Sunday, 19 April 2020

संकट के घने बादल

                     संकट के घने बादलों की परतों से ही उम्मीद की किरण चमकती है, यह विश्वास ही वह ताकत देती है जिसके साथ हम हर चुनौती का सामना करते हैं। आज भूख, अभाव और एक भयानक महामारी की ही सिर्फ विकराल छाया हमें घेरे हुए नहीं हे, बल्कि आने वाले दिनों में जिन्दगी कगार पर ही होगी। विशाल जनसमूह, सैकड़ों किलोमीटर दूर, अपने घरों की ओर चले जा रहे हैं, बाल बच्चों और परिवार समेत ये सिर्फ महामारी से नहीं भाग रहे, ये उस भयानक गरीबी और अभाव से भी दूर जाने की कोशिश में है जो शहर में फैलती बेरोजगारी के साथ आ रहा है। यह अभी तक चल रही परिस्थितियों की विषमताओं से भी अधिक बढ़ने वाला है। 2016 के आर्थिक सर्वे के अनुसार 77 प्रतिशत लोग किसी तरह जिन्दा रहने की कोशिश में रहते रहे हैं, प्रतिदिन की दिहाड़ी से सिर्फ भूख से छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं-बचता कुछ भी नहीं है। पैसे बच पाने की कोई संभावना ही नहीं रहती, कैशलेस, यानी बिना पैसे के ही होती है उनकी जिन्दगी। उन्हें बैंक से कोई कर्ज भी नहीं मिल सकता। किसी भी बड़ी जरूरत को पूरा करने के लिये वे साहूकार या महाजन से ही उधार लेते हैं और मनमाने ब्याज को ही चुकाने में जिन्दगी बीत जाती है। आज भविष्य भी अंधकार में ही डूबा दीख रहा है, कयोंकि लॉकडाउन के बाद वापस आने पर उनके वेतन में तो कटौती होगी ही, जो वेतन मिला नहीं, उसकी भी उम्मीद खत्म हो चुकी है। आज 1.3 बिलियन की जनसंख्या में, पूरा एक बिलियन, जो असंगठित क्षेत्र में है, सिर्फ जिन्दा रहने के लिये संघर्ष करते हैं, अगर उनके पास रोजगार भी है, उसमें भी वेतन में कोई बढ़ोतरी नहीं होती, काम करने की समुचित
सुविधाएं भी नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में महामारी और उसके साथ तालाबंदी से आर्थिक स्तर तो कगार पर आ ही चुका है, उत्पादन के सारे क्षेत्रों में भी ठहराव है, आपूर्ति की व्यवस्था, मांग और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने वाली सारी व्यवस्था भी संकट से घिरी है। सरकार को आज पूरी ताकत से अपनी सारी श्रम शक्ति, गहराते संकट में परिवर्तन का नया दौर यानी मेहनतकश जनता को बचाना होगा। आज पूरी व्यवस्था के सामने जो चुनौती है उसे सिर्फ वही मजदूर पराजित कर सकता है, जो समाज में अपनी हर जरूरत के लिये मोहताज रहता है। यह आज सिर्फ हमारी ही नहीं पूरे विश्व की स्थिति है। इसलिये सरकार को, अभाव से जूझती इस जनता को कैश देना होगा, अलाउन्सेज देने होंगे, अगर वे बेरोजगार हैं समुचित स्वास्थ्य सुविधा, आर्थिक सहयोग और टैक्सों में छूट देनी होगी। यह सब
जनता की क्रयशक्ति, को फिर से जीवित करने के लिये भी जरूरी है। लघु और मध्यम स्तर के उद्योग जो पिछले कई वर्षों से विषम कठिनाईयों से जूझते रहे हैं, बिखर भी चुके हैं, इन सबको फिर से जीवित करना होगा। उन्हें समुचित आर्थिक आपूर्ति करनी होगी। अब तक आर्थिक प्रगति के विषय में आंकड़े
भी पूरी परसिथति को बयान नहीं करते रहे हैं। जैसे वृद्धि दर को सिर्फ उत्पादन से जोड़ा जाता रहा है, जिसमें काम के घंटे, उनमें की गई कड़ी मेहनत, इन सबों को नहीं जोड़ा जाता है। ऐसा प्रायः असंगठित क्षेत्रों में देखा गया है। इसमें कृषि क्षेत्र भी है, जिसमें किसान की आय को जोड़ा नहीं जाता। विकासदर की बुनियादी रेखा वहां से शुरू होती है, जब किसी संकट में उत्पादन दर नीचे गिर चुका रहता है। जैसे जब लगातार दो साल सूखा पड़ा, इस अकाल में जमीन पर कुछ भी उगाया न जा सका। इस भयानक
सूखे के बाद ही कृषि क्षेत्र में काम शुरू हुआ। जो कुछ हुआ वह बढ़ोतरी ही थी, इसे ही वृ(िदर या ‘ग्रोथ’ मान लिया गया। यही औद्योगिक क्षेत्र में भी लागू होता है। यह संकट की सचाई और उसे दूर रखने के लिये आवश्यक उपायों से बचने के लिये किया जाता है, पर इससे भयानक आर्थिक क्षति होती है-और यह
आज इस महामारी के संकट में उजागर होकर सामने आ गया है।
        इस संकट में सबसे बड़ी समस्या भूख की है-और भोजन जुटाने के लिये कृषि व्यवस्था को उबारना होगा। जन वितरण व्यवस्था से राशन का वितरण भी होता है। फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के पास 77 मिलियन टन अनाज भरा पड़ा है, आमतौर पर इसमें 42 मिलियन टन से भी काम चलता है। इसलिये इस अनाज को जनता में बांटने के लिये एफसीआई के गोदामों को खोल देना चाहिये। लेकिन वास्तविकता यह है कि जो छह किलोग्राम अनाज राशन में मुफ्त में बांटने का निर्णय है, उसके लिये भी राज्यों से पैसा मांगा जा रहा है। आर्थिक संकट की लगातार उपेक्षा के नतीजे भी सामने आ रहे हैं। 22 मार्च के बाद से बेरोजगारी में तिगुनी बढ़ोतरी हुई है। यह 8.7 प्रतिशत से 23.4 प्रतिशत तक और फिर 5 अप्रैल तक 30.9 तक पहुंच चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज 20.2 प्रतिशत है। इस तरह पूरे देश में यह बेरोजगारी,
सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग इकोनोमी की रिपोर्ट के अनुसार 23. 4 तक पहुंच चुकी है। हमारे देश में वेतनभोगी मजदूरों की संख्या बहुत ही कम है, सिर्फ 22.1 प्रतिशत। ये भी वो वेतन है जो यूनिट को मिलने वाले रेवेन्यू से नहीं जुड़ा है। बाकी के 78 प्रतिशत अमानवीय परिस्थितियों में, बिना किसी सामाजिक
सुरक्षा के काम करते हैं यही वह मजदूरों की विशाल जमात है, जो अपने घरों की ओर, सैकड़ों मील पैदले चले जा रहे हैं, जहां भूख और बेरोजगारी का एक नया दौर उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। बेरोजगार, बेसहारा और भूखी यह जनता ही देश की वह ताकत है जो देश को समृ(ता देती है, ओर समाज को आगे
ले जाती है। आज यह सत्य क्रमशः विश्व के सामने उजागर हो रहा है, जिसे किसी भी तरह अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस संकट ने पूरी व्यवस्था को एक नया आयाम दिया है, जो दक्षिणपंथी सोच की निरर्थकता को सामने ला रही है।

ग्रामीण संकट में कोरोना वायरस महामारी ने जोड़े नये आयाम

ग्रामीण संकट में कोरोना वायरस महामारी ने जोड़े नये आयाम
आज भारत एक अचानक दौर से गुजर रहा है। 25 मार्च 2020 से लागू तीन सप्ताह का राष्ट्रव्यापी
लॉकडाउन 3 मई तक के लिए आगे बढ़ गया है। भयानक कोविड-19 (कोरोना महामारी) को फैलने से रोकने के लिए निश्चय ही लॉकडाउन आवश्यक था। देश का समूचा आर्थिक कार्यकलाप लगभग पूरी तरह बंद है। इससे देश के लोगों की जिन्दगी और रोजी-रोटी पर अत्यन्त कष्टदायक प्रभाव पड़ा है। देश पहले ही आर्थिक गिरावट, बेरोजगारी, जनता की कम आमदनी, गरीबी, कुपोषण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संकट और चिन्ताजनक आर्थिक असमानता जैसी गंभीर समस्याओं का शिकार था। कोविड-19 ने इन तमाम संकटों एवं समस्याओं से और भी विकराल बना दिया है।
        कोविड-19 ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संकट में नये आयाम जोड़ रहा है। इस साल मानसून अच्छा रहा। इतना अच्छा कि देश के विभिन्न भागों में भूजल-स्तर भी ऊपर उठा। अच्छे मानसून के कारण अपनी लहराती हुई फसलों को देखकर किसानों को बड़ी उम्मीदें थी कि पैदावार अधिक होगी--इस साल उनकी आमदनी में अच्छी वृद्धि  होगी। कोविड-19 ने देशभर के किसानों की इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया। फसलों को काटने-गहाने का समय आते-आते देश में लॉक-डाउन घोषित हो गया। अन्य राज्यों से आये जो मजदूर फसलों की कटाई-गहाई में मदद किया करते थे, जो यहां आ चुके थे, वे लॉकडाउन के कारण वापस चले गये और जो आने को तैयार बैठे थे, उनका आना रूक गया। अब फसलों की कटाई-गहाई हो तो कैसे हो? जिस समय फसल पककर खेतों में तैयार खड़ी थी। कटाई-गहाई का काम अस्तव्यस्त हो गया। न केवल कटाई-गहाई का काम अस्तव्यस्त हुआ, बल्कि यह समस्या
भी पैदा हो गयी कि यदि किसी तरह फसल काट ली गयी, अनाज निकाल लिया गया तो लॉकडाउन के कारण उसकी बिक्री कैसे होगी। गांवों के लोगों के सामने एक ऐसी अन्य समस्या भी आ गयी है जो पहले
कभी नहीं देखी गयी। बड़ी संख्या में गांवों के लोग शहरों में जाकर छोटी-मोटी मजदूरी करते हैं, असंगठित/अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं। उन पर लॉकडाउन का सबसे खराब असर पड़ा है। इसका ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर तुरन्त ही असर पड़ रहा है।
देश की लगभग 46.5 करोड़ की श्रमशक्ति (2017-18) में से लगभग 42.2 करोड़ लोग ग्रामीण संकट में कोरोना वायरस महामारी ने जोड़े नये आयाम अनौपचारिक/असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। यह संख्या भारत की कुल श्रमशक्ति का लगभग 91 प्रतिशत है। समुचित आकलन की कोई व्यवस्था न होने के कारण विभिन्न आकलनों में थोड़ा अंतर मिलता है। परन्तु हरेक आकलन से यह स्पष्ट होता है कि कुल श्रमशक्ति में  अनौपचारिक/ असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की संख्या 90-91 प्रतिशत से अधिक
ही है, कम नहीं। अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों को नियमित वेतन नहीं मिलता। उनकी आमदनी नियमित नहीं। उनकी आमदनी बहुत कम है। अनौपचारिक क्षेत्र के इन मजदूरों के दो-तिहाई हिस्से को (अर्थात कुल श्रमशक्ति के लगभग 60 प्रतिशत को) (375 रू. की राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी
(जिसकी श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा नियुकत एक समिति ने 2017-18 में घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए मानकर जनवरी 2019 में सिफारिश की थी, नहीं मिलती )(जो लोग स्वरोजगार में लगे हैं
उनके मामले में उनकी दैनिक आमदनी 375 रूपये से कम है।) (अप्रैल 2020 के ईपीडब्लू में के. पी. कन्नन के लेख ‘‘कोविड-19 लॉकडाउनः प्रोटेक्रिंग द पुअर मीन्स कीपिंग द
इंडियन इकॉनोमी एफ्लॉट’’ से उद्धत ।)
             खेत मजदूर, दिहाड़ी मजदूर, स्वरोजगार जैसे कि रिक्शा चालन या बूट पालिश करने वाले एवं अन्य छोटे-मोटे काम पर गुजर-बसर करने वाले मजदूर, निर्माण मजदूर, छोटे-बड़े औद्योगिक ध्व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम औद्योगिक प्रतिष्ठानों आदि में काम करने वाले कैजुअल/ठेका/अस्थायी मजदूर, दुकानों-खुदरा व्यापार क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर, खानों, चायबागानों
में काम करने वाले मजदूर, घरेलू मजदूर आदि औपचारिक क्षेत्र के मजदूरों में शामिल हैं। जैसे ही राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा हुई पहले ही दिन से इन मजदूरों को भूखमरी और चरम कंगाली का डर सताने लगा। ट्रेनों एवं बसों के बंद हो जाने और लॉकडान की घोषण होते ही रोजगार खत्म हो जाने पर ये लाखों मजदूर अपने बाल-बच्चों समेत पैदल ही सैकड़ों मील दूर अपने गांवों के लिए निकल पड़े। इससे उनकी चरम दयनीय कमजोर आर्थिक स्थिति का पता चलता
है।
            रिपोर्टों के अनुसार, 24 मार्च की रात अचानक तीन सप्ताह के लॉकडाउन की घोषणा के फलस्वरूप लाखों प्रवासी मजदूर देश भर में राहत शिविरों/शेल्टर आदि में शरण लिए हुए है। केन्द्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक शपथपत्र के अनुसार देश में केन्द्र सरकार द्वारा 22,567 और विभिन्न
एनजीओ द्वारा संचालित 3309 शरण केन्द्रों में 10.36 लाख लोग अलग-अलग स्थानों पर अटके पड़े हैं
यह उन खाद्य केन्द्रों के अतिरिक्त है जिनमें लगभग 74 लाख लोग खाना खा रहे हैं। इनके अलावा विभिन्न
जानकारियों के अनुसार लगभग 15 लाख लोग उन फैक्टरियों या कार्यस्थलों के परिसरों में शरण लिए हुए हैं जहां वे काम किया करते थे। यह घटनाक्रम अचानक एवं अप्रत्याशित था, सब कुछ अस्तव्यस्त है। ऐसे में यह जानकारी प्रोविजनल ;अस्थायीद्ध ही मानी जा सकती है। वास्तविक संख्या इससे कहीं
अधिक हो सकती है। कहा जा रहा है कि इन लोगों के ठहरने, खाने-पीने की समुचित व्यवसथा की गयी है। इस पर कैसे यकीन किया जा सकता है? सरकार के पास कौनसा विभाग है जो अचानक इतनी बड़ी
व्यवस्था कर सके? अपने गांवों की तरफ पैदल जाते हुए इन लाखों लोगों  को पुलिस धकेल कर किसी
केन्द्र/स्कूल/राहत शिविर में ले जा सकती है परन्तु ठहरने-खाने-पीने की समुचित व्यवसथा कर सके इसके लिए सरकार के पास कोई तंत्र ही नहीं जैसे-तैसे व्यवस्था की गयी है। अनेक स्थानों पर तो पुलिस ही खाना बांटती देखी गयी है। अतः रिपोर्टें आ रही हैं कि जिन स्थानों पर इन लोगों को रखा गया है। (द इंडियन एक्सप्रेस ;12 अप्रैल 2020) 10 अप्रैल को सूरत में तो 20,000 मजदूर लॉकडाउन के बावजूद सड़कों पर उतर पड़े। तोड़फोड़ हुई। आगजनी हुई। गिरफ्तारियां हुई। पुलिस की लाठियां चली। राजधानी दिल्ली में ही तीन शेल्टर होमों को आग लगा दी गयी जहां खाने के संबंध में कुछ बवाल
चल रहा था। ये अशुभ संकेत हैं।
            11 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कांफ्रेंस की। राज्य सरकारों ने चिन्ता व्यक्त की कि अपने गांव पैदल जाते जिन मजदूरों को रोक कर राहत शिविरों में रखा गया उनकी व्यवस्था करना एक विकट कार्य है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने अपने राज्य में ऐसे 6 लाख मजदूरों का मुद्दा
उठाया। लॉकडाउन के कारण करोड़ों मजदूरों के अपने कार्यस्थानों से इस बड़ी संख्या में विस्थापन ने गांवों में चल रहे आर्थिक संकट में एक नया आयाम जोड़ दिया हैं अपनी बेहद कम आमदनी के बावजूद ये मजदूर अपना पेट काटकर अपने परिवार की मदद के लिए कुछ बचत करते थे। हर महीने-दो महीने बाद अपने गांव में रह रहे परिवार को पैसा भेजते थे। उनका यह पैसा ग्रामीण आमदनी में अच्छा खासा योगदान करता है। गांवों में पैसा पहुंचने का यह सिलसिला अचानक बंद हो गया है।
        किसानों और कृषि पर प्रभाव संयोगवश लॉकडाउन की घोषणा ऐसे समय हुई जब रबी की फसले
खेतों में पक कर तैयार हो रही थी। खासतौर पर भारत के उत्तर पश्चिम एवं मध्य क्षेत्रों में गेहूं और दालों की फसल तैयार थी। राज्यों ने लॉकडाउन के दौरान कृषि के लिए कुछ छूटों की घोषणा की है। परन्तु इसके बावजूद मजदूर लॉकडाउन के कारण एक इलाके से दूसरे इलाकों को नहीं जा सकते। कृषि उत्पादों की परिवहन एवं आपूर्ति श्रृंखला छिन्न-भिन्न हो गयी है। इसका कारण संतोषजनक समाधान सामने नजर नहीं आता। फसलों की कटाई-गहाई के काम में भारी मुश्किल पैदा हो गयी है।
फसलों की कटाई-गहाई की समस्या के साथ उनकी बिक्री की समस्या हैं प्रवासी मजदूर चले गये हैं।
मंडियों में मजदूर कम हैं कौन बिक्री के लिए आये गेहूं को उतारेगा, कौन साफ करेगा, कौन बोरों में भरेगा और कौन उन्हें ट्रकों में भरेगा? परिवहन की व्यवस्था कमजोर पड़ गयी है। पर्याप्त
संख्या में ड्राइवर ही नहीं हैं तो मंडियों में आया यह अनाज गोदामों तक कैसे पहुंचेगा और गोदाम में पहुंचा तो वहां कौन उसे उतारेगा? ऐसे में सरकारी एजेंसिया यह निजी व्यापारी क्या
किसानों के पूरे खाद्यान्ना को खरीद पायेंगे? मुश्किल ही नजर आता है। सरकार विश्वास दिलाने की कोशिश कर रही है। पर उस पर विश्वास नहीं होता। जब सामान्य समय में ही सरकार पूरा अनाज नहीं खरीदती या नहीं खरीद पाती तो आज के असामान्य हालात में जब न पर्याप्त मजदूर हैं और न पर्याप्त
परिवहन-कैसे भरोसा हो सकता है कि सरकारी एजेंसियां निर्धारित अवधि में किसानों से उनका पूरा अनाज खरीद लेंगी। जब सरकारी एजेंसियां अनाज नहीं खरीद पायेंगी और खरीद का निर्धारित समय खत्म हो जायेगा, तो मजबूरन किसानों को अनाज को औने-पौने भाव-न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम भाव पर बेचना पड़ेगा। अभी भी खबरें आ रही है कि सरकारी खरीद शुरू न होने के कारण किसान न्यूनतम
समर्थन मूलय से कम पर बेचने को मजबूर हो रहे हैं। कपास के किसानों के सामने भी भारी नुकसान का खतरा मंडरा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कपास के भाव में भारी गिरावट आ गयी है। कपास के
किसानों के सामने भारी नुकसान से बचने का कोई रास्ता नहीं। परिवहन, मांग एवं भंडारण के अभाव में शीघ्र खराब हो जाने वाले कृषि उत्पाद-फल, सब्जी, फूल और दूध-खराब हो रहे हैं। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि पेड़ों पर फल पक गये हैं, परन्तु उन्हें तोड़ने वाले नहीं हैं। कुछ किसानों ने फल तोड़ भी लिए तो
उन्हें न वह कहीं ले जा सकते है, न बेच सकते हैं। यही हाल सब्जी उगाने वाले किसानों का है। खेत में सब्जी तैयार है। उसे कहां ले जायें? कैसे ले जाएं? कैसे बेचें? कोई रास्ता नहीं। सब्जी सूख रही है, सड़ रही है। उन्होंने जितना पैसा लगाया था और मेहनत की थी, सब कुछ बर्बाद हो गयी। कुछ किसान किसी तरह सब्जी को मंडी ले जाते हैं तो मंडी के व्यापारी कहते हैं कि लॉकडाउन के कारण यह बिकेगी कैसे? वह किसान को बेहद कम दाम देते हैं परन्तु जब वही सब्जी उपभोक्ता को मिलती है तो ऊंचे दाम पर। और कारण फिर वही कि लॉकडाउन चल रहा है।
      मुर्गीपालन उद्योग से जुड़े किसान तो लॉकडाउन से पहले ही तबाह हो गये। अफवाह फैल गयी कि अंडे और मुर्गे-मुर्गियां कोरोना बीमारी को फैला सकते हैं। एक अफवाह मात्र से मुर्गी पालन उद्योग तबाह हो गया। कश्मीर और भारत के अन्य हिस्सों के फूल उत्पादन करने वाले किसानों को भी लॉकडाउन की भारी चोट पहुंच रही है। खेतों में  फूल खिले हैं। इन्हें तोड़कर कहां ले जाएं? बाजार बंद हैं। फूल कुम्हला रहे हैं, सूख रहे हैं। यही हाल दूध-उत्पादन करने वालों किसानों का है। मिठाई की दुकानों और होटल-रेस्टोरेंट बंद हैं जहां काफी दूध की खपत होती है। केला उत्पादक किसान हों, या अंगूर या अन्य फलों के
उत्पादन किसान हों, सब्जी पैदा करने वाले किसान हो या फूल उत्पादक किसान-सभी का सभी राज्यों में कमोबेशी एक जेसा हाल है। सब के सब किसान बेहाल हैं।
देश के किसान पहले ही बड़े पैमाने पर कर्जग्रस्त हैं। सभी कृषि उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला के अस्तव्यवस्था हो जाने के कारण किसानों की आमदनी में अप्रत्याशित रूप से भारी कमी आ गयी
है। इससे ग्रामीण कर्ज ग्रस्तता के नये ऊंचाई पर पहुंचने का खतरा पैदा हो गया है।
आर एस यादव 
मुक्ति संघर्ष 

जनता के स्वास्थ्य एवं अधिकारों की सुरक्षा के लिए तुरंत उपाय किये जाएं।

जनता के स्वास्थ्य एवं अधिकारों की सुरक्षा के लिए तुरंत उपाय किये जाएं।

            हम इस मुश्किल समय में संघर्ष करने वाले डॉक्टर्स, नर्सों, अस्पतालों और स्वास्थ्य ईकाईयों को दिल की
गहराईयों से धन्यवाद देते हैं। हम उनके प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करते हैं जो कोविड-19 महामारी से पीडित हैं और उनके जल्दी ठीक होने की कामना करते हैं। हम उन देशों को सलाम करते हैं जिन्होंने सबसे प्रभावित देशों के लिए एकजुटता एक्शन किये, जैसे सुरक्षात्मक सामान और स्वास्थ्य पेशेवरों को भेजना, जिसे भेजने वाले में चीन, क्यूबा और रूस शामिल थे, यह यूरोपीय यूनियन की अनुपस्थिति के बाद किया गया।
कोविड-19 महामारी ने पूंजीवादी देशों में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को त्रासद रूस से सामने ला दिया, उनकी कमी
को हम कोरोना वायरस के फूटने से पहले से ही जानते थे। यह कमी कोई दुर्घटनावश नही हुई है, ये सरकारों के
द्वारा अपनायी जा रही जन विरोधी नीतियों और बडे सरमायदारों के हितों को साधने का नतीजा है, जिसके लिए
उन्होंने एकाधिकारी समूहों के मुनाफे को बढाने के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का नीजिकरण और व्यवसायिकरण कर डाला। इन नीतियों ने जनता की जरूरतों के लिए जरूरी सभी उपलब्ध बचाव की वैज्ञानिक और प्रोद्यौगिकी क्षमतओं को कमजोर कर डाला। आज का अनुभव पूजीवाद की परजीवीता और समाज विरोधी प्रकृति को सामने ले आता है और समाजवाद की श्रेष्ठता और सामायिकता और लोकप्रिय जरूरतों पर आधारित एक केन्द्रीय वैज्ञानिक योजना जोकि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और रोकथाम, अस्पतालों, मेडिकल, नर्सिंग स्टॉफ, इवाईयों, लैब, मेडिकल परीक्षाओं और उन सभी जरूरी चीजों का बचाव कर सके जो जनता की निरंतर और आपातकालीन स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा कर सके।
           वैश्विक अर्थव्यवस्था में पहले से मौजूद मंदी अब कोरोना वायरस के फैलने और ज्यादा बढेगी और आने
वाले दिनों में नये संकट पैदा करेगी। सरकारों में एकता के प्रचार के बावजूद वे सरकारें जो बडे पूंजीपतियों की सेवा में लगी हैं, उनका फोकस उन वित्तीय  उपायें पर होगा जो एकाधिकारी समूहों की सहायता करें और एक बार फिर चाहेंगी कि इस संकट का बोझ मजूदरों और अन्य सामान्य जनता पर लाद दिया जाए। मजदूर और जनता इसका  भुगतान नही कर सकती हैं और ना ही उन्हें करना चाहिए। व्यक्तिगत जवाबदेही राज्य और
सरकार की जवाबदेही को कवर करने के लिए इस्तेमाल नही हो सकती है।
            आज जिन उपायो को करने की जरूरत है उन्हें करते हुए, एकाधिकरी समूहों को सहयोग करने के खिलाफ जनता के संघर्ष की आवश्यकता है, जनता जोकि पूंजीवादी मुनाफे की वेदी पर अपने संतोष और जरूरतों का त्याग करती आयी है।
                       कम्युनिस्ट और वर्कर्स पार्टियां महामारी से निपटने के लिए तुरंत सभी जरूरी उपाय करने की मांग करती है जिसमें निम्नलिखित शामिल हैंः
1 -तुरंत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को राज्यश् की फंडिंग द्वारा मजबूत किया जाए, नियमित मेडिकल स्टॉफ की भर्ती
और नर्सिंग स्टॉफ की भर्ती पूरे श्रम अधिकारों के साथ। इंटेंसिव केयर यूनिट की सभी जरूरतों को पूरा किया जाए और साथ ही पूर्णतया संचालित स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के लिए जरूरी ढांचागत सुविधाओं और शोध सेवाओं को उपलब्ध कराया जाए।
2 -तमाम सुरक्षा साधनों ;मास्क, दस्ताने, एन्टीसेप्टिक आदि का राज्य जनता के लिए मुफ्त इंतजाम करें और
मुनाफाखोरी के खिलाफ संघर्ष  करें ।
इस लडाई में सभी अस्पतालो में लगे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सभी सुरक्षा के सामानों का प्रावधान करें।
3 -सभी कामकाजी सामान्य जनों की आय और अधिकारों की रक्षा की जाए।
कोविड-19 महामारी के तहत पूंजी की दायित्वहीनता पर एक रोक लगाने के लिए फालतूपन और वेतन अधिकारों, काम के समय, काम से छुट्टी, और दूसरे श्रम अधिकारों को बचाने के लिए प्रक्रिया शुरू करे। मजदूर वर्ग की उनके कार्यस्थलों पर सुरक्षा के तुरंत कार्यवाही हो।
4 -कोरोना के नाम पर जनता के किसी भी प्रकार के जनवादी अधिकारों में कटौती को ना करें ।
5 -सभी प्रतिबंधों और आर्थिक रूप से अलग करने के उपायों को खत्म करें, जोकि इन हालात में अधिक
अन्यायपूर्ण, अपराधिक है और देश की जनता के जीवन को और अधिक मुश्किल बना देगी। जनता के जीवन
और स्वास्थ्य कही रक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय किये जाएं।
6 -हम नाटो जैसे, साम्राज्यवादी दखल और सैनिक अभ्यास का विरोध करते हैं और मांग करते हैं कि
सार्वजनिक संसाधनों को जनता की जरूरतों के लिए उपयोग किया जाए, जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली
और समाजिक सुरक्षा व्यवस्था का वित्त पोषण करना।

corona and after

कोरोना के बाद विश्व व्यवस्था का पुनर्निमाण
यह एक खण्डों में बंटा हुआ, स्थिर और जमा हुआ स्थान था। एक खामोश लोगों और जमी हुई सडकों का स्थान।
जब फौकाल्ट इस डरावनी लाइनों को लिख रहे थे, तो माइकल फौकाल्ट सतरहवीं शताब्दी में पूरे यूरोप की गलियों में फैले ‘ब्लैक प्लेग‘ से बने फ्रांस के वास्तविक चेहरे का वर्णन कर रहे थे। परंतु उनके शब्द आज भी यहां तक कि आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस और न्यूक्लियर युग के दौर में भी भविष्यवाणी की तरह दिखाई पडते हैं। कोरोना वायरस ने एक वैश्विक सदमा दिया है और पूरा संसार खंडों में बंटकर, स्थिर और जमा हुआ बन गया है।
युद्ध  के साथ महामारी भी इंसानी नस्ल और सभ्यता के रूपांतरण में एक अखण्ड भूमिका अदा करही है। 14वीं
सदी में जब यूरोप में प्लेग फैला और उसकी एक तिहाई आबादी को चपेट में ले लिया, इसने चमत्कारिक ढंग से
सामंतवाद को ध्वस्त कर दिया था। ठीक उसी प्रकार 1918 में जब दुनिया में बेहद अभूतपूर्व सघन तरीके और तेज गति से स्पेनिश फ्लू फैला तो वास्तव में वह जन स्वास्थ्य सेवा की अवधारणा को नये तरीके से परिभाषित करने वाला क्षण था। उसके बाद से जन स्वास्थ्य वैश्विक नीति निर्धारण के पूरे परिदृश्य में जन स्वास्थ्य एक केन्द्रीय स्तंभ बन गया था। अब मानवाता फिर से एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है। कोरोना वायरस धरती पर 7.8 अरब लोगों के जीवन के लिए खतरा बन रहा है। अभी तक यह मारक वायरस दुनियाभर में 88 हजार से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है और 15 लाख से ज्यादा लोग इससे संक्रमित हैं। जीन और स्वास्थ्य के अलावा महामारी के दूरगामी परिणाम होंगे और यह मौजूदा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य को नयी शक्ल दे देगा। हालांकि यूरोपीय और अमेरिकी राजनीति प्रणाली दुनिया को एक सर्वमान्य नेतृत्व देने में बुरी तरह से नाकाम रही है, मानवीय भावना की ताकत हजारों डाक्टरो, नर्सों, स्वास्थ्य सेवा स्टॉफ और सामान्य जनों से परिलक्षित हो रही है। निसंदेह, महामारी मानवीय लचीलेपन, हमारी जन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली, और सबसे पहले इंसानी नस्ल में दुलर्भ चुनौतियों से जीत जाने की अन्तर्निहित भावना के लिटमस टेस्ट की तरह है। प्रसिद्ध  इतिहासकार और बेस्ट सेलर लेखक युवल नोएह हरारी ने इसे हमारी पीढी का सबसे बडा संकट बताया है।
बुहान से शुरू होकर विभिन्न महाद्वीपों में फैल जाने वाली महामारी के उभरते हुए व्यापक खतरे के खिलाफ
आइये उन प्रमुख कारकों को खोजने और विश्लेशण करने का एक उदारवादी कोरोना के बाद विश्व व्यवस्था का पुनर्निमाण प्रयास करें जो भविष्य की वैश्विक प्रणाली को आकार दे सकें। कोरोना वायरस के फैलाव ने वैश्विक
पूंजीवाद के अनंत सपनों को चकनाचूर कर दिया है। कम्युनिज्म के ढहने के बाद, हम निर्बाध पूंजीवाद के साक्षी
रहे हैं, जिसने अपने व्यवसायिक और नव साम्राज्यवादी हितों को साधने के लिए देशीय सीमाओं का भी पार कर
लिया था। जिसका बडे पैमाने पर भूमंडलीकरण, उदारवाद और और नव उदारवादी फ्रेमवर्क की ताकतों ने
समर्थन किया। यह व्यापक आर्थिक और राजनीतिक ढांचा जिसे नवउदारवादी नीतियों की बुनियाद पर खडा किया गया था वह आज वित्त पंूजीवाद की सबसे बडी तबाही का सामना कर रहा है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला जो काफी हद तक चीन पर निर्भर थी वह आज चरमरा गयी है। इसे अब भूमंडलीकरण के बारे में नयी सोच की आवश्यकता है। इसका नतीजा अब सख्त राष्ट्रीय नियंत्रण और स्थानीयकृत उत्पादन और सख्त प्रवासी कानूनों के रूप में सामने आयेगा। जैसा कि प्रसिद्ध  अर्थशास्त्री पॉल मेसन ने ठीक ही कहा है कि भूमंडलीकरण का पुराना मॉडल जिसमें अमेरिका और बहुपक्षीय संगठनों जिसमें आईएमएफ, विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओं का वर्चस्व था वो अब दूसरे देशों में अपनी वैधानिकता खो चुका है।
                      इसीलिए, उभरते हुई वैश्विक व्यवस्था में भूमंडलीकरण और वैश्विक वित्त पूंजीवाद एक व्यापक और सघन रूपांतरण से होकर गुजरेगा। यह एक छुद्र बदलाव नही होगा। बर्लिन की दीवार और सोवित संघ के ढहने के बाद फुकुयामा, हंटिंगटन और मेकफर्सन जैसे विद्वानों ने नवउदारवादी वैश्विक अर्थप्रणाली की व्याख्या करते हुए इसे ‘इतिहास के अंत‘ और पूंजीवाद की अंतिम जीत‘ का नाम दिया था। अब एक नन्हे से वायरस ने वैश्विक अर्थप्रणाली के ढांचे को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। कोरोना के बाद के घटनाक्रम में एक रोचक सकारात्मक बदलाव समाज के नजरिये में मजदूरों और उनके अन्तर्निहित आत्मसम्मान को लेकर आयेगा। पूरी दुनिया में, चाहे वह चीन, ताइवान, इटली और अमेरिका हो हम हर कहीं मजदूरों की कमी में कारखानों और दफ्तरों के बंद होने के गवाह हैं। कईं देशों में, कृषि गतिविधियां गंभीर संकट का सामना कर रही हैं कि कृषि
मजदूरों ने सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के कारण काम करने से इंकार कर दिया है। इस रूझान ने पंूजी के वर्चस्व को खारिज कर दिया है, जबकि अभी तक केन्द्रीय भूमिका में मानव श्रम से उपर पूंजी और उद्यम को रखा जाता था। समाज ने महसूस कर लिया है कि एक निश्चित सीमा से आगे मशन मानव श्रम की जगह नही ले सकती है। मानव    श्रम पर कार्ल मार्क्स के भविष्य सूचक शब्द एकबार फिर से प्रासंगिक हो रहे हैं। मौजूदा संकट हमें श्रम के सम्मान की याद दिलाता है। आजकल के समाज में एक कूडा बीनने वाले अथवा एक स्वास्थ्यकर्मी का महत्व एक फण्ड मैनेजर अथवा एक प्रबंधन विशेषज्ञ से अधिक है। यदि हम आने वाले कल में एक गंभीर खाद्य संकट का सामना करते हैं, एक कृषि मजदूर समाज में सबसे अघिक महत्वपूर्ण पेशेवर हो जायेगा क्योंकि मानवता का अस्तित्व उसके उत्पादक श्रम पर निर्भर करेगा। उसके आंतरिक मूल्य को व्हाइट कॉलर मजदूर
से बदला नही जा सकता है। सटीक होने के लिए हमें कुदरत की दी गयी अनिश्चितताओं को देखते हुए यह
महसूस करना चाहिए कि प्रत्येक पेशे की अपनी स्वाभाविक योग्यता है। श्रम के मूल्य का आंकलन उससे किया जाना जिस सेवा की वह मजदूर समाज के लिए पेशकश करता है, बजाये उसके कि जो सामाजिक सुविधाएं उसके पासउस श्रेणीबद्ध  सत्ता वाले समाज में उसके पास हैं। भविष्य की अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में शायद जन स्वास्थ्य सेवा नीति निर्धारक बहस की आधारशिला के अरूप में उभरेगा। हम पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं के बाजार मॉडल की अवधारणा के ध्वस्त हो जाने के गवाह हैं। जैसा कि नोअम चोस्की मानते हैं कि यह नव उदारवादी प्लेग है जिसने पूरी दुनिया में जन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। पिछले कुछ दशकों में अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था स्वास्थ्य सोवा ढांचे के छोटा होने, विनिवेश होने और नीजिकरण की साक्षी है जिसने कि स्वास्थ्य सेवाओं के व्यवसायिकरण की राह प्रशस्त की। महामारी के इस संकट में जब वो देश जिसके पास मजबूत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली है जिसमें चीन, सिंगापुर और ताइवान शामिल हैं ने महामारी पर प्रभावी तरीके से काबू पा लिया तो वहीं जिनकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली बाजार आधारित थी जैसे अमेरिका और यूरोपीय यूनियन वे बुरी तरह से तबाह हो गये। यहीं पर केरल की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली वैश्विक रूप से प्रासंगिक हुई है। केरल ने महामारी पर प्रभावी तरीके से काबू किया है, सक्षमता से सार्वजनिक एक्शन के उपयोग, जन केन्द्रीत स्थानीय प्रशासन, और व्यापक राजनीतिक चेतना के माध्यम से जिसने राज्य के सामाजिक परदिृश्य को परिभाषित किया है। भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में स्वास्थ्य को एक बुनियादी अधिकार और एक वैश्विक सार्वजनिक वस्तु की तरह लिया जायेगा। इसीलिए स्वास्थ्य का उत्पादन नही किया जा  सकता है और उसे कामेडिटी की तरह बेचा भी नही जा सकता है। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य को एक सार्वजनिक वस्तु की अवधारणा को मान्यता दी है और विश्व बैंक उससे पहले ही ऐस कर चुका है, फिर भी मौजूदा संकट फिर से पूरी दुनिया में इस अवधारणा को जिंदा कर रहा है। स्वास्थ्य के एक सार्वजनिक वस्तु की अवधारणा के साथ ही इसमें राष्ट्र राज्य की भूमिका पर और इसकी नैतिक जिम्मेदारी भी पुनर्विचार होगा। इस उभरते हुए रूझान के दो आयाम हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, प्रोद्यौगिकी और सामाजिक सुरक्षा में अधिक निवेश के साथ एक कल्याण राज्य के मॉडल को
पुनर्जीवित करना। हम फैलती हुई महामारी को प्रभावी तरीके से नियंत्रित करने में बाजार राज्य के मॉडल की
नाकामी को देख चुके हैं। पॉल मेसोन के अनुसार यह एक ऐसे कल्याण राज्य की जरूरत को बना सकता है जिसका फोकस सामाजिक न्याय, समानता और सार्वजनिक वस्तुओं के समान वितरण पर होगा सकता है। इसका दूसरा महत्वपूर्ण पहलू एक अधिनायकवादी राज्य का पुनरूत्थान है। कोरोना संकट एक व्यापक राष्ट्रवाद, निगरानी और राज्य तंत्र की मजबूती की तरफ ले जायेगा। राज्य संकट से निपटने के लिए सख्त उपायों का सहारा लेगा और उसमें से अधिकतर उपाय संकट के निपट जाने के बाद भी जारी रहेंगे, इस प्रकार यह राज्य और उसके संस्थानों के चरित्र में एक स्थायी बदलाव लेकर आयेगा। जनता हो सकता है कि स्वैच्छा से इस अधिकनायकवादी निगरानी राज्य को स्वीकार करेगा, कि वे महामारी के सामाज में फैलने से पहले से ही
लोकतांत्रिक व्यवस्था की विफलता से मायूस हैं। यदि जनता से स्वास्थ्य और निजता में चयन के बारे में पूछा जाता
है तो स्वभाविक ही वे स्वास्थ्य का ही चयन करेंगे। इस बारे में युवल नोएहा हरारी दो बुनियादी पसंदों की पहचान
करते हैं जिन्हें मनुष्यों को करना है। एक अधिनायकवाद और नागरिक सशक्तिकरण में चुनाव। दूसरी पसंद
राष्ट्रीय अलगाव और वैश्विक एकजुटता के बीच चुनाव। दूसरा गंभीर मसला जो अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में उठेगा वह है भोजन की कमी और और व्यापार रूकावटें। समानों की आवाजाही पर रोक के साथ मजूदरों की कमी और निर्यात पर रोक से पूरी दुनिया में गंभीर खाद्य संकट पैदा होगा। कजाखिस्तान ने पहले ही गेंहू, आटे और सब्जियों के निर्यात पर रोक लगा दी है। वियतनाम चावल का तीसरा बडा निर्यात है, उसने चावल के निर्यात को सस्पेंड कर दिया है। गेंहू के बडा निर्यातक रूस भी शीघ्र ही निर्यात रोकने जा रहा है। फलों और सब्जियों में भारी संख्या में मजदूर लगते हैं और मजदूरों की कमी आपूर्ति और निर्यात पर असर डालेगी। इस प्रकार विकासशील देशों में श्रम के आर्थिक शोषण पर आधारित एक भूमंडलीकृत अर्थप्रणाली को इस संकट के बाद प्राकृतिक रूप से ध्वस्त होगी। यह आपसी सम्मान, सहयोग और मानवात के प्रति सम्मान पर आधारित नयी वैश्विक सोच की जरूरत बना रहा है। वैश्विक महामारी इस अहसास की तरफ ले जाती है कि मानवता के पास एक वैधानिक और नैतिक वैश्विक नेतृत्व नही है। अमेरिका महामारी के तुरंत समाजिक फैलाव को रोकने का समाधान डिजायन देने और प्रभावी समस्या निवारक रणनीति की पेशकश करने में विफल रहा है। पश्चिम का औरा घट रहा है और इस तरह यह पूर्वी देशों के उदय का गवाह बन सकता है। जब अमेरिका और फ्रांस इटली की सहायता करने में विफल हो गये, तो क्युबा जैसा एक छोटा देश जो कि कईं दशकों से मजबूती से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, ने अपनी मेडिकल टीम कोरोना पीडित देशों की सहायता के लिए भेजी। यह साफ तौर पर उभरती हुई विश्व व्यवस्था में सैनिक ताकत पर नैतिक ताकत की प्रासंगिकता को जाहिर करता है। संक्षेप में, कोरोना संकट के बाद फिर से आकार लेती हमारी विश्व व्यवस्था दो महत्वपूर्ण कारकों पर निर्भर करती हैः पहला इस बैचेनी, क्वारंटीन और आइसोलेशन के संक्रमण के बीच हम ठीक प्रकार का विकल्प चुनते हैं। और दूसरा इन विकल्पों के डिजायन और क्रियान्वयन में विज्ञान, स्वास्थ्य और मानवता की अनिवार्य भूमिका।
भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में मानवता का अस्तित्व सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक वस्तुओं के रूप में विज्ञान, मानवता और स्वास्थ्य को फिर से वापस लाने पर निर्भर करेगा। परस्पर निर्भरता, परस्पर संबध और हमारी सामूहिक चेतना में विश्वास के आधार पर बना विश्व दृष्टिकोण मानवता पर आधारित नई विश्व व्यवस्था के निर्माण की जरूरत है। हमें आपसी विश्वास, सहयोग और मानवता के अस्तित्व के सिद्धांतों  पर आधारित न्यायप्रिय, समतामूलक और मानवीय विश्व व्यवस्था बनाने के लिए विभिन्न पसंदों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है। एक ठीक प्रकार का संतुलन मूल्यों और हितों, व्यक्तिवाद और सामूहिक मानवीय भावना, राष्ट्रवाद और अन्तर्राष्ट्रीयवाद, निजीकरण और सार्वजनिक कल्याण के बीच और सबसे पहले सभी नीतियों के आगे बढने की
भावना सबकी अच्छाई की अवस्थिति हो। इस गतिशील प्रक्रिया में सामाजिक और राजनीतिक रूप से चेतनशील
नागरिक निसंदेह एक उतप्रेरक भूमिका अदा करेंगे जैसा केरल के मामले में देखा गया है।
पी संदोष कुमार
मुक्ति संघर्ष 

Wednesday, 15 April 2020

HARYANA HEALTH SERVICES STRUCTURE

हरियाणा में स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा(2019) सोचने का विषय :
सरकार द्वारा निश्चित किये गए मापदंडों के हिसाब से 5000 की जनसंख्या पर एक 
उप स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए, 30000 की जनसंख्या पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 
होना चाहिए और 1,20,000 की जनसंख्या पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए।
हरयाणा की 2019 की अनुमानित जनसंख्या 2 करोड़ 86 लाख के लगभग है।
इसमें ग्रामीण जन संख्या 1करोड़ 86 लाख के लगभग हुई।
इसके हिसाब से हरियाणा में जो ढांचा होना चाहिए और जो है वह नीचे दिया जा रहा है--
संस्था                                 जो हैं                     जो चाहियें
उपस्वास्थ्य                               2650                           3720
केंद्र
पीएचसी                                  529                              620
सीएचसी।                               128                               186
हॉस्पिटल्स                              125
टीबी सेन्टर                              15
पोस्ट पार्टम।                            37
केंद्र
शहरी स्वास्थ्य                          16
केंद्र
नोट -- एक सीएचसी में निम्लिखित विशेषज्ञ होने चाहिए
सर्जन........ 1
शिशु रोग विशेषज्ञ....1
स्त्री रोग विशेषज्ञ....1
फिजिशियन....1
बेहोशी विशेषज्ञ ...1 ( हो सके तो)

अफसोस की बात है कि हरियाणा की 128 सीएचसी में से एकाध में ही ये सारे विशेषज्ञ होंगे।
सिविल अस्पतालों की हालत भी ज्यादा अच्छी नहीं हैं ।
जनता का भी उसका अपना स्वास्थ्य अभी एजेंडा बनना बाकी है।
जन स्वास्थ्य अभियान हरियाणा

दूसरे चरण के लॉकडाउन

दूसरे चरण के लॉकडाउन से जरूरी सेवाओं को बाहर रखा गया है। इसमें खाने-पीने की जरूरी चीजों की दुकानें, हेल्थ वर्कर्स (डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ), सफाईकर्मी, मीडिया पर्सन, सुरक्षाकर्मी (पुलिस, सुरक्षाबल) शामिल हैं। कुछ राज्यों में किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों को अपने उत्पादन के सामान को स्थानीय मंडियों में ले जाने की मंजूरी दी गई है। लेकिन इस मामले में राष्ट्रीय स्तर पर अभी कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। इसके साथ ही कोरोना वायरस का इलाज करने वाले सभी सरकारी अस्पताल या इससे जुड़े निजी अस्पताल, सरकारी दफ्तर, रसोई गैस एजेंसियों के ऑफिस, पेट्रोल पंप, थोक और खुदरा मंडियां, पैथोलॉजी, डायग्नोस्टिक सेंटर्स अपनी सेवाएं देते रहेंगे। दिल्ली की आजादपुर सब्जी मंडी में व्यापारियों ने सामाजिक दूरी का पालन करने के लिए ऑड-ईवन फॉर्मूला अपनाया है। ऑड नंबर वाले व्यापारी रोजाना सुबह 6 से 11 और ईवन नंबर वाले व्यापारी 2 से शाम 6 बजे तक मंडियों में माल बेचेंगे। इस लॉकडाउन में सामान ले जाने और ले आने वाले ट्रकों को भी छूट दी गई है। कंटेनमेंट जोन में जो लोग नहीं रहते हैं, वह जरूरी सामान लेने के लिए घर से बाहर जा सकते हैं। ऐसे में संबंधित शख्स को सामाजिक दूरी का पालन करना होगा। इसके अलावा एक जरूरी बात ये भी है कि परिवार का एक ही शख्स सामान लेने बाहर आ सकता है। बैंक और एटीएम खुले रहेंगे। इसके साथ ही इंश्योरेंस कंपनियां भी अपना काम करेंगी। लॉकडाउन 2 में क्या बंद रहेगा? सभी पैसेंजर ट्रेनें, विशेष ट्रेनें, प्रीमियम ट्रेनें बंद रहेंगी। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी 3 मई तक बंद रहेंगी। पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे बस, मेट्रो, शेयर कैब भी लॉकडाउन खत्म होने तक सेवाएं नहीं दे सकेंगे। एसी बसें जो सरकार या राज्य सरकार द्वारा जारी लिस्ट में नहीं हैं, वो भी नहीं चलेंगी। इनमें लग्जरी बसें भी शामिल हैं। सभी सार्वजनिक जगहें जैसे जिम, स्वीमिंग पूल, मूवी थियेटर, शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स, पार्क, मार्केट बंद रहेंगे। धार्मिक जगहों में बहुत भीड़ हो जाती है, लिहाजा सामाजिक दूरी के लिए इन्हें भी बंद रखा जाएगा। कंटेनमेंट जोन घोषित किए गए इलाके के लोगों को अपने घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं है। इन्हें जरूरत का सामान होम डिलीवरी के जरिए पहुंचाया जाएगा। सभी शैक्षिक और प्रशिक्षण संस्थान भी बंद रहेंगे। अंतिम संस्कार आदि की स्थिति में एक समय पर 20 से ज्यादा लोग एकत्रित नहीं हो सकते। यहां मिल सकती है छूट कुछ फैक्ट्रियां, कृषि क्षेत्र से जुड़े फर्म, फार्मा इंडस्ट्रीज जो नॉन हॉटस्पॉट एरिया में हैं, को छूट मिल सकती है। हाईवे में बने ढाबों, ट्रक रिपेयरिंग करने वाली दुकानों को भी 20 अप्रैल के बाद खोला जा सकता है। नहीं रुक रहा कोरोना का कहर, 24 घंटों में सामने आए 1076 नए केस, संख्या बढ़कर हुई 11439

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What is Herd immunity ?

What is Herd immunity ? Herd immunity refers to preventing an infectious disease from spreading by immunising a certain percentage of the population. While the concept is most commonly used in the context of vaccination, herd community can also be achieved after enough people have become immune after being infected. The premise is that if a certain percentage of the population is immune, members of that group can no longer infect another person. This breaks the chain of infection through the community (“herd”), and prevents it from reaching those who are the most vulnerable. How does herd immunity work? The scientific principle is that the presence of a large number of immune persons in the community, who will interrupt the transmission, provides indirect protection to those who are not immune. person with influenza can infect around 1.2-4.5 persons, depending on the season. On the basis of the available evidence from China, and according to various experts, R0 COVID-19 ranges between 2 and 3. Polio has a threshold of 80% to 85%, while measles has 95%. With the current data for COVID-19, experts have estimated a threshold of over 60%. That means more than 60% of the population needs to develop immunity to reach the stage of herd immunity.