली पड़े हैं) व साजोसामान की भारी कमी की दृष्टि से खुद बीमार है ।
जिला, तहसील या ब्लाक स्तर के हसपताल तो बिना प्रयाप्त डाक्टरों, नर्सों, दवाईयों व टेस्टिंग व्यवस्थाओं के मरणासन्न पर हैं ।
  • पूरे हरियाणा के स्तर पर मात्र 2100 डाकटर हैं और कुल 21000 के आसपास स्टाफ हैं । WHO के मानकों के हिसाब से तो 2.8 करोड़ की आबादी के लिये 28000 डाक्टर चाहियें । सरकारी व्यवस्था के नकारा होने के चलते ज्यादातर पब्लिक को निजि हस्पतालों में अपनी जेब खाली करवाने और ज्यादातर सब-स्डैन्डर्ड चिकित्सा व्यवस्था पर निर्भर रहने के ईलावा और कोई चारा नही । रोज सैंकड़ो  हरियाणा वासी सम्मुचित ईलाज की व्यवस्था के ईलाजी बीमारियों (curable diseases) से मर रहे हैं ।
  • हरियाणा का कोई मन्त्री या बड़ा ब्यूरोक्रेट सरकारी हस्पतालों में ईलाज नही करवाता बल्की गुड़गांव के 7 सितारा निजि हस्पतालों में पब्लिक टैक्स को खर्च पर अपना ईलाज करवाते हैं ।
  • सरकारी खर्च पर निजि हस्पतालों में ईलाज की अनुमती सरकार के ईस ईरादे को जाहिर करती है कि वे सरकारी हस्पतालों को साजोसामान से सुसज्जित करने का ईरादा भी छोड़ चुके और पुरी बेशर्मी से पब्लिक हैल्थ केयर की जिम्मेवारी से मूकर गये ।
  • बी जे पी का 2014 का चुनाव घोषणा पत्र ---
  • हेल्थ 12 स्वास्थ्य घोषणा पत्र बीजेपी 2014 हरियाणा :
    1 प्रत्येक बालक - बालिका , महिला एवं वृद्धों को अनिवार्य स्वास्थ्य कार्ड जारी किया जायगा और उन्हें कुपोषण से मुक्त रखने के सन्दर्भ में बजट में विशेष तौर पर धन राशि का प्रावधान किया जाएगा।
    2 मौसमी बीमारियों के लिए स्वास्थ्य विभाग को अपडेट किया जाएगा।
    3 स्टेट लिकर पालिसी का पुनरवलोकन कर इसमें जन -स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए सुधार किया जाएगा।
    4 प्राइवेट हस्पताल जिन्होंने सरकार से भूमि सस्ती दर पर ली है , उन द्वारा 25 प्रतिशत मरीजों का निःशुल्क इलाज , स्वास्थ्य सेवाएं, (विभिन्न टेस्टों सहित) प्रदान करने की नीति लागू की जाएगी।
    5 सरकारी अस्पताल , प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आदि मरीजों को अनुदान प्राप्त हस्पतालों को रेफर कर सकेंगे ।
    6 दो लाख रुपये तक वार्षिक आय वाले परिवारों के लिए चिकित्सा मुफ्त दवाई योजना लागू की जाएगी। 
    7 शिशु एवम 70 वर्ष से अधिक के बुजुर्गों के लिए सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त specialisation  बेस्ड विशिष्टीकरण पर आधारित प्रत्येक विधान सभा क्षेत्र में एक हस्पताल खोला जाएगा।
  • जनता देखे कितना पूरा हुआ यह घोषणा पत्र | मेरे हिसाब से शायद ही किसी विधान सभा में स्पेशलिस्ट हस्पताल खुला हो | 
समाधान:
  • युनिवर्शल हैल्थ केयर व्यवस्था ही ईसका एकमात्र जवाब है,  जहाँ सभी गरीब अमीर नागरिकों को सर्वोत्तम स्वास्थ्य सेवा जेब से कुछ दिये बिना मिले । यह सेवा बर्तानिया की नेशनल हैल्थ सर्विस की तरज पर स्थापित की जा सकती है । बाकी योरोप के देशों जैसे जर्मनी फ्रांस की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं तथा क्युबा (जो आर्थिक दृष्टि से भारत जैसा ही है) व दुसरे सफल व किफायती (पूरे राज्य के स्तर पर) स्वास्थ्य सेवाओं के सकारात्मक पहलुओं को शामिल करके ।
  • ऐसी युनिवर्शल स्वास्थ्य सेवा को सृजित करने के लिये राज्य सरकार को राज्य की SGDP का 5-6% खर्च करना पड़ेगा और यह खर्च अति आवश्यक व लाभदायक है ।
  • कूल खर्च का एक छोटा हिस्सा नागरिकों से   भी उनकी ईन्कम के हिसाब से एक मुस्त सालाना या माहवार स्वास्थ्य सेवा शुल्क के रूप में लिया जा सकता है ।
  • बर्तानिया (जहाँ 6.5 करोड़ आबादी की स्वास्थ्य सेवाओं के लिये NHS में 15 लाख लोग काम करते हैं) व दुसरे विकसित देशों के आंकड़ों से पता लगता है कि युनिवर्शल स्वास्थ्य सेवाएँ देने के लिये 4-5 लाख युवाओं को रैगुलर व लाभप्रद रोजगार भी मिलेंगे ।
  • युनिवर्शल स्वास्थ्य सेवाओं से नागरिकों के जीवन में जो सिक्योरिटी आती है उसका कोई और दुसरा उपाय नही । यह जीने के मौलिक आधार को साकार बनाने का सबसे बड़ा स्तम्भ सिद्ध हो सकता है  ।
रणबीर सिंह दहिया
रिटायर्ड सीनियर प्रोफेसर सर्जरी
पी जी आई एम एस रोहतक

Tuesday, 24 September 2019

जन स्वास्थ्य अभियान के सामने कार्य

डॉ सुन्दररमन
जन स्वास्थ्य अभियान के सामने कार्य 

1 आयुष्मान भारत : प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ( मोदी केयर )

2. आयुष्मान भारत : स्वास्थ्य एवं अच्छा होने के केंद्र 

3. स्वास्थ्य व्यवसायिक बनाना : स्वास्थ्य लाभ शिक्षा तथा व्यवसायिक नियमों की बदलती नीतियां 

4. निजीकरण : पब्लिक --प्राईवेट सांझेदारी तथा स्वास्थ्य उद्योग का विकास ; नीति आयोग का काम 

5. दवाओं , पेटेंटों तथा नवाचारों तक पहुंच का विकास 

6. स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य लाभ से जुड़े लैंगिक मुद्दे 

7. स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारक 

 1. आयुष्मान भारत : 

 एन डी ए सरकार के अंतर्गत शुरू किया गया यही मुख्य कार्यक्रम है।  यह सन 2019 में शुरू किया गया।  इस कार्यक्रम के दो पक्ष हैं - स्वास्थ्य  व स्वास्थ्य लाभ केंद्र और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना।  पहला पक्ष सम्यक प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच का तथा दूसरा पक्ष सरकार द्वारा स्वास्थ्य बीमा योजनाऐं उपलब्ध कराना है तथा गरीबी रेखा से नीचे परिवारों की सुरक्षा निश्चित करना , जिन्हें द्वितीय और तृतीय स्टार की स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत है।  

            हम यहाँ हर योजना का वर्णन कर रहे हैं।  हम उन समस्याओं को  भी लेना चाहते हैं कि ये योजनाएं किस तरह बनायीं गई हैं और किस तरह काम कर रही हैं।  इसके साथ साथ हम  यह भी बताना चाहते हैं कि जन स्वास्थ्य अभियान तथा जन विज्ञानं आंदोलन तथा सभी जनवादी शक्तियों को इन नीतियों तथा इनके क्रियान्वन  देखना चाहिए।  

       प्रधान मंत्री की जन आरोग्य योजना ( मोदी केयर )

* यह योजना है क्या ?

एक वर्णन 

         यह सरकार द्वारा अनुदान प्रदत्त स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम है, जो जनगणना के अनुसार सामाजिक-आर्थिक  जातियां हैं , जो विशेष पेशों से जुडी हैं वो ही इस योजना के लिए योग्य हैं।  एक अनुमान के अनुसार 10. 74  करोड़ परिवार यानि लगभग 50 करोड़ व्यक्ति इस योजना के लिए पात्र हैं।  


          इस योजना में कोई भी पात्र व्यक्ति  द्वितीय या तृतीय स्तर की स्वास्थ्य सेवा की जरूरत हो , अपने  इलाज हेतु किसी भी मंजूर पैनल के हस्पताल में जा सकता है।  हस्पताल बिना कुछ लिए उन्हें भर्ती करेगा और उनका इलाज करेगा।  सभी दवाइयां यहाँ तक की टैस्ट और कुछ हद तक यातायात सुविधा भी मरीज को मुफ्त मिलेंगी।  सरकार एक  अनुसार हस्पताल को वह खर्च दे  देगी।  एक परिवार एक साल में 5 लाख रूपये तक भी ऐसी सुविधाएँ ले सकता है।  इसमें पुराणी बीमारियां भी हो सकती हैं तथा हस्पताल के पहले और बाद तक के भी कुछ खर्चे शामिल  हैं।  

      प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में 1350 चिकित्सीय पैकेज शामिल हैं, जिनमें सर्जरी व प्रतिदिन के इलाज भी शामिल हैं। 

     इस योजना के तहत सरकारी एवं प्राइवेट दोनों प्रकार के हस्पताल पैनल पर हैं।  लगभग 60 % दावेदारों का और कुल खर्च  का लगभग 75 % प्राइवेट सैक्टर के हस्पताल अदा करते हैं। 

         इसमें प्रति परिवार प्रति वर्ष 5 लाख रूपये का लाभ दिया जाता है। 

2. प्रचार माध्यमों में इस योजना का बहुत स्वागत किया गया है।  जनता और देनदारों ने भी इसका स्वागत किया है।  इस योजना का इतना स्वागत क्यों है ? 

       १. मुफ्त या रियायती हिसाब से प्राइवेट हस्पतालों में सुविधा सुनिश्चित करना ताकि उच्च गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवाएं सभी को मिल सकें।  
              यद्यपि सरकारी चिकित्सा सुविधाओं की क्षमता बहुत सीमित है , इसलिए लोगों को मजबूर होकर इलाज के लिए निजी क्षेत्र में जाना पड़ता है। निजी स्वास्थ्य सेवाएं महंगी हैं,इनके आर्थिक बोझ से पूरा परिवार प्रभावित होता है । इससे बचने के लिए बीमा योजनाएं हैं । यहां जनता का स्वागत है। 
ii) निजी हस्पतालों के पास बिना प्रयोग होने वाली बड़ी क्षमता है। उनके पास बीमारों की कमी नहीं है, अपितु उनकी कमी है जो पैसे दे सकें। आधुनिक हस्पतालों को बड़ा लाभ इसी बात से हो जाता है कि वे उच्च तकनीक के जांच, तरीके या सर्जरी सुझाते हैं। इनकी जरूरत जिनको है उन्हें मना लिया जाता है, बेशक सीमित ही सही सरकार द्वारा दिये पैसे से बीमा योजना को भारत का निजी स्वास्थ्य उद्योग कहा जा सकता है।
iii) मीडिया, समाज या बुद्धिजीवी तबके में इसका स्वागत इसलिये है कि निजी क्षेत्र की ओर जाने को वे समय के साथ जरूरी सुधार के रूप में देखते हैं। निजी सेवाओं में वे सरकारी सेवाओं की अपेक्षा अच्छी गुणवत्ता देखते हैं।ऐसा केवल गरीब या कमजोर तबके का ही   मानना नहीं है अपितु मध्यम वर्ग भी ऐसा ही मानता है। ये भिन्न भिन्न सोच इसलिए है कि निजी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर असमानताएं हैं। इसके चलते इन तबकों में सरकार के विरुद्ध तथा निजी क्षेत्र के प्रति अच्छा प्रभाव बनता है।

3. सरकार इस योजना को बड़ी सफलता मानती है और इसे मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि समझती है । इसमें सच्चाई कितनी है और ढकोसला कितना?
i) सरकार का दावा है कि 'मोदीकेयर' दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना है । यह सत्य से दूर है । बजट देने के हिसाब से देखा जाय तो यह छोटी योजनाओं में से एक है । यहां तक कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से भी छोटी तथा बहुत से राज्यों द्वारा स्वास्थ्य पर किये जाने वाले खर्च से भी कम । बीमा कवरेज में भी ये बहुत पीछे रहती है बनिस्बत दूसरे देशों की योजनाओं के । जनसंख्या के हिसाब से भी ये चीन से भी कम कवर करती है।
ii) संख्या की दृष्टि से इसमें 3 करोड़ इसमें शामिल हैं,जबकि स्मार्ट कार्ड की दृष्टि से 12 करोड़ इसके योग्य हैं। 
iii) जिन अधिकतर राज्यों में प्रधानमंत्री 
जन आरोग्य योजना प्रभावी दिखाई दे रही है , ये वे राज्य हैं जो पहले  से अपनी योजनाओं पर काम कर रहे हैं , केंद्र ने तो उन पर अपने नाम का ठप्पा लगाया है। सरकार केवल 60%खर्च वापसी पर प्रतिबद्ध है,जबकि यह भी पूरी तरह किया नहीं गया है। राज्य सरकारों को अपने नियमों को बदलने के लिए कहा जा रहा है,जहाँ पहले से ही प्रभावी योजनाएं काम कर रही हैं ।फ़लस्वरूप केरल जैसे राज्य इससे दुखी हैं। 
iv) सरकार का दावा इस बात पर आधारित है कि राज्यों से कितने क्लेम आये, कितनों को पैसे मिले। इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है कि इनसे स्वास्थ्य परिणामों में कितनी बेहतरी हुई है तथा स्वास्थ्य सेवाओं के खर्चों की मुशीबत से कितने गरीबों को बचाया जा सका है। पूर्व सरकार की बीमा योजनाओं पर बहुत से अध्ययनों से निम्नलिखित बातें सामने आई हैं :-
a) सूचनाओं का अभाव - बहुत से योग्य व्यक्तियों को इन योजनाओं का पता ही नहीं होता और वे इसका लाभ नहीं ले पाते ।
b) सेवा देने से इन्कार:- 
वे जो योग्य  भी हैं और इन्हें जानते भी हैं ,उनकी बड़ी संख्या तकनीकी आधारों पर लाभों से वंचित कर दी जाती है। राज्य सबसे ज्यादा यह बहन करते हैं कि इसमें अमुक बीमारी या प्रक्रिया शामिल नहीं है ,और यहां हस्पताल में यह विशेष सेवा है ही नहीं ।
c) दोहरे बिल :-
जो किसी भी तरह इस योजना के तहत सेवा लेने में सफल हो जाते हैं , उनमें से अधिकांश से किसी न किसी तरह उनकी जेबों से इन सेवाओं के लिए निकलवा लिया जाता है।मुफ्त व नकद रहित सेवाएं तो एक मिथ है । ज्यादा  से ज्यादा उनको 20% कम देना पड़ता है उनकी अपेक्षा जिनके पास कार्ड होता है। मरीज से ले लिया जाता है और फिर हस्पताल सरकार से भी भुगतान कर लेता है ।
d) सप्लाई आधारित सेवाएं:-
हस्पताल प्रायः वे प्रकिर्याएँ अपनाते हैं जिनसे उन्हें लाभ ज्यादा होता है और उन सेवाओं से इनकार कर देते हैं जहां मुनाफा कम रहता है। बहुत बार वे ऐसे मरीजों को ज्यादा भर्ती करते हैं जो उनकी सप्लाई व प्रकिर्याओं पर खरे उतरते हों । यदि हम जिलों पर किये गए क्लेम का पैटर्न दीखें तो पाएंगे कि इनका महामारियों से कोई ज्यादा रिश्ता नहीं बनता अपितु उस बात से ज्यादा रहता है जिन्हें ये निजी वाहक ज्यादा आगे धकेलते हैं। 
e) सरकारी सेवाओं के सहायक के रूप में नहीं अपितु विकल्प के रूप में:- 
       निजी क्षेत्र लाने का उद्देश्य यह था कि उन प्रकिर्याओं तक पहुंचा जाए जो इस समय सरकारी हस्पतालों में उपलब्ध नहीं हैं। यदि हम हर राज्य के क्लेम की पड़ताल करें तो पाएंगे कि या वही सामान्य क्षेत्र हैं जहां सरकार पहले ही सेवाएं दे रही हैं।उदाहरण के लिए यू.पी.,बिहार व छत्तीसगढ़ में आंखों की वही सामान्य सर्जरी सेवा है जो सरकारी सेवा जैसी ही हैं । यदि गुर्दे की पथरी , आंखों की गम्भीर बीमारी , पेट में अधिक जलन जैसी बातों पर आये तो पता चलता है कि इस बीमा योजना का योगदान बहुत कम है।
f) ठीक से देखभाल नहीं व दवाना :-
पहले किसी निजी हस्पताल में गरीब मरीज के लिए सेवाएं नहीं होती थी तो उसे रेफर कर देता था। आज वही हस्पताल उस मरीज को दाखिल करता है , उस मरीज के स्मार्ट कार्ड का सारा पैसा चूस लेता है औए फिर आगे रैफर करता है। इससे इलाज में विलंब होता है , जब तक मरीज सरकारी हस्पताल में पहुंचता है , वह सभी संसाधनों से विहीन हो जाता है । मरीजों द्वारा अपनी बीमा रकम को सरकारी हस्पताल में डुबो देना सामान्य बात है।
अमेरिका तक में ऐसा ही है।
4. क्या सरकार इन समस्याओं से अवगत नहीं ?
     इन्हें ठीक करने के लिए क्या किया गया है? क्या इससे ज्यादा नहीं किया जा सकता? यदि सरकार इन मुद्दों पर गंभीर हो तो क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि बीमा कार्यक्रमों से राहत मिलेगी?
  सरकार को इन समस्यों का पता है। सरकार के पास परेशानियां दूर करने तथा मॉनिटरिंग करने के तरीके हैं। परेशानियां दूर करने का पूर्ण प्रयोग नहीं किया जाता ,क्योंकि दावेदार ही अपने दावों को पूरी तरह से नहीं समझते। जो दावों के लिए जाते भी हैं , उन्हें अनुभव कम है । समस्या वह है कि यदि कोई कष्ट उठा कर अपनी परेशानियां आगे ले भी जाता है ,तो निजी हस्पतालों को नाममात्र की सजा मिलती है । इसी प्रकार मानीटरिंग करने के तरीके बहुत कमजोर हैं । यदि वे थोड़ा बहुत काम करते भी हैं तो सरकार भी ऐसे गलत हस्पतालों पे कार्यवाही करने की इच्छुक नहीं दिखती । अंदरखाने इनके बीच एक समझ बनी हुई है कि इस प्रकार की धोखा धोखा धड़ी जायज है , वरना ये निजी हस्पताल इसमें शामिल नहीं होंगे । 
     इस प्रकार हस्पतालों को अदा करने की दर आजकल कम चल रही है। लेकिन बात केवल इतनी ही नहीं है। यह तो एक आसान बहाना है, जिससे दोहरे बिल लिए जा रहे हैं। मानीटरिंग करने वाले भी इससे सहमत रहते हैं , बेशक नियमों की अनदेखी हो। अदायगी में देर होना भी अनैतिक है और इसके लिये तो खासकर जो अदायगी में देरी या अनिश्चितता को सम्भाल नहीं पाता।
   क्या सरकार इन विकृतियों को दूर करने के लिए गंभीर थी?
यदि सरकार इन योजनाओं की ठीक मानीटरिंग , परेशानियां दूर करने के ठीक प्रबन्ध करती तो निजी हस्पतालों की इनमें  भागीदारी घट जाती। वर्तमान
दरों पर भी निजी हस्पताल इनमें आने के इच्छुक नहीं हैं। वह स्वयं में कोई बुरी बात नहीं है, क्योंकि सरकारी हस्पताल रहेंगे , बेशक लाभ के लिए नहीं, इन दरों पर वे भी नैतिक आधार पर कुछ प्रबन्ध करेंगे।
   जब ऐसा दृश्य है कि बीमा व खरीद के लिये प्राइवेट क्षेत्र सरकारी क्षेत्र में खानापूर्ति ही कर रहा है , तो इसके भी वैचारिक कारण हैं जिन्हें हमारे नीति निर्माता स्वीकार करने को तैयार नहीं ।
    यदि मानीटरिंग ठीक की जाये तो दोहरे बिल और अदायगी न देने को सम्भाला जा सकता है। यदि नियमों में सख्ती कर दी जाये तो सप्लाई आधारित देखभाल दुरुस्त की जा सकती है। यहां फैंसले व देखभाल इस बात से प्रभावित होती हैं कि धन कहां से आता है न कि इस बात से कि भला होने वालों के दृष्टिकोण से।
5. बहुत से देशों में बीमा योजनाएं ठीक चल रही हैं । ये देश ठीक कैसे चल रहे हैं? 
इन रणनीतियों को अपनाने में हमारी सरकार को कौन रोकता है?
  जर्मनी और जापान में ऐसे उदाहरण हैं जहां सेवा देने वाले प्राइवेट हैं तथा भुगतान बीमा प्रक्रिया से होता है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसा ही है । यद्यपि सरकारी सेवा का अनुपात काफी ज्यादा है।
   इनका सबसे प्रमुख फीचर ही यही है कि ये आपसी सहयोग के सिद्धांत पर बने हैं । इस बात की ओर ज्यादा ध्यान दिया जाता है कि सेवा दाता सुनिश्चित हो कि भुगतान तुरन्त हो जाये। जापान में कानून है कि स्वास्थ्य सेवाओं से आप लाभ नहीं लेंगे। इसीलिए इसके लिए सीधे या कारपोरेट द्वारा सहायता नहीं ली जाती , क्योंकि लाभांश दिया ही नहीं जाता । जर्मनी में बीमा कंपनियों का लाभ लेना मना है , यदि नुकसान होता है तो उसकी भरपाई सरकार करती है और बराबरी सुनिश्चित करती है।
   जिन देशों में भी यह बीमा योजना आधारित है , उनके कड़े कानून हैं , जहां स्वास्थ्य सेवाओं के बदले कीमत दी जाती है । जहां बीमा नहीं है वहां भी सरकारी हिसाब से कीमत दी जाती है ।ऑस्ट्रेलिया व कनाडा में सारा भुगतान सरकार करती है । वे अमीर गरीब सब से टैक्स इकट्ठा करती हैं, लेकिन इलाज सभी का एक समान।
जन स्वास्थ्य अभियान के सामने कार्य
1 आयुष्मान भारत : प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ( मोदी कायर )
2. आयुष्मान भारत : स्वास्थ्य एवं अच्छा होने के केंद्र
3. स्वास्थ्य व्यवसायिक बनाना : स्वास्थ्य लाभ शिक्षा तथा व्यवसायिक नियमों की बदलती नीतियां
4. निजीकरण : पब्लिक --प्राईवेट सांझेदारी तथा स्वास्थ्य उद्योग का विकास ; नीति आयोग का काम
5. दवाओं , पेटेंटों तथा नवाचारों तक पहुंच का विकास
6. स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य लाभ से जुड़े लैंगिक मुद्दे
7. स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारक
 1. आयुष्मान भारत :
 एन डी ए सरकार के अंतर्गत शुरू किया गया यही मुख्य कार्यक्रम है।  यह सन 2019 में शुरू किया गया।  इस कार्यक्रम के दो पक्ष हैं - स्वास्थ्य  व स्वास्थ्य लाभ केंद्र और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना।  पहला पक्ष सम्यक प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच का तथा दूसरा पक्ष सरकार द्वारा स्वास्थ्य बीमा योजनाऐं उपलब्ध कराना है तथा गरीबी रेखा से नीचे परिवारों की सुरक्षा निश्चित करना , जिन्हें द्वितीय और तृतीय स्टार की स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत है।
            हम यहाँ हर योजना का वर्णन कर रहे हैं।  हम उन समस्याओं को  भी लेना चाहते हैं कि ये योजनाएं किस तरह बनायीं गई हैं और किस तरह काम कर रही हैं।  इसके साथ साथ हम  यह भी बताना चाहते हैं कि जन स्वास्थ्य अभियान तथा जन विज्ञानं आंदोलन तथा सभी जनवादी शक्तियों को इन नीतियों तथा इनके क्रियान्वन  देखना चाहिए।
       प्रधान मंत्री की जन आरोग्य योजना ( मोदी केयर )
* यह योजना है क्या ?
एक वर्णन
         यह सरकार द्वारा अनुदान प्रदत्त स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम है, जो जनगणना के अनुसार सामाजिक-आर्थिक  जातियां हैं , जो विशेष पेशों से जुडी हैं वो ही इस योजना के लिए योग्य हैं।  एक अनुमान के अनुसार 10. 74  करोड़ परिवार यानि लगभग 50 करोड़ व्यक्ति इस योजना के लिए पात्र हैं।

          इस योजना में कोई भी पात्र व्यक्ति  द्वितीय या तृतीय स्तर की स्वास्थ्य सेवा की जरूरत हो , अपने  इलाज हेतु किसी भी मंजूर पैनल के हस्पताल में जा सकता है।  हस्पताल बिना कुछ लिए उन्हें भर्ती करेगा और उनका इलाज करेगा।  सभी दवाइयां यहाँ तक की टैस्ट और कुछ हद तक यातायात सुविधा भी मरीज को मुफ्त मिलेंगी।  सरकार एक  अनुसार हस्पताल को वह खर्च दे  देगी।  एक परिवार एक साल में 5 लाख रूपये तक भी ऐसी सुविधाएँ ले सकता है।  इसमें पुराणी बीमारियां भी हो सकती हैं तथा हस्पताल के पहले और बाद तक के भी कुछ खर्चे शामिल  हैं।
      प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में 1350 चिकित्सीय पैकेज शामिल हैं, जिनमें सर्जरी व प्रतिदिन के इलाज भी शामिल हैं।
     इस योजना के तहत सरकारी एवं प्राइवेट दोनों प्रकार के हस्पताल पैनल पर हैं।  लगभग 60 % दावेदारों का और कुल खर्च  का लगभग 75 % प्राइवेट सैक्टर के हस्पताल अदा करते हैं।
         इसमें प्रति परिवार प्रति वर्ष 5 लाख रूपये का लाभ दिया जाता है।
2. प्रचार माध्यमों में इस योजना का बहुत स्वागत किया गया है।  जनता और देनदारों ने भी इसका स्वागत किया है।  इस योजना का इतना स्वागत क्यों है ?
       १. मुफ्त या रियायती हिसाब से प्राइवेट हस्पतालों में सुविधा सुनिश्चित करना ताकि उच्च गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवाएं सभी को मिल सकें।  यद्यपि


















Monday, 23 September 2019

ग्लोबल वार्मिंग

धरती का औसत तापमान 15 डिग्री सेल्सियस है। वायुमंडल इसे बरकरार रखने में मदद करता है। इसकी भूमिका ग्रीन हाउस में शीशे या प्लास्टिक जैसी होती है। अगर वायुमंडल की परत नहीं होती तो धरती एक जमा हुआ ग्रह होती और शायद यहां जिंदगी कभी नहीं पनपती। लेकिन धरती के ग्रीन हाउस का ज्यादा गर्म होना भी अच्छा नहीं है। पिछले कई दशकों से कुछ ऐसा ही हो रहा है। धरती का औसत तापमान बढ़ रहा है और
इससे मौसम का मिजाज बदल रहा है। इसे ही आप ग्लोबल वार्मिंग या वैश्विक तापन के नाम से जानते हैं।

जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन क्या आज हम सबके लिए  एक खतरे की घंटी है?
आज बदलती हुई जलवायु संबन्धित परिस्थितियाँ पृथ्वी के
हरेक  कोने पर प्रभाव  डाल  रही हैं । जलवायु परिवर्तन के मुख्य  प्रभाव  
 निम्नलिखित हो सकते हैः
1. पृथ्वी का औसत तापमान पूर्व औद्योगिक काल की
तुलना में  1° सेन्टीग्रेड बढ़ा है और 2030 से 2052
के मध्य यह बढ़कर 1.5° सेन्टीग्रेड हो जाएगा अगर
तापमान वृद्धि इसी अनुपात में  बढ़ती जाएगी ।
2. ध्रुवों  पर मौजूद  बर्फ तेजी से पिघलती जा  रही है जिससे
समुद्री सतह  में  वृद्धि हो रही है। इन सबके
परिणाम स्वरूप तटीय क्षेत्रों, छोटे द्वीपों एवं आसपास
के शहरों मे बाढ़ आदि  का खतरा बढ़ गया है।
3. वर्षा का हिसाब किताब  बदल गया है जिसके फलस्वरूप
कहीं सूखे जैसी स्थिति है तो कहीं बाढ़ जैसी।
4. प्रमुख खाद्य एवं संसाधन क्षेत्र जैसे कृषि, वन विभाग,
मत्स्य पालन आदि की गुणवत्ता एवं मात्रा में भारी
गिरावट आई है और यह तेजी से घटती ही जा
रही है।
5. कई प्रकार के पेड़ पौधे एवं जीव जन्तु लुप्त होते जा
रहे हैं और कुछ लुप्त हो भी गए हैं।
6. बढ़ते हुये तापमान के कारण ऋतुएं लंबी हो गई हैं
जिसके कारण कीट प्रजाति के वर्ग में उत्तर की ओर
बढ़ोत्तरी देखी गई हैं।
7. कम विकसित देशों के लोगों को जलवायु परिवर्तन
के कारण अधिक परेशानियों का सामना करना पड़

रहा है। 

Wednesday, 21 August 2019

जन स्वास्थ्य हरियाणा मांग घोषणा पत्र 
मौजूदा स्वास्थ्य परीस्थिति, जो कि पूर्णरुप से खारीज करने लायक है, को पलट सकें तथा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियां तथा स्वास्थ्य सेवाएं लागू करते हुए सबके लिए स्वास्थ्य का सपना साकार कर सकें, उसके लिए जन  स्वास्थ्य अभियान हरयाणा  ने एक घोषणा पत्र जारी  किया 2014 में  जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं
   
1- स्वास्थ्य के सामाजिक निर्णायकों पर ध्यान हो- इसके अन्र्तगत स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देना , लोक वितरण प्रणाली को सार्वभौमिक बनाना होगा जिसके तहत स्थानीय खाद्य पदार्थों को बढ़ावा दिया जाए। राष्ट्रीय शिशु स्वास्थ्य एवं पोषण नीति बनाई जाए जिसके अंतर्गत आई सी डी एस का सार्वभौमिकीकरण हो व तीन साल तक के बच्चों को पूर्ण रुप से शामिल करने हेतू सेवाओं तथा कार्यदल में विस्तार हो। समस्त गावों व मोहल्लों में शुद्ध एवं सुरक्षित पेयजल की सार्वभौमिक उपलब्धता हो तथा हर गांव व मोहल्ले में स्वच्छ शोचालयों तक सार्वभौमिक पहुंच हो।
2- स्वास्थ्य सम्बन्धित लैंगिक पहलूओं को सम्बोधित किया जाए -इसके अंर्तगत समस्त महिलाओं तथा समलैंगिक नागरिकों को समेकित , आसानी से उपलब्ध उच्चगुणवतापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच व इसकी उपलब्धता की गाारण्टी दी जाए जो कि केवल मातृत्व सवास्थ्य सेवाओं तक ही सीमित न हो। उन समस्त कानून ,नीतियों तथा आाचरणों को समाप्त किया जाए जो कि महिलाओं के प्रजनन, यौनिक तथा जनतांन्त्रिक अधिकारों का हनन करता है। जो भी विभिन्न प्रजनन प्रोद्योगिकियां जो कि महिलाओं के लिए हानिकारक हो सकती हैं उन्हें नियंत्रित किया जाए । लिंग आाधारित उत्पीड़न को एक लोक स्वास्थ्य समस्या माना जाए तथा इसके तहत शारीरिक एवम मानसिक रुप से पीड़ितों को तमाम आवश्यक स्वास्थ्य जांच, दस्तावेजिकरण, रेफरल का अधिकार दिया जाए तथा समन्वित नैतिक चिकित्सीय कानूनी प्रक्रियाओं के लिए भी उन्हें अधिकृत बनाया जाए । स्वास्थ्य सेवाओं को किषोर किषोरियों के लिए मित्ऱतापूर्ण बनाया जाए तथा इस तबके को भी समेकित, उच्चगुणवता पूर्ण , आासनी से पहुंचने लायक स्वास्थ्य सेवाएं सुनिष्चित हो जो कि उनके विषेश प्रजनन तथा यौनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करती हों।
3- समस्त जाति आधारित भेदभाव तुरंत समाप्त किया जाए- जाति आधारित भेदभावों को, जो कि बुरे स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण सामाजिक कारक है , पूर्णरुप से समाप्त करने हेतू त्वरित एवं प्रभावी कदम उठाये जाएं। मानव द्वारा मैला ढोने वाले समस्त मैनुअल कार्य पूर्ण रुप से प्रतिबन्धित हों। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में इस भेदभाव से पीड़ित तबकों को प्राथमिकता दी जाए । इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं का पुर्नगठन किया जाए।
4- स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार को संवैधानिक बनाया जाए- देश में स्वास्थ्य के अधिकार का कानून लागू किया जाए जो कि समेकित, उच्चगुणवतापूर्ण, आसानी से उपलब्ध सेवाओं को सुनिष्चित करता हो तथा प्राथमिक, द्वितीय एवं तृतीय स्तरीय सेवायें आवष्यकतानुसार सबको उपलब्ध करता हो। सेवा प्रदाता को सेवाओं को उपलब्ध नहीं कराने या मना करने पर ;चाहे गुणवता,पहुंच या खर्च से जुड़े हुए कारणों से भी हो, उसे कानूनी अपराध घोषित किया जाए।
5- स्वास्थ्य के उपर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाया जाए-सकल घरेलू उत्पाद के कम से कम 3-6 प्रतिशत को स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित किया जाए जो कि 2014 की स्थििति में प्रति व्यक्ति 3000 रुपये बनता है।
इस व्यय में कम से कम एक तिहाई केन्द्रिीय सरकार से राज्यों को उपलब्ध हो। हरियाणा सरकार का प्रति व्यक्ति खर्च 1786 है। एक मध्य सीमा के तहत स्वास्थ्य के उपर किये जाने वाले समस्त सार्वजनिक व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 5% तक बढ़ाया जाए।
6- स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं गुणवता सुनिश्चित की जाए-समस्त स्वास्थ्य सुविधाओं में सेवाओं की गुणवता सुनिश्चित की जाए जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी , सुरक्षित , गैर शोषणीय बनाये तथा लोगों को सम्मानपूर्वक सेवायें उपलब्ध हों। मरीजों के अधिकारों का आदर हो एवं मरीजों की आराम तथा संतुष्टि पर ध्यान दिया जाता हो। गुणवता का मानक केवल भौतिक या चिकित्सकीय संरचना पर आधारित न हो जो कि प्रायः बड़े कार्पोरेट अस्पतालों या मैडीकल टूरिज्म को बढ़ावा देते हैं तथा कम खर्च में सही एवं प्रभावी सेवाओं के प्रदाय को बढ़ावा नहीं देता है। समस्त लोक सवास्थ्य संस्थान अपने स्तर पर गारन्टी की गई सभी स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदान करने हेतू बाध्य हों । समस्त लोक स्वास्थ्य सुविधाओं को किसी भी प्रकार के उपभोग्ता शुल्क से मुक्त किया जाए तथा सेवाएं शासन द्वारा संचालित सुविधाओं के माध्यम से उपलब्ध कराया जाए न कि निजी सार्वजनिक सहयोग व्यवस्था से।
7- स्वास्थ्य सेवाओं का सक्रीय एवं निष्क्रिय निजीकरण बंद हो- सक्रीय निजीकरण के तरीके ; जैसे सार्वजनिक संसाधन या पूंजी को निजी संस्थानों को वाणिज्यिक हस्तानन्तरण करना , पूर्ण रुप से बंद करने हेतू आवश्यक कदम उठाया जाए। निष्क्रिय रुप से हो रहे निजीकरण को रोकने के लिए लोक सुविधाओं में निवेश बढ़ाया जाए। सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों से प्रदत सेवाएं केवल प्रजनन स्वास्थ्य,टीकाकरण एवं अन्य चुनिन्दा बीमारियों के नियन्त्रण पर सीमित न होकर समेकित स्वास्थ्य सेवाओं पर आधारित हो।
8- स्वास्थ्य कार्यदल का बेहतर प्रशिक्षण होः स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत सभी कर्मचारियों की बेहतरीन शिक्षा एवं प्रशिक्षण के लिए सार्वजनिक निवेश को बढ़ाया जाए। सरकार द्वारा चलायी जा रही सभी शिक्षण संस्थान द्वारा उन जरुरत मंद इलाकों से चिकित्सकों, नर्सों तथा स्वास्थ्य कर्मचारियों को आवश्यक संख्या में चयनित कर शिक्षा व प्रशिक्षण दिया जा रहा है यह सुनिश्चित किया जाए। प्रशिक्षण नीति में बदलाव लाया जाए जिससे कि स्वास्थ्य कार्यदल द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने हेतू समस्त जरुरी दक्षताएं दी जा सकें। चिकित्सा तथा संबन्धित क्षेत्र के उच्च शिक्षा व्यवस्था के वाणिज्यिकरण बंद हों तथा निजी शिक्षण संस्थाओं के व्यवस्थित नियन्त्रण हेतू प्रभावी एवं पारदर्शी तन्त्र लागू किया जाए।भारतीय चिकित्सा परिषद,भारतीय नर्सिंग परिषद जैसी संस्थाओं विनियामक संस्थाओं को गहन समीक्षा के पश्चात पुनर्गठित किया जाए जिससे कि वर्तमान भ्रष्ट एवं अनैतिक व्यवस्था को समाप्त किया जा सके।
9- बेहतर शासित पर्याप्त लोक स्वास्थ्य कार्यदल होः लोक स्वास्थ्य प्रणाली में समस्त सेवाओं के लिए आवश्यक सभी पद एवं स्थान प्रर्याप्त रुप से सृजित किया जाए एवं इन पदों को समय समय पर भरा जाये। संविदा में नियुक्त कर्मचारियों को नियमित किया जाए तथा आशाओं , बहुउद्येशीय कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोक स्वास्थ्य तऩ्त्र के कर्मचारियों का प्रयाप्त रुप से क्षमतानिर्माण किया जाए एवं उन्हें अपने कार्य के लिए सही मानदेय किया जाए व उपयुक्त काय्र करने का माहौल प्रदान किया जाए। कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा पर ध्यान दिया जाएतािा इस हेतू महिला कर्मचारियों के लिए विशेष व्यवस्था बनाई जाए। उपलब्ध शोध से यह पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्र में डाक्टरों की कमी पेषेवर समस्याओं से ज्यादा प्रशासनिक कमजोरी तथा राजनैतिक पराजय के चलते है, जिसके सुधारने के लिए कार्य किया जाए । हर स्तर के लिए ऐसे लोक स्वास्थ्य कैडर का गठन हो जिसमें प्रयाप्त संख्या में चिकित्सक, नर्सें तथा स्वास्थ्य कर्मियों का दल सम्मिलित हो जिसका जिसको प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में, लोक स्वास्थ्य के सम्बन्ध में एवं एक दल के रुप में बेहतर कार्य करने में प्रशिक्षण प्राप्त हो।
10- सभी आवष्यक दवाओं का एवं जांच सुविधाओं की मुफत एवं गुणवतापूर्ण उपलब्धता सुनिष्चित होः जिस प्रकार तामिलनाडू, केरल एवं राजस्थान राज्य में किया गया है वैसा स्वायत , पारदर्शी एवं आवश्यकता आाधारित दवा एवं अन्य सामग्रियों के खरीदी एवं वितरण प्रणाली गठित एवं लागू हो। लंबित बीमारियो के सभी मरीजों के लिए सभी आवष्यक दवाओं का पूरी अवधि के लिए उपलब्धता सुनिश्चित हो एवं दवा वितरण केन्द्रों को मरीजों के आसान पहुंच के मद्येनजर गठित किया जाये। समस्त स्वास्थ्य सुविधाओं में जेनेरिक दवाओं का प्रिस्क्रिप्सन एवं उपयोग को अनिवार्य करार दिया जाये।
11 - सामुदायिक सहभागिता, सहभागी योजना निर्माण एवं समुदाय आधारित निगरानी को बढ़ावा दिया जायेः स्वास्थ्य सेवायें जनता के प्रति जवाबदेह हों। इसके लिए समुदाय आधारित निगरानी एवं योजना निर्माण प्रक्रिया को समस्त लोक स्वास्थ्य कार्यक्रमों एवं सेवाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जायेजिससे कि सेवा प्रदान में उतरदायित्व एवं पारदर्शिता बढे। शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को सुचारु रुप से चलाने के लिए संस्थागत व्यवस्थायें बनाई जायें जिसके लिए पर्याप्त धन राशि के साथ साथ आवश्यक प्रबंधन स्वायतता भी प्राप्त हो।
12- लोक स्वास्थ्य प्रणाली को भ्र्ष्टाचार मुक्त किया जायेः नियुक्ति, पदोन्नति, स्थानान्तरण, खरीदी तथा अधोरचना विकास के लिए पारदर्शी नीतियां बनाई जायें तथा लागू की जाएं जिस प्रकार तामिलनाडू राज्य ने खरीदी के लिए तािा कर्नाटक राज्य ने स्थानान्तरण के लिए नीतियां बनाइ्र हैं। शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को सुचारु रुप से चलाने के लिए संस्थागत व्यवस्थायें बनाई जायें जिसके लिए प्रयाप्त धनराशि के साथ साथ आवश्यक स्वायत्तता प्राप्त भी हो।
13- निजी अस्पतालों द्वारा किये जाने वाले शोषण को समाप्त किया जायेः राष्ट्रीय क्लिनिकल एस्टेब्लिष्मैंट एक्ट के अंर्तगत मरीजों के अधिकार हर संस्थाओं में सुरक्षित हों । विभिन्न सेवाओं के दाम नियंत्रित हों। प्रिस्क्रिप्षन, जांच तथा रेफरल के पीछे चलने वाली घूसखोरी को बंद किया जाए, एवं इसके लिए शासन द्वारा पर्यवेक्षित लेकिन स्वतंत्र शिकायत निवारण व्यवस्था लागू की जाये। मानक निर्माण का प्रकार ऐसा हो जिसमें कारपोरेट हित का बढ़ावा न हो सके। इन तमाम व्यवस्थाओं पर यह भी विशेष ध्यान हो कि नैतिक एवं गैर वाणिज्यिक सेवा प्रदान करने वाले निजी प्रदाताओं को संम्पूर्ण परि रक्षा मिल रहा है।
14- समस्त सार्वजनिक बीमा योजनाओं को समय सीमा के अंतर्गत लोक सेवा व्यवस्था में विलीन किया जायेः आर एस बी वाई जैसे तथा अन्य राज्य संचालित बीमाएं कर-आधारित सार्वजनिक वितीय व्यव्स्था से पोषित लोक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में समय सीमा के अंर्तगत विलीन हो । इन बीमा योजनाओं के अंर्तगत प्राप्त सभी सेवायें लोक स्वास्थ्य प्रणाली में भी सम्मिलित हों एवं इसके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों। संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लोक स्वास्थ्य प्रणाली में पूर्ण रुप से शामिल किया जाये जिससे कि उनके लिए समेकित स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो।
हरयाणा मुख्यमंत्री मुफ्त इलाज ‘योजना’, जननी सुरक्षा योजना आदि सभी स्वास्थ्य योजनाओं को ठीक प्रकार से लागू किया जाए। इसके लिए जिला स्तर पर सामाजिक संस्थाओं व जन संगठनों के कार्यकर्ताओं की एक माॅनिटरिंग कमेटी बनाई जाए जिसकी सिफारिशों पर सम्बंधित विभाग उचित कार्यवाही तुरन्त करे। हरयाणा से गुजरने वाले हाइवे पर एक्सीडैंट होने पर 48 घण्टे तक सभी को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं देने की योजना उचित ढंग से लागू की जाए।
15- स्वास्थ्य नीतियों के विकास में तथा प्राथमिकतायें तय करने में बहुपक्षीय अंर्तराष्ट्रीय वितीय संस्थाओं का तकनीकी सहयोग पूर्ण रुप से समाप्त होः विश्व बैंक , यू.एस.एड., गेट्स फाउन्डेशन , कंसलटेंसी संस्थाएं जैसे डियोलाइट,मैकेन्सी आदि का राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकतांए एवं वितीय या सेवा प्रदाय रणनीतियों के निर्धारण में भूमिका को पूर्ण रुप से समाप्त किया जाये। शोध व ज्ञान संसाधन का विकास एवं वितरण के लिए एक विषेश अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्रणाली गठित किया जाये , खासकर अन्य विकासशील देशों के साथ। डब्लू.एच. ओ. ,यूनिसेफ तथा अन्य संयुक्त राष्ट्रीय संस्थाओं के उपर तकनीकी निर्भरता एवं उनकी वितिय सहायता की आवश्यकता से मुक्त किया जाने हेतू शासकीय स्तर पर दबाव बनें। इस प्रकार की संस्थाओं
की ओर से आने वाले परामर्श तथा विशेषज्ञता को भी समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाये क्योंकि यह संस्थाएं भी कारपोरेट एवं निजी संस्थानों के हित से प्रभावित हैं ।
16 - राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर स्वास्थ्य पर शोध एवं विकास के लिए क्षमता निर्माण होः लोक स्वास्थ्य बजट का कम से कम 5% स्वास्थ्य पर शोध के लिए आवंटित हो जिसमें स्वास्थ्य तन्त्रों पर शोध भी शामिल हो। सवास्थ्य के क्षेत्र में तथा स्वास्थ्य तन्त्रों पर शोध हेतू नवीन संस्थागत ढांचे शासन द्वारा गठित हो तथा मौजूदा संस्थाओं को पर्याप्त शासकीय वितिय सहायता दिया जाये।
17- आवश्यक एवं सुरक्षित दवाईयों तथा उपकरणों की सही उपलब्धता सुनिष्चित होः सभी दवाईयों का मूल्य आधारित दाम नियन्त्रण हो , दवा एवं उपकरण सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रावधान हो। जेनेरिक दवाईयों के वितरण के लिए पर्याप्त संविधायें प्रणाली हों व चिकित्सकों द्वारा जेनेरिक दवाईयों के प्रिस्क्रिप्षन हेतू अनिवार्यता हो। इंडियन पेटैंट एक्ट के अंर्तगत लोक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए की गई व्यवस्थाओं का दवाईयों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उपयोग हो तथा ज्यादातर दवाईयों एवं उपकरणों के देषी निर्माण को बढावा मिले।
18- जैव चिकिस्तकीय शोध तथा क्लिनिकल ट्रायलों की सशक्त विनियामक व्यवस्था होः क्लिनिकल ट्रायलों के नैतिक संचालन हेतू स्पष्ट रुप रेखा तैयार एवं लागू हो जिससे समस्त हितग्राहियों के सशक्त विनमय के लिए व्यवस्थायें बंधित हो चाहे वे वितीय प्रदाता हो , शोध संस्थाएं हों या नैतिक समितियां हों। सी.डी.एस.सी.ओ. तथा आई.सी. एम. आर. द्वारा समस्त क्लिनिकल ट्रायलों का तथा ट्रायल स्थानों की सशक्त निगरानी की जाये तथा ट्रायल संसाधनों के आंवटन के दौरान वहां पर आवश्यक सभी आपातकालीन स्थिति के निपटारे हेतू व्यवस्थायें सुनिश्चित हों । क्लिनिकल ट्रायलों में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को प्र्याप्त क्षतिपूर्ण राशि उपलब्ध कराने हेतू एवं उनको हो सकने वाले समस्त बुरे प्रभाव निपटारे के लिए पर्याप्त व्यवस्था के साथ निर्देश विकसित और लागू हों। क्लिनिकल ट्रायल प्रतिभागियों के लिए उनके अधिकार पत्र विकसित किया जाय जिसकी कानूनी रुप में भी वैधता हो।
19- सभी मानसिक रुप से पीड़ित मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं एवं रक्षा सुनिश्चित की जायेंः जिला स्तरीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंर्तगत शामिल किया जाये। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति पर अमल हो तथा मानसिक स्वास्थ्य कानून पास किया जाये।
20- कीटनाशक दवाओं के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल के चलते हरियाणा के हर क्षेत्र, मानवीय, पशु व खेती में इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मानवीय स्तर पर इन कीटनाशकों की मात्रा पता लगाने के टैस्टों की सुविधा इस प्रदेश के इकलौते पीजीआईएमएस में भी नहीं है। कई तरह की बीमारियां इसके चलते बढ़ रही हैं या पैदा हो रही हैं। यह सुविधा तत्काल मुहैया करवाई जाए।
21- सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर - एक सर्जन, एक फिजिसियन, एक शिशु रोग विशेषज्ञ व एक महिला रोग विशेषज्ञ के प्रावधान के मानक केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा तय किये गए हैं। इसके साथ यदि मरीज बेहोशी का विशेषज्ञ नहीं है तो सर्जन और गायनकाॅलोजिस्ट तो अपंग हो जाते हैं। इसलिए इन पांचों विशेषज्ञों की नियुक्तियां प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों मे की जाए।
22. प्रदेश के जिलों में गुड़गांव, रोहतक, हिसार, भिवानी,फरीदाबाद और सोनीपत में विशेष आर्थिक पैकेज के तहत 1500 करोड़ रुपये की परियोजनांए शुरू की गइ्र हैं जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढांचे को विकसित करने के लिए इन जिलों के अस्पतालों को अपगे्रड करके सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल बनाये जा रहे हैं। बहुत ही हाईटेक उपकरण पिछले सालों में खरीदे गए जो बहुत कम जगह और कमतर स्तर पर इस्तेमाल किये जा रहे हैं। यहां पर उपयुक्त स्टाफ की कमी को पूरा करते हुए इसके लिए सम्बंधित विशेषज्ञों, डाॅक्टरों, नर्सों व पैरामैडिकल स्टाफ को उपयुक्त ट्रेनिंग देने की भी आवश्यकता है। निशुल्क सर्जीकल पैकेज योजना के तहत 2009 से बी. पी. एल परिवारों को दी जा रही निशुल्क सर्जरी की सेवा को लागू करने में आ रही सभी दिक्कतों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाये जायें। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व अधिसूचित झोंपड़ पट्टियों एवं बस्तियों के निवासियों के सभी आपरेशन मुफत करने की योजना को सही ढंग से लागू किया जाए । इंदिरा बाल स्वास्थ्य योजना 26 जनवरी 2010 से लागू की गई। जिसके तहत अठारह वर्ष तक की आयु के बचचों के स्वास्थ्य कार्ड बना कर सरकारी अस्पतालों में उनके स्वास्थ्य की निशुल्क जांच व ईलाज किया जाता है। बहुत से लोगों को इन सब योजनाओं से वाकिफ ही नहीं लगते ओर इनके क्रियान्वयन की दिक्कतों को भी दुरुस्त करने के कदम पहले सुझाये गये माध्यमों के द्वारा उठाये जायें। प्रदेश में 2005 तक एम. बी.बी.एस.की कुल सीटें 350 थी जो वर्ष 2013 में 850 हो गई। मगर इन विद्यार्थियों की गुणवता पूर्ण मैडीकल शिक्षा के लिए जरुरी फैकल्टी की काफी कमी है हरेक मैडीकल कालेज में और इन्फ्रास्ट्रक्चर की बहुत कमी है जिसे पूरा करना बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत दाल रोटी योजना को सही सही लागू किया जाए।
23- कुपोषण ;नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे- तीन के अनुसार, हरियाणा में बढ़ा है। दूर करने के लिए कारगर कदम उठाये जायें। इसी प्रकार गर्भवती महिलाओं में नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे तीन के अनुसार नैषनल फैमिली हैल्थ सर्वे दो के मुकाबले 10 प्रतिशत खून की कमी बढ़ी है। इसके साथ-साथ लड़कियों में किये गये सरकारी सर्वे में भी खून की कमी का प्रतिशत काफी पाया गया है। उचित कदम उठाये जाने की जरूरत है।
24-पी एन डी टी एक्ट के तहत उचित कार्यवाही की जाएं।
प्रस्तुतकर्ता डा रणबीर सिंह दहिया 
डॉ रणबीर सिंह दहिया 

Monday, 12 August 2019

पीपुल्स हेल्थ मेनिफेस्टो, 2019





जन स्वास्थ्य अभियान
अल्मा अता सम्मेलन की 40 वीं वर्षगांठ को याद करते हुए जो घोषित किया
‘स्वास्थ्य के लिए सभी’, जन स्वास्थ्य अभियान (श्रै।) स्वास्थ्य के अधिकार पर जोरदार प्रभाव डालता है
भारत के सभी लोगों की देखभाल। हम जनविरोधी कदमों के बारे में अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हैं
स्वास्थ्य क्षेत्र में वर्तमान सरकार द्वारा लिया जा रहा है। हम विभिन्न नकारात्मक का पुरजोर विरोध करते हैं
नीतिगत रुझान जैसेरू
ऽ स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक बनाने के लिए एक संवैधानिक संशोधन को स्थानांतरित करने में विफलता
भारतीय संविधान में अधिकार
ऽ हालिया राष्ट्रीय स्वास्थ्य बजट को वास्तविक रूप से कम किया जा रहा है,
ऽ सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और विभिन्न प्रतिगामी चरणों के उन्नयन के विषय में
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन;
ऽ पदह प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ’(च्डश्र।ल्) या राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण का शुभारंभ
वह योजना जो बड़े पैमाने पर होने के बावजूद बदनाम पे बीमा मॉडल ’पर आधारित है
ऐसी बीमा आधारित योजनाओं की प्रभावशीलता के खिलाफ साक्ष्य प्रमुख हैं
सेवा वितरण में निजी क्षेत्र की भागीदारी;
ऽ जिला अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के लिए कदम;
ऽ चिकित्सा शिक्षा का अधिक निगमितकरण अधिक कैपिटेशन आधारित गुंजाइश देता है
छात्र नामांकन।
ऽ निजी चिकित्सा क्षेत्र के प्रभावी विनियमन को सुनिश्चित करने के लिए मना करना, अनुमति देना
यह क्षेत्र विशेष रूप से कॉर्पाेरेट द्वारा रोगियों की लागत पर बड़े पैमाने पर मुनाफाखोरी जारी रखने के लिए है
अस्पतालों;
ऽ उत्पादन की लागत के आधार पर दवाओं की कीमतों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने की अनिच्छा।
सैकड़ों तर्कहीन और हानिकारक फिक्स्ड डोज ड्रग कॉम्बिनेशन की मार्केटिंग की अनुमति
(थ्क्ब्े)।
ऽ फार्मास्युटिकल द्वारा अनैतिक विपणन प्रथाओं को समाप्त करने के लिए एक कानूनी कोड नहीं लाना
उद्योग;
ऽ संबंधित आबादी के व्यापक वर्गों के चल रहे बहिष्करण और हाशिए पर
गुणवत्ता स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच
ऽ इस संदर्भ में, हम निम्नलिखित नीति कार्यों का प्रस्ताव करते हैं, विशेष रूप से संदर्भ में
3
विभिन्न आगामी राज्य विधानसभा चुनाव और संसदीय चुनाव, प्रतिबद्ध होने के लिए
सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा। यह इस उम्मीद के साथ है कि पक्ष
जो सत्ता में आते हैं उन्हें इन नीतिगत उपायों को लागू करना चाहिए, और जो कि
विपक्ष में सेवा सभी में इन प्रस्तावों और मांगों को उठाना जारी रखना चाहिए
निर्वाचित निकायों के भीतर और बाहर उपलब्ध फ़ोरम। जेएसए समवर्ती रूप से जुटाएगा
और चारों ओर एक आम सहमति बनाने के लिए लोगों के विभिन्न वर्गों के बीच अभियान
तत्काल कार्यवाही हम प्रस्तावित करते हैं।
ऽ 1. उचित के अधिनियमन के माध्यम से स्वास्थ्यप्रद अधिकार का अधिकार लें
केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर विधान। ऐसे विधान सुनिश्चित करने चाहिए
पूरी गुणवत्ता सहित अच्छी गुणवत्ता और व्यापक स्वास्थ्य देखभाल तक सार्वभौमिक पहुंच
संपूर्ण जनसंख्या के लिए प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक सेवाओं की श्रेणी। यह होना ही चाहिए
एक सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून के साथ होना चाहिए जो लोगों की पहुँच सुनिश्चित करता है
स्वास्थ्य निर्धारकों और स्वास्थ्य हानि प्रभावों से सुरक्षा की सीमा। इन
स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवा को मौलिक बनाने की प्रक्रिया में योगदान देना चाहिए
भारतीय संविधान में अधिकार।
ऽ
ऽ 2, मुख्य रूप से के माध्यम से वित्त पर, स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय में काफी वृद्धि करें
सामान्य कराधान, सकल घरेलू उत्पाद का 3.5ः (यह सालाना लगभग 4,000 रुपये प्रति व्यक्ति होगा)
वर्तमान दरों में, जैसा कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति -2017 द्वारा सिफारिश की गई है) संक्षेप में
मध्यम अवधि में सकल घरेलू उत्पाद का 5ः और सकल घरेलू उत्पाद का 5ः, खर्च का कम से कम 60ः होने के साथ
केंद्र द्वारा वहन और राज्यों द्वारा 40ः।
ऽ आगे यह सुनिश्चित करें कि स्वास्थ्य पर जेब खर्च से बाहर, जो वर्तमान में अनुचित है
उच्च, तेजी से कम हो जाता है और कुल स्वास्थ्य देखभाल खर्च का एक-चौथाई से भी कम हो जाता है।
केंद्र राज्यों में राजकोषीय शक्तियों के केंद्रीकरण के कारण गंभीर हैं
वित्तीय बाधाओं और इसे बहुत अधिक विकेंद्रीकरण द्वारा संबोधित किया जाना चाहिए
केंद्र और राज्यों के बीच राजकोषीय संबंध। केंद्र को योगदान करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए
अतिरिक्त मानव संसाधनों के लिए भुगतान करने के लिए पर्याप्त है। उदाहरण के लिए, इसके विपरीत
हेल्थ और वेलनेस के लिए 1200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आवंटन नहीं किया गया है
केंद्र और इस राशि को राष्ट्रीय स्वास्थ्य के लिए बजट से काटा जाएगा
मिशन (एनएचएम), और राज्यों में अतिरिक्त बहिष्कार के लिए अतिरिक्त वित्तीय भार होगा।
यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 को स्थानांतरित करने की प्रतिबद्धता को धोखा देगा
अत्यधिक चयनात्मक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल से जिसे स्वास्थ्य के हिस्से के रूप में लगाया गया था
क्षेत्र में सुधार
नब्बे के दशक में एक व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की ओर।
ऽ ऽ गुणवत्ता और उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत और मजबूत बनाना
प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तर के लिए उपयुक्त स्वास्थ्य देखभाल, पूरी तरह से मुक्त
उपयोगकर्ता शुल्क और प्रदान करते हैं, आवश्यक दवाओं और निदान की पूरी श्रृंखला के लिए सार्वभौमिक पहुंच
एक मेल खाती मानव संसाधन नीति के साथ सार्वजनिक सुविधा में और बहुत बेहतर है
शासन और प्रबंधन। इस तरह की मजबूती के लिए पूरकता की आवश्यकता हो सकती है
निजी प्रदाताओं को चुनिंदा सेवाओं के लिए रेफरल, अक्सर विशेषज्ञ जहां ये नहीं हैं  कब्जा कर लिया गया
इस तरह की मजबूती के लिए पूरकता की आवश्यकता हो सकती है
निजी प्रदाताओं को चुनिंदा सेवाओं के लिए रेफरल, अक्सर विशेषज्ञ जहां ये नहीं हैं
घर में व्यवस्था करना संभव है। निजी एजेंसियों द्वारा अनुपूरक भी हो सकते हैं
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कुछ सहायक देने के लिए सार्वजनिक सेवाओं की क्षमता का विस्तार करने की आवश्यकता है
सहायक सेवाएं। दिशा चुनिंदा निजी स्वास्थ्य देखभाल का उपयोग करेगी
सार्वजनिक प्रणालियों को मजबूत करने के लिए संसाधन, प्रस्तावित के दृष्टिकोण के विपरीत
अंधाधुंध तरीके से आयुष्मान भारत कार्यक्रम के तहत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (च्डश्र।ल्)
निजी स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं को मजबूत करने के लिए सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग करना।
ऽ ऽ निगरानी और विश्लेषण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता को बढ़ाया जाना चाहिए
सामाजिक निर्धारकों के नए तत्वों को रोकने और कम करने की सिफारिश करने के लिए
उपाय। अंतर-क्षेत्रीय समन्वय की परिकल्पना की जानी चाहिए ताकि सरकार विभागों
स्वास्थ्य के इन सामाजिक निर्धारकों को बेहतर बनाने के लिए विभिन्न स्तरों पर एक साथ कार्य करें।
5. ऽ सुनिश्चित करें कि सरकारी डॉक्टरों द्वारा जनता के हिस्से के रूप में कोई निजी अभ्यास नहीं किया जाता है
स्वास्थ्य सेवाएं।
ऽ 6.प्उचतवअम, मौलिक रूप से लोकतांत्रिककरण करते हैं और मात्रा के संदर्भ में दोनों का विस्तार करते हैं
और गुणवत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली यह एक अग्रणी और विनियमन खेलने के लिए सक्षम करने के लिए
राष्ट्रीय स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में भूमिका। अच्छा है और सक्रिय रूप से एक मुख्य रूप से बढ़ावा देने के
यूनिवर्सल हेल्थ केयर के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली आधारित रूपरेखा (ेलेजमउ कवरेज ’या नहीं)
श्आश्वासनश्)। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख विस्तार और सुदृढ़ीकरण हो सकता है
अंतरिम तंत्र के रूप में विनियमित निजी प्रदाताओं के कुछ अनुबंधों के साथ संयुक्त,
प्रावधान में वर्तमान अंतराल को कवर करने के लिए। जबकि ऐसा करना लक्ष्य होगा
सार्वजनिक अनंतिम की सीमा और पहुंच को अधिकतम करें
’ 1.।दकवद की योजना तव प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ”या“ राष्ट्रीय स्वास्थ्य ”के लिए है
संरक्षण योजना “आयुष्मान भारत के हिस्से के रूप में यह बदनाम पर आधारित है
’बीमा मॉडल’। रुपये का अनुमानित वार्षिक परिव्यय। 12,000-50,000 करोड़, के अनुसार
विभिन्न अनुमानों को जनता के विस्तार में निवेश द्वारा बेहतर उपयोग किया जाएगा
स्थायी सार्वजनिक संपत्ति की सुविधाएं और निर्माण। सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित अब्सोर्ब
स्वास्थ्य बीमा योजनाओं (त्ैठल् और विभिन्न राज्य स्वास्थ्य बीमा योजनाओं) में
एक विस्तारित और मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली।
8. 8. आशा, आंगनवाड़ी और सहायकों सहित सभी संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों को नियमित करें
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के वितरण में शामिल हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें सुरक्षा प्राप्त हो
श्रम कानूनों की पूरी श्रृंखला से। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के सभी स्तर के कर्मचारी होंगे
पर्याप्त कौशल प्रशिक्षण, उचित मजदूरी और नियुक्ति और के सभी प्रावधानों के साथ प्रदान किया गया
सामाजिक सुरक्षा और सभ्य कामकाजी परिस्थितियाँ।

ऽ 9। व्यावसायिक स्वास्थ्य पर एक व्यापक नीति तैयार करना और उसे लागू करना और
सुरक्षा। व्यावसायिक स्वास्थ्य को चिकित्सा पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। जवाबदेही सुनिश्चित करें
और उल्लंघन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई। निगमों द्वारा सभी परियोजनाएँ
संभावित रूप से स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है सबसे पहले एक स्वास्थ्य प्रभाव आकलन में किया जाना चाहिए
पारदर्शी, भागीदारी और तकनीकी रूप से ध्वनि, जिसके आधार पर वे प्राप्त करते हैं
एक श्स्वास्थ्य मंजूरीश्
रु 10. स्वास्थ्य की संपूर्ण सीमा की शिक्षा और प्रशिक्षण में सार्वजनिक निवेश बढ़ाएँ
सरकार द्वारा संचालित महाविद्यालयों में क्षमता निर्माण सुनिश्चित करने के लिए कार्मिक। एक अच्छी तरह से स्थापित करें
स्थायी की पर्याप्त संख्या बनाकर मतदमक और पर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यबल
पोस्ट नहीं। सभी मौजूदा निजी के नियमन के लिए कठोर तंत्र रखें
संस्थान, जैसे मेडिकल और नर्सिंग कॉलेज, पारदर्शी तरीके से और जगह पर
नए निजी मेडिकल कॉलेजों की स्थापना या चार्जिंग पर स्थगन
कैपी टेशन फीस। ओवरहाल मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (डब्प्) और नर्सिंग काउंसिल
भ्रष्टाचार और अनैतिक प्रथाओं को खत्म करने के लिए भारत की लोकतांत्रिक रेखाओं के साथ। अनुमति दें
योग्यता को मिलाने वाले उम्मीदवारों की भर्ती के लिए विशिष्ट नियम और प्रक्रियाएं
और चयन में पारदर्शिता और मुश्किल में काम करने के लिए उपयुक्त उम्मीदवार ढूंढता है
क्षेत्रों।
ऽ 11. भारत सरकार, सभी राज्य सरकारों की सक्रिय भागीदारी के साथ, चाहिए
बिना किसी देरी के सभी आवश्यक और जीवन रक्षक दवाओं तक पहुंच की गारंटी
देश भर में सभी सार्वजनिक सुविधाओं में निदान। इस का दायरा और कवरेज
योजना तमिलनाडु, दिल्ली और राजस्थान में चल रही योजनाओं से कम नहीं होनी चाहिए,
जो आवश्यक दवाओं और चिकित्सा की पूरी श्रृंखला तक पहुंच सुनिश्चित करेगा
स्वास्थ्य सुविधाओं के सभी स्तरों पर बिना किसी शुल्क के जांच। सभी की उपलब्धता सुनिश्चित करें
सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में उपयुक्त, सुरक्षित और लागत प्रभावी टीके। पुनर्जीवित मौजूदा
सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ और सार्वजनिक क्षेत्र की नई दवाओं और वैक्सीन उत्पादन की स्थापना
देश में आत्मनिर्भर दवा उत्पादन के लिए इकाइयाँ। पर्याप्त धन मुहैया कराएं
सभी सार्वजनिक क्षेत्र के चिकित्सा अनुसंधान संस्थानों को। दवा अनुसंधान को प्रोत्साहित करें
ओपन सोर्स ड्रग डिस्कवरी मॉडल के माध्यम से।
ऽ 12. सरकार को एक वैज्ञानिक समर्थक जन औषधि नीति अपनानी चाहिए। की ओर
यह अंत, यह होना चाहिए
ऽ मूल्य के तहत सभी आवश्यक दवाओं और उनके एनालॉग्स के साथ-साथ चिकित्सा उपकरणों को भी लाओ
विनिर्माण लागत के आधार पर मूल्य निर्धारण की एक प्रणाली के माध्यम से नियंत्रण।
ऽ सभी तर्कहीन दवाओं और तर्कहीन फिक्स्ड खुराक दवा संयोजनों पर प्रतिबंध लगाएं
ऽ कानूनी रूप से यूनिफ़ॉर्म कोड को अपनाकर अनैतिक विपणन को प्रभावी रूप से विनियमित और समाप्त करना
फार्मास्यूटिकल्स मार्केटिंग प्रथाओं के लिए।
ऽ दवाओं, टीकों, डायग्नोस्टिक्स और चिकित्सा को कवर करने वाली एक तर्कसंगत दवा नीति को अपनाना
उपकरण और उपकरण।
ऽ पर्याप्त संख्या में जेनेरिक दवा के आउटलेट खोलने को बढ़ावा देना। सरकार
जेनेरिक दवा नीति तैयार करनी चाहिए जो निर्माताओं के लिए अनिवार्य हो
मुख्य लेबलिंग के रूप में जेनेरिक नाम (ब्रांड के बजाय) को प्रमुखता से प्रदर्शित करें
सभी उत्पादों, और डॉक्टरों के लिए सभी नुस्खे में सामान्य नाम का उपयोग करते हुए, सुनिश्चित करते हुए
जेनेरिक दवाओं की आसान उपलब्धता
ऽ दवाओं तक पहुंच को बढ़ावा देने के लिए भारतीय पेटेंट अधिनियम में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों का उपयोग करें,
पेटेंट के दुरुपयोग और अनिवार्य लाइसेंस के खिलाफ सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए
पेटेंट दवाओं के स्थानीय निर्माता के लिए होना चाहिए। नवप्रवर्तन इको-सिस्टम का निर्माण करें
सक्रिय रूप से दवा और नैदानिक नवाचार को बढ़ावा देना सुनिश्चित करने के लिए कि निदान
और विशेष रूप से अनाथ के लिए हमारी बदलती स्वास्थ्य आवश्यकताओं को संबोधित करने के लिए आवश्यक चिकित्सा
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रोगों।
ऽ सार्वजनिक दवा उद्योगों और वैक्सीन निर्माण इकाइयों को मजबूत किया जाना चाहिए,
निजीकरण होने के बजाय।
रु 1. सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में पारदर्शी नीतियों के माध्यम से भ्रष्टाचार को कम करना
नियुक्तियों, पदोन्नति, स्थानान्तरण, वस्तुओं और सेवाओं की खरीद और बुनियादी ढाँचा
एक पारदर्शिता अधिनियम, और संस्थान की मजबूत शिकायत निवारण के माध्यम से विकास
सिस्टम, जो कि कुछ स्वायत्तता के साथ पर्याप्त रूप से वित्तपोषित और प्रबंधित होते हैं
कार्यक्रमों और नीतियों के कार्यान्वयन में शामिल प्रणालियों से। अलग से स्थापित करें
केंद्र और राज्यों में खाद्य और औषधि न्यायालय। डॉक्टरों के निजी अभ्यास पर प्रतिबंध
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में नियोजित कड़ाई से लागू किया जाएगा
 5. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की समुदाय आधारित योजना और निगरानी में विविधता लाएं
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सभी स्तरों पर।
समय के साथ, एक लोकतांत्रिक, समुदाय संचालित स्वास्थ्य प्रणाली और एक की ओर बढ़ें
स्वास्थ्य देखभाल की रूपरेखा जो विभिन्न सामुदायिक आवश्यकताओं और धारणाओं को ध्यान में रखती है।
समुदाय आधारित निगरानी, शिकायत निवारण की भागीदारी प्रणाली
और यह सुनिश्चित करने के लिए योजना बनाई जाएगी कि हर क्षेत्र के लोग सक्षम होंगे
जवाबदेही तंत्र के साथ उचित स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करने के लिए,
शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई चाहते हैं, और बेहतर कामकाज के लिए मजबूत आवाज है
उनके क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं।
’ 5.म्Ûचंदक और म्ैप् प्रणाली को मजबूत। एक व्यापक प्रणाली का समावेश सुनिश्चित करें
असंगठित और संगठित क्षेत्रों में श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य देखभाल सुरक्षा,
कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) अधिनियम के विस्तार और कायाकल्प के साथ जुड़ा हुआ है,
1948. असंगठित क्षेत्र और कृषि क्षेत्र में श्रमिकों को विशेष रूप से शामिल करें,
जो वर्तमान में किसी भी प्रकार के सामाजिक संरक्षण तंत्र से आच्छादित नहीं हैं।
ऽ 16. निजी चिकित्सा क्षेत्र को प्रभावी ढंग से विनियमित करना - राष्ट्रीय नैदानिक प्रतिष्ठान को संशोधित करना
रोगी के अधिकारों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अधिनियम -2010; दरों का नियमन
और विभिन्न सेवाओं की गुणवत्ता; नुस्खे, डायग्नोस्टिक्स के लिए किकबैक का उन्मूलन
और रेफरल; और मरीजों के लिए शिकायत निवारण तंत्र। सभी राज्यों को चाहिए
राष्ट्रीय अधिनियम या एक राज्य विशिष्ट अधिनियम को अपनाना, जिसमें सभी सुविधाएँ सम्मिलित हों
राष्ट्रीय अधिनियम। सार्वजनिक रूप से प्रबंधित प्रवेश प्रणाली और नियमित रेफरल की स्थापना करें
सरकारी अस्पतालों और धर्मार्थ ट्रस्ट अस्पतालों के बीच, प्रभावी ढंग से बेड का उपयोग करने के लिए
ट्रस्ट और निजी अस्पतालों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के रोगियों के लिए
उपकरणों की खरीद में अत्यधिक रियायती दरों और कर रियायतों पर भूमि दी गई है।
ऽ 17. विभिन्न प्रकार के। पीपीपी ’जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को कमजोर करते हैं, उन्हें समाप्त किया जाना चाहिए।
इसके बजाय, जहां सार्वजनिक प्रावधान में अंतराल को भरने के लिए आवश्यक है, सेवाओं को संदर्भित किया जा सकता है
निजी प्रदाता इस तरह से सहमत होते हैं कि वे बड़ी जनता की सेवा करते हैं
स्वास्थ्य लक्ष्य
ऽ 18.ैनचचवतज चिकित्सा बहुवचन कि लोगों को गैर एलोपैथिक का उपयोग करने के लिए एक विकल्प है
सुरक्षित घर-आधारित बर्थिंग प्रथाओं सहित उपचार की प्रणाली। पर्याप्त एन 7
शोध को गैर-एलोपैथिक से संबंधित अनुसंधान और प्रलेखन को दिया जाना चाहिए
सिस्टम।
ऽ 19. यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष उपाय अपनाएं कि कमजोर आबादी और साथ के लोग
विशेष आवश्यकताओं को व्यापक, सुलभ, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच प्राप्त है -
सामाजिक स्थिति (जैसे महिलाएं, दलित, आदिवासी) के कारण भेद्यता होने पर,
विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह, शरणार्थी और प्रवासी आबादी, कतार और
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों), संघर्ष क्षेत्रों में लोग; स्वास्थ्य की स्थिति के कारण (जैसे एचआईवी स्थिति),
अधिभोग (जैसे मैनुअल स्कैवेंजर्स, चीर बीनने वाले), अलग-अलग एबल्ड व्यक्ति, बच्चे
और बुजुर्ग व्यक्ति, या किसी अन्य प्रकार की भेद्यता के कारण। जाति के सभी रूपों और
धर्म-आधारित और स्वास्थ्य देखभाल में भेदभाव के अन्य रूपों को समाप्त किया जाएगा
विभिन्न सक्रिय उपायों के माध्यम से।
ऽ सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में लिंग आधारित हिंसा को मान्यता देना और पहुँच सुनिश्चित करना
शीघ्र बचाव और पुनर्प्राप्ति देखभाल, आवश्यक और निरंतर के रूप में व्यापक चिकित्सा देखभाल
इससे प्रभावित लोगों के लिए समर्थन। ळठट को संबोधित करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएंगे
सभी श्रेणियों के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा अनुभव किया गया। तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए उपायों को अपनाएँ
महिलाओं, किशोरों के लिए समान, सतत गुणवत्ता वाले स्वास्थ्य देखभाल के पूरे स्पेक्ट्रम
बच्चों, कतार, सभी पृष्ठभूमि के ट्रांस-व्यक्तियों और हिंसा की सभी स्थितियों में।
ऽ 20. सभी गर्भवती और प्रसवोत्तर माताओं के लिए मातृत्व लाभ
संविदा कर्मी, दैनिक वेतन भोगी, असंगठित क्षेत्र के सभी श्रमिक और
कृषि क्षेत्र। सभी में छोटे बच्चों के साथ माताओं के लिए क्रेच और रेस्ट रूम प्रदान करें
काम के स्थान।
जाति और समुदाय के सभी रूपों को समाप्त करने के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाएं।
धर्म आधारित भेदभाव किसी भी भेदभाव या गोत्र के आधार पर या
जातीयता, स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र में और उससे आगे। को खत्म करने के लिए तत्काल कदम उठाएं
मैनुअल मैला ढोने की जघन्य प्रथा।
ऽ 22. मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों वाले व्यक्तियों के लिए व्यापक उपचार और देखभाल
संशोधित जिले के सुदृढ़ कार्यान्वयन और एकीकरण के माध्यम से
राष्ट्रीय मानसिक के ढांचे के भीतर एनएचएम के साथ मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम
स्वास्थ्य बीमा।
ऽ 23. बहुपक्षीय और द्विपक्षीय वित्तपोषण एजेंसियों द्वारा हस्तक्षेप को कम करना और
कॉर्पाेरेट कंसल्टेंसी संगठन (जैसे विश्व बैंक, यूएसएआईडी और बिल एंड मेलिंडा)
गेट्स फाउंडेशन, डेलॉइट और मैकिन्से आदि) सभी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति से
सूत्रीकरण और रणनीति विकास। सुनिश्चित करें कि भारतीय अनुसंधान संस्थानों के पास है
फंडिंग के वैकल्पिक राष्ट्रीय स्रोत और उन पर निर्भर बनने की जरूरत नहीं है।
ऽ 24. नैदानिक परीक्षणों के अनुमोदन और आचरण के कड़े विनियमन को सुनिश्चित करना,
निष्पक्ष रूप से सुनिश्चित करने के साथ, पीड़ित प्रतिभागियों के लिए समय पर मुआवजा
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के साथ प्रतिकूल घटनाओं से
परीक्षण स्थलों पर नैदानिक परीक्षणों के संचालन की निगरानी करना। उचित, समय पर मुआवजा सुनिश्चित करें
परीक्षण प्रतिभागियों के लिए जो प्रतिकूल घटनाओं से पीड़ित हैं। एक न्यायसंगत चार्टर विकसित करें
नैदानिक परीक्षण प्रतिभागियों के अधिकारों का।
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ऽ 25.च्तवउवजम उपयुक्त सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य प्रणाली अनुसंधानरू महत्वपूर्ण रूप से
सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य के लिए विभागों और केंद्रों की उन्नयन और निर्माण क्षमता
सिस्टम अनुसंधान। इस तरह के अध्ययनों के निष्कर्षों के लिए अग्रणी कार्रवाई का मार्गदर्शन करने में सक्षम होना चाहिए
सामाजिक निर्धारकों और स्वास्थ्य प्रणालियों की एक बेहतर समझ और अभिनव के लिए नेतृत्व
सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों और सरकारी कार्रवाई के कामकाज में सुधार के तरीके।
इस तरह के अनुसंधान के वित्तपोषण और कार्यान्वयन को सख्त और सतर्क आकलन से गुजरना पड़ता है
एक ऐसी स्थिति जिसमें सरकारी अधिकारी का निर्णय उसकी व्यक्तिगत रूचि से प्रभावित हो।
ऽ 26 पारंपरिक और नए मान्यता प्राप्त / दोनों से निपटने के लिए योजनाबद्ध तरीके से
स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों में उभरती हुई विकृतिरू यह सुधार करके किया जाना चाहिए
खाद्य सुरक्षा और पोषण, स्वच्छता के साथ-साथ नए विकसित किए गए अवरोधकों को संबोधित करना
पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, तनावपूर्ण जैसे सामाजिक निर्धारकों में
काम की परिस्थितियों, समझौता सड़क सुरक्षा और कमजोर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली,
नशीला पदार्थ जैसे तंबाकू, शराब आदि और हिंसा जिसमें लिंग-आधारित भी शामिल है
हिंसा। इन क्षेत्रों पर मौजूदा कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन और आवश्यक
लोगों के अधिकार की रक्षा के लिए कुछ कृत्यों में संशोधन
ऽ 27.न्दपअमतेंसप्रम और आईसीडीएस कार्यक्रम का विस्तार करके अंडर -3 बच्चों को प्रभावी ढंग से कवर करने के लिए
और समुदाय के स्वामित्व वाले ब्ड।ड को सार्वभौमिक बनाना (कुपोषण के समुदाय आधारित प्रबंधन)
स्वास्थ्य और भलाई के लिए महत्वपूर्ण के रूप में कार्यक्रमों और डेकेयर सेवाएं
महिलाओं और बच्चों दोनों के साथ-साथ कुपोषण में हस्तक्षेप। ”
ऽ 28. स्वास्थ्य सेवाओं या किसी भी उपयोग के लिए आधार लिंक अनिवार्य करने की आवश्यकता
स्वास्थ्य संबंधी सार्वजनिक सेवाएं या योजनाएं और लाभ।
ऽ 29. व्यापक रक्षा और लोकतंत्र के विस्तार के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभावी कार्रवाई
और सभी स्तरों पर धर्मनिरपेक्षता। स्वास्थ्य नीति और मौजूदा प्रणालियों की समीक्षा करें
सुनिश्चित करें कि ये किसी भी प्रकार के प्रमुख कट्टरवाद, भेदभाव को रोकें
अल्पसंख्यकों के खिलाफ, संघर्ष स्थितियों में देखभाल से इनकार, और कलंक या इनकार
श्दूसरोंश् या श्बाहरी लोगोंश् के रूप में लेबल किए गए व्यक्तियों की देखभाल सुनिश्चित करें कि सभी स्तरों पर स्वास्थ्य प्रणाली
अधिकतम रूप से समावेशी और न्यायसंगत हैं, और प्रचार करने के लिए दृढ़ता से परियोजना संदेश देते हैं
लोकतांत्रिक समावेश, धर्मनिरपेक्षता, मानवता और शांति का एक लोकाचार। जनता पर कार्रवाई
स्वास्थ्य को सभी स्तरों पर लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के विस्तार के साथ एकीकृत किया जाएगा।
इस क्षेत्र में शांति और एकजुटता को बढ़ावा देते हुए।
ऽ हम सभी राजनीतिक दलों और इच्छुक उम्मीदवारों को सबसे अधिक देने की अपील करते हैं
अपने एजेंडे में लोगों के स्वास्थ्य के लिए राजनीतिक प्राथमिकता। के 40 वें वर्ष में
एक राष्ट्र के रूप में हम सभी के लिए श्स्वास्थ्य के लिए अल्मा अता घोषणाश् को अपनाना
अंतर-क्षेत्रीय कार्रवाई और सामुदायिक सशक्तिकरण की अवधारणाओं को पुनर्जीवित करना चाहिए
स्वास्थ्य के लिए केंद्रीय होने के नाते।
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जन स्वाध्याय अभयदान
राष्ट्रीय सचिवालय
महिलाओं और स्वास्थ्य के लिए सम-संसाधन समूह
बी -45, दूसरी मंजिल, मुख्य शिवालिक रोड,
मालवीय नगर छम्ॅ क्म्स्भ्प् -110017